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पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी- कानून बना तो महिलाओं को नौकरी देना बंद कर सकते हैं नियोक्ता

नई दिल्ली। देश में महिलाओं के लिए पीरियड (मेनस्ट्रुअल) लीव को अनिवार्य करने की मांग पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि पीरियड लीव को कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं की नौकरी के अवसरों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। अदालत के इस बयान के बाद देशभर में एक नई बहस छिड़ गई है।

क्या कहा चीफ जस्टिस ने

सुनवाई के दौरान पीठ की अगुवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि मासिक धर्म अवकाश को कानूनन अनिवार्य कर दिया गया तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसा कानून बनने पर यह धारणा बन सकती है कि महिलाओं को काम में अतिरिक्त सुविधा देनी पड़ेगी, जिससे कंपनियां महिलाओं को नियुक्त करने में हिचकिचा सकती हैं।

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि यदि इसे कानून बनाया गया तो कई संस्थान महिलाओं को जिम्मेदारी वाले पद देने से भी बच सकते हैं और यह उनके करियर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

किस मामले में हुई सुनवाई

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई थी, जिसमें देशभर में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए पीरियड लीव नीति लागू करने की मांग की गई थी।

अदालत ने इस याचिका पर सीधे कानून बनाने से इनकार करते हुए कहा कि इस विषय पर नीति बनाना सरकार का काम है, इसलिए केंद्र सरकार इस पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने क्यों जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु रखे —

यदि पीरियड लीव अनिवार्य हुई तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं।

इससे महिलाओं को कम जिम्मेदारी वाले काम दिए जाने का खतरा बढ़ सकता है।

यह भी आशंका है कि इससे महिलाओं को कम सक्षम समझने की मानसिकता मजबूत हो सकती है।

दूसरी ओर क्या है समर्थन का तर्क

पीरियड लीव के समर्थकों का कहना है कि मासिक धर्म के दौरान कई महिलाओं को गंभीर दर्द, थकान और स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं।

इसलिए उन्हें काम या पढ़ाई से एक-दो दिन की छुट्टी मिलना मानवाधिकार और स्वास्थ्य के लिहाज से जरूरी है। कुछ राज्य और निजी कंपनियां पहले से स्वैच्छिक रूप से ऐसी सुविधा दे रही हैं।

देश में पहले से कहां लागू है पीरियड लीव

भारत में कुछ संस्थानों और कंपनियों ने स्वेच्छा से यह सुविधा दी है।

उदाहरण के तौर पर कुछ विश्वविद्यालयों और निजी कंपनियों में मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन यह कानूनन अनिवार्य नहीं है।

क्या आगे बन सकता है कानून

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में कानून बनाने का आदेश नहीं दिया है, लेकिन केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस विषय पर नीति बनाने की संभावना पर विचार कर सकती है।

यानी भविष्य में सरकार चाहे तो इस पर गाइडलाइन या नीति बना सकती है, लेकिन फिलहाल इसे अनिवार्य बनाने का कोई आदेश नहीं दिया गया है।

पीरियड लीव को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने देश में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। एक तरफ इसे महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकार से जुड़ा मुद्दा बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अदालत का मानना है कि इसे कानून बनाना महिलाओं के रोजगार के अवसरों को प्रभावित कर सकता है।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कोई नीति या दिशा-निर्देश जारी करती है या नहीं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: सरकारी योजनाओं से सशक्त होती महिलाएं, फिर भी कई क्षेत्रों में असमानता बरकरार

“नारी तू नारायणी” भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, ममता, त्याग और सृजन का प्रतीक माना गया है। हमारे साहित्य और धर्मग्रंथों में भी नारी को उच्च स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध पंक्तियां “नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग तल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के समतल में” नारी की महानता और उसके महत्व को दर्शाती हैं। भारतीय समाज में नारी को परिवार की आधारशिला और समाज की प्रेरणा शक्ति के रूप में देखा जाता है।

हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के अवसर पर महिलाओं के अधिकार, सम्मान और सशक्तिकरण पर चर्चा होती है। यह दिन न केवल महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देने का अवसर है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि समाज में आज भी कई क्षेत्रों में महिलाओं को समान अधिकार और अवसर के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

महिलाओं के उत्थान के लिए सरकारी योजनाएं

भारत में महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें लगातार विभिन्न योजनाएं चला रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान करना है।

महिलाओं की शिक्षा और उनके जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना शुरू की गई। इस योजना का उद्देश्य समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना और उन्हें शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना है। इस योजना के माध्यम से कई क्षेत्रों में बेटियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और बालिका शिक्षा को बढ़ावा मिला है।

