डीजीपी ने कहा, दहेज उत्पीड़न समेत 31 मामलों में एफआईआर न करें दर्ज
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अब पुलिस 31 मामलों में थानों में एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। इसमें दहेज और घरेलू हिंसा से जुड़े मामले भी शामिल हैं। इस प्रकार के मामलों के सामने आने के बाद थाने केवल परिवाद यानी शिकायत लेंगे। इसके बाद इन्हें कोर्ट के भेजा जाएगा। कोर्ट के आदेश पर ही इन मामलों में केस दर्ज किया जाएगा। यूपी डीजीपी राजीव कृष्ण ने पुलिस अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किया है। डीजीपी ने साफ तौर पर कहा है कि जिन मामलों में कानून के तहत केवल परिवाद का प्रावधान है, उनमें एफआईआर दर्ज करना पूरी तरह गलत है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की ओर इस संबंध में आपत्ति के बाद डीजीपी की ओर से आदेश जारी किया गया है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा ?
हाई कोर्ट लखनऊ पीठ ने 25 फरवरी को अनिरुद्ध तिवारी बनाम यूप सरकार एवं अन्य मामले की सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने बीएनएस की धारा 82 में एफआईआर दर्ज किए जाने पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 219 यह प्रावधान करती है कि कोई भी कोर्ट भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 81 से 84 के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति की ओर से शिकायत न की गई हो।
हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में केस क्राइम संख्या 0014/2025 में एफआईआर दर्ज करते समय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 82 का प्रयोग किया गया है। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2), 352, 351(3), 85 एवं 82(1) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत श्रावस्ती महिला थाना में दर्ज की गई है।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के क्रम में टिप्पणी में कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 220, 221 और 222 आगे यह प्रावधान करती हैं कि बीएनएस के तहत कुछ अन्य अपराधों की परिकल्पना है। इस प्रकार के मामलों में कोर्ट तब तक संज्ञान नहीं लेगा, जब तक मामले के आधार पर पीड़ित व्यक्ति, राज्य, या किसी लोक सेवक की ओर से शिकायत दर्ज न की गई हो। इसलिए, यहां एक विशिष्ट रोक है कि कोर्ट उन अपराधों का संज्ञान नहीं लेगा, जिनका उल्लेख भारतीय न्याय संहिता, 2023 में किया गया है।
यूपी डीजीपी का सभी पुलिस अधिकारियों को जारी आदेश
कोर्ट की टिप्पणी पर आदेश जारी
हाई कोर्ट की टिप्पणी और इस प्रकार के मामलों में आपत्ति जताए जाने के बाद डीजीपी की ओर से निर्देश जारी किए गए हैं। डीजीपी ने इसमें स्पष्ट किया है कि कई बार पुलिस नियमों के विपरीत एफआईआर दर्ज कर लेती है। इससे आरोपित को कोर्ट में लाभ मिल जाता है। साथ ही, पूरी जांच प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद इसे गंभीर त्रुटि मानते हुए डीजीपी ने सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले अनिवार्य रूप से इस संबंध में जांच कर लें। मामलों में देखा जाए कि इसमें एफआईआर दर्ज करने का कानूनी प्रविधान है या नहीं।
31 मामलों में कोर्ट में परिवाद का प्रावधान
डीजीपी राजीव कृष्ण ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मानहानि, घरेलू हिंसा, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (चेक बाउंस), माइंस एंड मिनरल एक्ट, कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट और पशुओं के साथ क्रूरता जैसे मामले शामिल हैं। साथ ही, दहेज के साथ-साथ 31 अलग-अलग कानूनों में केवल अदालत में परिवाद दाखिल करने का ही प्रविधान है। उन्होंने सभी थाना प्रभारियों और विवेचकों को निर्देशित किया कि वे कानून के प्रविधानों का गंभीरता से अध्ययन करें। इसी के आधार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इन मामलों में कोर्ट में परिवाद का प्रावधान:
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट, 1881
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957
गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1950
बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986
वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
आयात और निर्यात (नियंत्रण) अधिनियम, 1947
खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013
ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999
मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994
कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013
जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974
केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995
विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999
कीटनाशक अधिनियम, 1968
नोटरी अधिनियम, 1952
बीमा अधिनियम, 1938
पुरावशेष और आर्ट ट्रेजर अधिनियम, 1972
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019
उत्तर प्रदेश गन्ना (आपूर्ति और खरीद का विनियमन) अधिनियम, 1953
अग्नि निवारण और अग्नि सुरक्षा अधिनियम, 2005
दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (धारा: 07-1(b)(i) पीड़ित व्यक्ति द्वारा शिकायत) अपराध से प्रभावित व्यक्ति, या ऐसे व्यक्ति के माता-पिता या अन्य रिश्तेदार, अथवा किसी मान्यता प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन की ओर से)
बाट और माप मानक अधिनियम, 1976
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सत्यपाल सिंह कौशिक को कंटेंट लेखन, स्क्रिप्ट लेखन का लंबा अनुभव है। वर्तमान में कौशिक जी FT NEWS DIGITAL में डिजिटल मीडिया सह- संपादक के पद पर कार्यरत हैं।
