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मासूमों की चीखों पर न्याय की मुहर: बांदा कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

दरिंदगी से दंड तक की पूरी कहानी
बांदा… एक शांत शहर, जहां जिंदगी सामान्य रफ्तार से चलती रही। लेकिन इसी शहर के भीतर एक ऐसा काला सच पल रहा था, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
सिंचाई विभाग का एक निलंबित जूनियर इंजीनियर — रामभवन। बाहर से सामान्य जीवन, भीतर घिनौनी साजिश। उसके साथ उसकी पत्नी दुर्गावती। दोनों पर आरोप लगा कि उन्होंने 34 मासूम बच्चों को अपने जाल में फंसाया। भरोसे का रिश्ता बनाया… और फिर उसी भरोसे को तोड़ते हुए उनका यौन शोषण किया।
जांच में सामने आया कि बच्चों के साथ न सिर्फ शारीरिक अत्याचार हुआ, बल्कि उनकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो भी तैयार किए गए। ये सामग्री डिजिटल माध्यमों से साझा की गई। हर नई जानकारी ने केस को और भयावह बना दिया।
जांच की परतें खुलती गईं
शुरुआत एक डिजिटल सुराग से हुई। साइबर ट्रेल ने पुलिस को उन उपकरणों तक पहुंचाया, जिनमें आपत्तिजनक सामग्री संग्रहीत थी। ई-मेल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों ने आरोपों को मजबूत किया।
जांच एजेंसियों ने कई जिलों में फैले नेटवर्क की कड़ियां जोड़ीं। एक तीसरे आरोपी का नाम भी सामने आया, जो दिल्ली से जुड़ा बताया गया। उसकी फाइल अदालत ने अलग कर दी है।
अदालत में फैसला
विशेष पॉक्सो अदालत के न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने 163 पन्नों के विस्तृत फैसले में इस अपराध को “जघन्यतम” करार दिया।
अदालत ने कहा:
“यह मामला समाज की आत्मा को झकझोर देने वाला है। मासूमों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया है।”
कोर्ट ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ श्रेणी में रखते हुए दोनों दोषियों को फांसी की सजा सुनाई।
जमानत और फिर जेल
दुर्गावती को पहले हाईकोर्ट से जमानत मिली थी, लेकिन दोष सिद्ध होने के बाद उसे दोबारा गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। सजा सुनाए जाने के बाद दोनों अभियुक्तों को कड़ी सुरक्षा में जेल ले जाया गया।
समाज के लिए संदेश
यह फैसला सिर्फ दो दोषियों की सजा नहीं, बल्कि उन सभी के लिए चेतावनी है जो बच्चों के खिलाफ अपराध करने की सोचते हैं।
बाल सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दुरुपयोग के इस दौर में अभिभावकों और समाज दोनों को सजग रहने की जरूरत है।

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