इसी प्रकार बेटियों के भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने के लिए सुकन्या समृद्धि योजना शुरू की गई। इस योजना के तहत माता-पिता अपनी बेटियों के नाम से बचत खाता खोल सकते हैं, जिसमें जमा की गई राशि पर सरकार की ओर से अच्छा ब्याज मिलता है। इससे बेटियों की उच्च शिक्षा और विवाह के लिए आर्थिक सहायता मिलती है।

महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत महिलाओं को स्वरोजगार के लिए बिना गारंटी के ऋण दिया जाता है। इससे महिलाएं छोटे व्यवसाय, दुकान, सिलाई केंद्र, ब्यूटी पार्लर या अन्य स्वरोजगार शुरू कर सकती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को संगठित कर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस मिशन के तहत स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी जाती है। आज हजारों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से छोटे उद्योग और व्यवसाय चला रही हैं।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सरकार ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना चलाई जा रही है। इस योजना के माध्यम से गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य देखभाल के लिए आर्थिक मदद मिलती है।

बदलती सामाजिक स्थिति और बढ़ती भागीदारी

पिछले कुछ दशकों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। पहले जहां महिलाओं को केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित माना जाता था, वहीं आज महिलाएं शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, राजनीति, खेल और व्यवसाय जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

आज भारत की महिलाएं डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, सैनिक, पुलिस अधिकारी और राजनेता के रूप में देश के विकास में योगदान दे रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी महिलाओं की भूमिका तेजी से बदल रही है। वे कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों के माध्यम से परिवार की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

स्वयं सहायता समूहों और सरकारी योजनाओं की मदद से ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और समाज में उनकी पहचान भी मजबूत हुई है। आज कई महिलाएं पंचायतों और स्थानीय प्रशासन में नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं, जिससे ग्रामीण विकास में उनकी भागीदारी बढ़ रही है।

अब भी मौजूद हैं कई चुनौतियां

हालांकि महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, लेकिन आज भी समाज के कई हिस्सों में महिलाएं भेदभाव और असमानता का सामना कर रही हैं। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में अभी भी बेटियों की शिक्षा को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना बेटों को दिया जाता है।

बाल विवाह, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याएं अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। कई महिलाओं को आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

इसके अलावा कार्यस्थलों पर भी महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई जगहों पर समान कार्य के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है। निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उनकी भागीदारी सीमित रहती है।

सुरक्षा के मुद्दे भी महिलाओं के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। कई महिलाएं आज भी सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षित महसूस करती हैं। ऐसे में समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

सामाजिक सोच में बदलाव की जरूरत

महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए समाज की सोच में बदलाव होना भी आवश्यक है। जब तक महिलाओं को बराबरी का सम्मान और अवसर नहीं मिलेगा, तब तक सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण संभव नहीं होगा।

परिवार और समाज को यह समझना होगा कि महिला केवल घर संभालने वाली नहीं है, बल्कि वह समाज और देश के विकास में समान भागीदार है। बेटियों को भी बेटों की तरह शिक्षा, स्वतंत्रता और अवसर मिलना चाहिए।

जब महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगी, तभी समाज और देश की प्रगति संभव होगी। इसलिए महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता की भावना विकसित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

महिलाएं समाज की आधारशिला हैं। उनके बिना किसी भी समाज या राष्ट्र का विकास संभव नहीं है। सरकार की विभिन्न योजनाओं और समाज में बढ़ती जागरूकता के कारण महिलाओं की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही हैं। फिर भी कई क्षेत्रों में महिलाओं को समान अधिकार और अवसर दिलाने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। समाज के हर वर्ग को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर मिलें।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहां स्त्री की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास रहता है। इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करेंगे और उन्हें आगे बढ़ने के लिए हर संभव सहयोग देंगे। जब महिलाएं सशक्त होंगी, तभी समाज और राष्ट्र सच्चे अर्थों में समृद्ध और विकसित बन सकेगा।

हमसफर बनेंगे IPS केके विश्नोई और IPS अंशिका वर्मा, गोरखपुर से शुरू हुई थी लव स्टोरी

