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पूर्वजों की धरती से जुड़ने कलानाखोर पहुंचे ऑस्ट्रेलियाई परिवार, भारतीय संस्कृति से हुए प्रभावित

खेसरहा (सिद्धार्थनगर)। खेसरहा विकासखंड के कलनाखोर गांव स्थित राम पियारी देवी सरोजिनी सिंह उ0मा0 विद्यालय में उस समय भावुक और ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जब ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर से दो दंपति अपने पूर्वजों की मिट्टी से जुड़ने यहां पहुंचे। विद्यालय के प्रधानाचार्य योगेंद्र सिंह ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया से आए दिनेश चंद्रा, उनकी पत्नी चंद्रा पोन्टी तथा उनके समधी रिचर्ड और समधन देवीना ने गांव की ऐतिहासिक विरासत को नजदीक से देखा और भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त की।

गिरमिटिया मजदूर से जुड़ी है भावनात्मक कहानी

प्रधानाचार्य ने बताया कि, दिनेश चंद्रा के पूर्वज मूल रूप से कलनाखोर गांव के निवासी थे। ब्रिटिश शासनकाल में वे गिरमिटिया मजदूर के रूप में मजदूरी करने ऑस्ट्रेलिया चले गए थे। विदेश में बसने के बावजूद उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं भुलाया।

दिनेश चंद्रा के पूर्वजों ने अपने बच्चों को भारत की ऐतिहासिक विरासत, संस्कृति और सभ्यता के बारे में बताया करते थे। उन्हीं प्रेरणादायक बातों से प्रभावित होकर वे अपनी पत्नी और रिश्तेदारों के साथ पूर्वजों की जन्मभूमि देखने भारत पहुंचे।

भारतीय संस्कृति से हुए प्रभावित 

विद्यालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया गया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति, पारिवारिक परंपराएं और आध्यात्मिकता विश्व में अद्वितीय हैं।

उन्होंने गांव के अतिप्राचीन राम जानकी मंदिर का दर्शन किया और उसके जीर्णोद्धार में सहयोग करने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर है।

ऐतिहासिक विरासत को संजोने का संदेश

विदेश से आए मेहमानों ने गांव के बुजुर्गों से बातचीत कर अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी ली। इस दौरान ग्रामीणों में भी उत्साह और गर्व का माहौल देखा गया।

प्रधानाचार्य योगेंद्र सिंह ने कहा कि, “यह क्षण गांव और विद्यालय के लिए ऐतिहासिक है। इससे नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और विरासत पर गर्व करने की प्रेरणा मिलेगी।”

गांव में बना उत्सव जैसा माहौल

ऑस्ट्रेलिया से आए मेहमानों के स्वागत में ग्रामीणों ने पारंपरिक अंदाज में अभिनंदन किया। लोगों ने इसे गांव के लिए गौरव का विषय बताया।

यह यात्रा न केवल एक परिवार की भावनात्मक वापसी है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि चाहे लोग दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बस जाएं, अपनी मातृभूमि और संस्कृति से जुड़ाव हमेशा बना रहता है।