जहाँ ज़िंदा होना भी अपराध बन जाए: काग़ज़ों में मृत घोषित की गई वृद्धा
सिद्धार्थनगर।
सिस्टम की एक चौंकाने वाली लापरवाही ने इंसान और सरकारी काग़ज़ों के बीच की सच्चाई पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
ज़िले के शोहरतगढ़ ब्लॉक अंतर्गत सुजकुंडिया गांव के टोला मोहम्मदपुर में एक वृद्ध महिला ज़िंदा है, चलती-फिरती है, बोलती है — लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसे मृत घोषित कर दिया गया।
यह मामला आज का नहीं, बल्कि दो से तीन वर्ष पुराना बताया जा रहा है।
जब वृद्ध महिला वृद्धा पेंशन के लिए आवेदन कराने पहुँची, तो सिस्टम में उसका नाम देखकर कहा गया कि आप तो पहले ही मृत घोषित की जा चुकी हैं।
महिला के लिए यह जवाब किसी सदमे से कम नहीं था।
जिसके पास खुद का अस्तित्व है, वही जब काग़ज़ों में खत्म कर दिया जाए — तो सवाल सिर्फ़ पेंशन का नहीं, इंसाफ़ और भरोसे का बन जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार महिला के पति और संतान पहले ही गुजर चुके हैं।
वृद्धा पेंशन ही उसके जीवन का एकमात्र सहारा है।
हैरानी की बात यह है कि महिला के बैंक खाते में हाल के वर्षों तक लेन-देन दर्ज है, जो उसके जीवित होने की पुष्टि करता है, लेकिन विभागीय रिकॉर्ड कुछ और कहानी कहता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि बिना किसी भौतिक सत्यापन और मौके की जांच के ही महिला को मृत दर्शा दिया गया।
अब सवाल यह उठता है कि अगर एक ज़िंदा इंसान काग़ज़ों में मारा जा सकता है, तो आम आदमी की सुरक्षा सिस्टम में कितनी मज़बूत है?
मामले पर मुख्य विकास अधिकारी, सिद्धार्थनगर बलराम सिंह का कहना है कि शिकायत संज्ञान में आई है और जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल यह मामला न सिर्फ़ प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है, बल्कि यह भी बताता है कि सरकारी रिकॉर्ड की एक गलती किसी ज़िंदा इंसान को कैसे “काग़ज़ी मौत” दे सकती है।