गोरखपुर : पुलिस के दो तेजतर्रार आईपीएस अधिकारियों की प्रेम कहानी अब विवाह के मुकाम तक पहुंच गई है। संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार विश्नोई और बरेली की पुलिस अधीक्षक अंशिका वर्मा जल्द ही शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं। दोनों की शादी 28 मार्च को राजस्थान के बारमेर जिले में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होगी। इससे पहले 27 मार्च को बाड़मेर जिले के धोरीमना गांव में हल्दी और संगीत समारोह आयोजित होगा, जबकि 30 मार्च को जोधपुर के एक रिसोर्ट में भव्य रिसेप्शन रखा जाएगा।

गोरखपुर में शुरू हुई थी लव स्टोरी

दोनों आईपीएस अधिकारियों की प्रेम कहानी की शुरुआत वर्ष 2021 में हुई थी। उस समय गोरखपुर में पोस्टिंग के दौरान उनकी पहली मुलाकात हुई थी। उस समय कृष्ण कुमार बिश्नोई गोरखपुर में एसपी सिटी के पद पर तैनात थे, जबकि अंशिका वर्मा वहां प्रशिक्षण के दौरान अंडर ट्रेनिंग आईपीएस अधिकारी थीं। ड्यूटी के दौरान हुई मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदली और फिर यही दोस्ती समय के साथ एक मजबूत रिश्ते में बदल गई। अब लगभग पांच साल बाद दोनों अपने रिश्ते को शादी के रूप में नई पहचान देने जा रहे हैं।

राजस्थान में होंगे सभी शादी समारोह

दोनों परिवारों की सहमति के बाद शादी की सभी रस्में राजस्थान में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। 27 मार्च को बाड़मेर जिले के धोरीमना गांव में हल्दी और संगीत समारोह होगा। इसके बाद 28 मार्च को विवाह संपन्न होगा। शादी के बाद 30 मार्च को जोधपुर के एक रिसोर्ट में भव्य रिसेप्शन आयोजित किया जाएगा, जिसमें प्रशासनिक सेवा और पुलिस विभाग से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हो सकते हैं।

होली में भी चर्चा में रहे दोनों अधिकारी

हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस की होली के दौरान भी दोनों अधिकारी काफी चर्चा में रहे थे। बरेली में होली समारोह के दौरान एसपी अंशिका वर्मा ने काला चश्मा पहनकर लोकप्रिय गीत “लंदन ठुमकदा” पर डांस किया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ। इसके अगले दिन संभल में एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने भी अनोखे अंदाज में पुलिस लाइन में एंट्री की थी। उन्होंने शिकारी स्टाइल की टोपी पहनकर खुली जिप्सी से फिल्मी गाने पर पुलिसकर्मियों के बीच प्रवेश किया था। उनके इस अंदाज को भी लोगों ने खूब पसंद किया।

राजस्थान के किसान परिवार से आते हैं केके बिश्नोई

आईपीएस कृष्ण कुमार बिश्नोई उत्तर प्रदेश कैडर के 2018 बैच के अधिकारी हैं। उनका जन्म राजस्थान के बाड़मेर जिले के धोरीमना गांव में एक किसान परिवार में हुआ। छह भाई-बहनों में सबसे छोटे बिश्नोई ने बचपन से ही पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। 12वीं के बाद वे दिल्ली चले गए और सेंट स्टीफेन्स कालेज से 2013 में बीए की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने विदेश में पढ़ाई का सपना देखा और फ्रांस सरकार की स्कॉलरशिप हासिल की। उन्हें करीब 40 लाख रुपये की स्कॉलरशिप मिली और उन्होंने पेरिस स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विषय में मास्टर डिग्री प्राप्त की।

विदेश में भी किया महत्वपूर्ण काम

विदेश में पढ़ाई के दौरान बिश्नोई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनुभव हासिल किया। उन्हें यूनाइटेड नेशन के ट्रेड सेंटर में कंसल्टेंट के रूप में काम करने का अवसर मिला, जहां उन्हें लगभग 30 लाख रुपये सालाना का पैकेज मिला। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा और शोध कार्य जारी रखा और बाद में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली, लेकिन दूसरे प्रयास में उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास कर 2018 बैच के आईपीएस अधिकारी बन गए।

पुलिस सेवा में तेजतर्रार छवि

आईपीएस बनने के बाद 2019 में उनकी पहली पोस्टिंग मेरठ के परतापुर थाने में थाना प्रभारी के रूप में हुई। इसके बाद वे मुजफ्फरनगर में एएसपी और बाद में संभल में एसपी के पद पर तैनात हुए। संभल में रहते हुए उन्होंने 100 करोड़ रुपये से अधिक के बीमा धोखाधड़ी घोटाले का खुलासा किया, जिसमें 70 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इसके लिए उन्हें उत्कृष्ट सेवा पुलिस पदक और प्लैटिनम मेडल से सम्मानित किया गया।

