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नेपाल तराई में बदलती सियासी हवा: क्या परंपरागत दलों का गढ़ ढह रहा है?

नेपाल के तराई क्षेत्र में इस बार चुनावी माहौल कुछ अलग नजर आ रहा है। रवि लामिछाने की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) और पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार बालेन शाह के रोड शो में उमड़ी भीड़ ने परंपरागत राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत सीमा से सटे कपिलवस्तु जिला और रूपन्देही जिला में हुए इन रोड शो में भारी जनसमर्थन देखने को मिला। दोनों नेताओं के कार्यक्रम अलग-अलग समय पर हुए, लेकिन भीड़ का उत्साह लगभग समान रहा। इससे संकेत मिल रहे हैं कि तराई क्षेत्र की राजनीति किसी नए मोड़ की ओर बढ़ रही है।

तराई: परंपरागत दलों का गढ़, अब नई चुनौती

नेपाल के तराई क्षेत्र में लगभग 23 जिले आते हैं और यहां की आबादी करीब 90 लाख मानी जाती है। यह इलाका लंबे समय से नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) और विभिन्न मधेशी दलों का मजबूत आधार रहा है।

हिंदू बहुल इस क्षेत्र में सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भारत से गहरा जुड़ाव महसूस किया जाता है। ऐसे में मतदाताओं का परंपरागत दलों से हटकर नई पार्टी की ओर झुकाव राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका रहा है।

लोकप्रियता और विवाद: रवि लामिछाने फैक्टर

पूर्व गृहमंत्री रह चुके रवि लामिछाने अपनी टीवी एंकरिंग और जनसरोकारों से जुड़े कार्यक्रमों के कारण व्यापक लोकप्रियता रखते हैं। हालांकि वे अमेरिकी नागरिकता विवाद और धोखाधड़ी के एक मामले में जेल जाने को लेकर सुर्खियों में भी रहे।

अपने संबोधनों में वे धर्म आधारित राजनीति से दूरी बनाने की अपील करते नजर आते हैं। इससे शहरी और युवा मतदाताओं के बीच उनकी छवि एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में उभर रही है।

बालेन शाह की शैली और प्रतीकात्मक संदेश

काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह अपने रोड शो के दौरान स्थानीय मंदिरों में दर्शन करते दिखाई दिए। रूपन्देही और कपिलवस्तु में उन्होंने प्रसिद्ध मरचाई माता मंदिर से अपना कार्यक्रम शुरू किया।

उनका आत्मविश्वास और समर्थकों का उत्साह ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो चुनावी परिणाम उनके पक्ष में तय हों। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रैलियों की भीड़ हमेशा चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती।

क्या बदलेगा चुनावी गणित?

राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि इस बार तराई में समीकरण बदल सकते हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को कम आंकना वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा होगा।

हालांकि अंतिम फैसला मतपेटियों में बंद है। अक्सर मतदान के दिन मतदाताओं का रुझान बदल जाता है और नतीजे चौंकाने वाले आते हैं। फिर भी इस बार तराई में दिख रही हलचल पारंपरिक दलों के लिए चेतावनी संकेत जरूर है।

नेपाल के तराई क्षेत्र में उभरता जनसमर्थन यह संकेत दे रहा है कि मतदाता विकल्प तलाश रहे हैं। क्या यह बदलाव सत्ता परिवर्तन का कारण बनेगा या पारंपरिक दल वापसी करेंगे—यह आने वाला चुनाव तय करेगा। फिलहाल इतना तय है कि तराई की राजनीति नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है।

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