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लखनऊ की सड़कों पर 126 गोलियां: कैसे ‘श्रीप्रकाश शुक्ला’ बना 90 के दशक का सबसे खौफनाक नाम
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रिपोर्ट: सत्यपाल सिंह कौशिक 

लखनऊ, 31 मार्च 1997। सुबह का वक्त, बच्चों की हंसी और रिजल्ट डे की खुशियां… लेकिन कुछ ही पलों में गोलियों की तड़तड़ाहट ने पूरे माहौल को खौफ में बदल दिया। इंदिरानगर की सड़क पर दिनदहाड़े जिस शख्स को बेरहमी से गोलियों से छलनी किया गया, वह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि पूर्वांचल का चर्चित माफिया वीरेंद्र प्रताप शाही था।

और इसी हत्या के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में एक नया नाम गूंज उठा—श्रीप्रकाश शुक्ला।

रिजल्ट डे बना खून-खराबे का दिन

स्प्रिंगडेल स्कूल में बच्चों का रिजल्ट डे था। माता-पिता अपने बच्चों के साथ खुशियां मना रहे थे। तभी अचानक तीन हमलावरों ने इलाके में दहशत फैला दी।

एक के हाथ में पिस्टल, दूसरे के पास स्टेनगन और तीसरा कवर दे रहा था।

हमलावरों ने सड़क पर गिरे वीरेंद्र शाही के चेहरे और सीने पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हमलावरों की बेरहमी ने पूरे शहर को दहला दिया।

साधारण परिवार से अपराध की दुनिया तक का सफर

श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के मामखोर गांव में हुआ था। पिता एक शिक्षक थे और परिवार सामान्य जीवन जी रहा था।

लेकिन 1993 में बहन के साथ हुई छेड़खानी ने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी।

गुस्से में उसने बीच बाजार उस आरोपी की हत्या कर दी।

महज 20 साल की उम्र में उसने पहला मर्डर किया।

यहीं से शुरू हुआ उसका अपराध की दुनिया में खौफनाक सफर।

बैंकॉक से बिहार तक: अपराध का नेटवर्क

पहली हत्या के बाद शुक्ला बैंकॉक भाग गया।

वापस लौटकर वह बिहार के बाहुबली सूरजभान सिंह के संपर्क में आया और उसके गैंग में शामिल हो गया।

उस दौर में रेलवे टेंडर को लेकर पूर्वांचल में दो बड़े नाम हावी थे—

हरिशंकर तिवारी

वीरेंद्र प्रताप शाही

रेलवे ठेकों को लेकर गैंगवार आम बात हो गई थी, और यहीं से शुक्ला की एंट्री ने खेल बदल दिया।

शाही को मारो, AK-47 ले जाओ’

एक पूर्व आईपीएस अधिकारी के मुताबिक, सूरजभान सिंह ने शुक्ला को ऑफर दिया—

“वीरेंद्र शाही को मारो, एक नहीं दो AK-47 दूंगा।”

शुक्ला को आधुनिक हथियारों का शौक था।

यही लालच और बदले की आग उसे सीधे माफिया वर्ल्ड के टॉप टारगेट तक ले गई।

पहली भिड़ंत और 126 गोलियों का खौफ

गोरखपुर में पहली बार शुक्ला ने AK-47 का इस्तेमाल किया, लेकिन शाही बच निकला।

इसके बाद शुक्ला ने ठान लिया—अब शाही को खत्म करना ही होगा।

31 मार्च 1997 को लखनऊ के इंदिरानगर में उसने अपने मिशन को अंजाम दिया।

सड़क पर 100 से ज्यादा गोलियां चलाई गईं

शाही की मौके पर ही मौत हो गई

यह घटना यूपी के अपराध इतिहास की सबसे चर्चित हत्याओं में शामिल हो गई।

राजनीति और सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा

महज 19-20 साल की उम्र में अपराध की दुनिया में कदम रखने वाला शुक्ला जल्द ही इतना खतरनाक बन गया कि—

बड़े नेता

कारोबारी

पुलिस अधिकारी

सभी उसके नाम से डरने लगे।

उसने मुख्यमंत्री की हत्या की सुपारी लेने तक का साहस दिखाया।

STF का गठन और अंत की शुरुआत

श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक इतना बढ़ गया कि 1998 में उत्तर प्रदेश पुलिस को स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का गठन करना पड़ा।

लगातार पीछा और खुफिया ऑपरेशन के बाद आखिरकार—

22 सितंबर 1998

 गाजियाबाद

STF ने एक मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला को ढेर कर दिया।

आखिरी शब्द जो बन गए कहानी

मुठभेड़ में शामिल एक इंस्पेक्टर के अनुसार,

मरते वक्त शुक्ला के आखिरी शब्द थे—

 “जनेऊ का ख्याल तो किया होता…”

यह शब्द आज भी उस दौर की कहानी को और रहस्यमय बना देते हैं।

एक नाम, जिसने पूरे सिस्टम को हिला दिया

श्रीप्रकाश शुक्ला सिर्फ एक अपराधी नहीं, बल्कि 90 के दशक के उस दौर की पहचान बन गया, जब अपराध, राजनीति और सत्ता का खतरनाक गठजोड़ अपने चरम पर था।

 


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