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राज्यसभा में गूंजा स्पेशलिटी राइस का मुद्दा: सांसद बृजलाल ने कालनामक समेत पारंपरिक धानों को अलग वर्ग देने की उठाई मांग

नई दिल्ली। राज्यसभा सांसद बृजलाल ने मंगलवार को सदन में देश के पारंपरिक और विशिष्ट धान की किस्मों के संरक्षण एवं प्रोत्साहन का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए सरकार का ध्यान चावल के वर्गीकरण की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने बासमती और नॉन-बासमती के अलावा “स्पेशलिटी राइस” के लिए अलग श्रेणी बनाए जाने का प्रस्ताव सदन के समक्ष रखा।

पारंपरिक धानों को पहचान देने की मांग

सांसद बृजलाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत में कई ऐसी पारंपरिक और क्षेत्र विशेष की धान किस्में हैं, जिनकी सुगंध, स्वाद और पोषण मूल्य उन्हें सामान्य चावल से अलग बनाता है। लेकिन वर्तमान में इनका उचित वर्गीकरण और बाजार पहचान न होने के कारण किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

उन्होंने कहा कि यदि “स्पेशलिटी राइस” की अलग श्रेणी बनाई जाती है, तो इन धानों की ब्रांडिंग, निर्यात और संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी।

उत्तर प्रदेश का कालनामक प्रमुख

बृजलाल ने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के बुद्धकालीन प्रसिद्ध “कालनामक” धान का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी विशिष्ट सुगंध और पौष्टिक गुण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने सरकार से कालनामक के व्यापक प्रचार-प्रसार और संरक्षण के लिए विशेष नीति बनाने की मांग की।

अन्य राज्यों की विशेष किस्मों का भी उल्लेख

अपने संबोधन में उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक धान किस्मों का भी जिक्र किया, जिनमें—

बिहार की कतरनी

असम के ब्रह्मपुत्र घाटी की जोहा

पश्चिम बंगाल के विष्णु भोग और गोविंद भोग

गुजरात की सुगंधित किस्म कृष्ण कामोद

उन्होंने कहा कि ये सभी किस्में अपने-अपने क्षेत्रों की पहचान हैं और इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर “स्पेशलिटी राइस” के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

किसानों को मिलेगा लाभ

सांसद ने कहा कि अलग वर्गीकरण से इन किस्मों की गुणवत्ता के अनुसार मूल्य निर्धारण संभव होगा, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। साथ ही, इन धानों के संरक्षण से जैव विविधता भी सुरक्षित रहेगी और पारंपरिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार से नीति बनाने का आग्रह

बृजलाल ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि कृषि मंत्रालय, खाद्य एवं निर्यात से जुड़े विभागों के माध्यम से स्पेशलिटी राइस के लिए अलग मानक, ब्रांडिंग और निर्यात नीति तैयार की जाए, ताकि भारत की पारंपरिक धान किस्में वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान बना सकें।

उन्होंने कहा कि यह पहल “लोकल से ग्लोबल” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी और देश के लाखों किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में सहायक होगी।