अंशिका वर्मा की प्रेरणादायक कहानी

आईपीएस अंशिका वर्मा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की रहने वाली हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नोएडा में हुई। उन्होंने जेएसएस अकेडमी ऑफ टेक्निकल एडुकेशन नोएडा से इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की। उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के दूसरे प्रयास में शानदार सफलता हासिल की और 136 वीं रैंक प्राप्त कर आईपीएस अधिकारी बनीं। उनके पिता उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड से सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं।

पुलिस सेवा में तेजतर्रार पहचान

अंशिका वर्मा की पहली पोस्टिंग आगरा जिले के फतेहपुर सीकरी थाने में ट्रेनी अधिकारी के रूप में हुई। इसके बाद उन्हें गोरखपुर में एएसपी के रूप में तैनाती मिली। वर्तमान में वे बरेली जिले में एसपी के पद पर कार्यरत हैं और अपनी कार्यशैली, अनुशासन और सक्रिय पुलिसिंग के लिए जानी जाती हैं।

सोशल मीडिया पर भी लोकप्रिय

आईपीएस अंशिका वर्मा सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रिय हैं। इंस्टाग्राम पर उनके छह लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। उनके काम और व्यक्तित्व के कारण युवा वर्ग उन्हें काफी पसंद करता है।

नई शुरुआत की ओर कदम

अब दोनों आईपीएस अधिकारी अपने पेशेवर जीवन के साथ-साथ निजी जीवन में भी एक नई शुरुआत करने जा रहे हैं। पुलिस विभाग, प्रशासनिक सेवा और उनके परिचितों के बीच इस शादी को लेकर उत्साह का माहौल है। 28 मार्च को होने वाली यह शादी न केवल दो परिवारों के लिए बल्कि पुलिस विभाग के लिए भी एक खास अवसर बनने जा रही है। सभी लोग इस जोड़ी के सुखद और सफल वैवाहिक जीवन की कामना कर रहे हैं।

28 फरबरी 2026 को आसमान में दिखेगी ग्रहों की परेड, 28 फरवरी की शाम एक साथ नजर आएंगे 6 ग्रह

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यदि आप ग्रहों, उपग्रहों और चांद और सितारों की दुनिया में दिलचस्पी रखते हैं, तो 28 फरवरी की शाम अपनी नजरें आसमान की ओर टिका लीजिए। इस दिन हमारे सौर मंडल के छह ग्रह—बुध (Mercury), शुक्र (Venus), शनि (Saturn), अरुण (Uranus), बरुण(Neptune),और बृहस्पति(Jupiter) , लगभग एक ही कतार में दिखाई देंगे।

क्या होता है ग्रहीय संरेखण या प्लैनेटरी परेड (Planetary Parade)

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह वह खगोलीय स्थिति है जब सौर मंडल के कई ग्रह एक ही समय में आकाश के लगभग एक ही हिस्से में, एक काल्पनिक रेखा (क्रांतिवृत्त Ecliptic) के आसपास दिखाई देते हैं। खगोल वैज्ञानिक रूप से इसका अर्थ है कि सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा लगभग एक ही समतल (plane) में करते हैं।

पृथ्वी से देखने पर वे उसी मार्ग पर एक कतार या चाप (arc) में दिखाई देते हैं। यही दृष्टि-आधारित संरेखण (line-of-sight alignment) होता है, वास्तव में ग्रह अंतरिक्ष में एक सीधी रेखा में पास-पास नहीं होते; वे करोड़ों किलोमीटर दूर अपनी-अपनी कक्षाओं में रहते हैं।

कितने ग्रह हों तो “परेड” कहा जाता है?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 3 या अधिक ग्रह एक साथ दिखाई दें तो सामान्यत: इसे “प्लैनेटरी परेड” कहा जाता है।

4–5 ग्रह नग्न आँखों से दिख जाएँ तो यह अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता है।

6 या उससे अधिक ग्रहों का एक साथ दृश्य होना और भी कम बार होता है।

कैसे और कहाँ देखें?

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला ( तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह अद्भुत खगोलीय नजारा सूर्यास्त के लगभग 30 मिनट बाद शुरू होगा। आपको बस एक ऐसी जगह ढूंढनी है जहाँ से पश्चिमी क्षितिज (Western Horizon) साफ दिखाई दे।

बिना टेलिस्कोप के (नग्न आंखों से): शुक्र, बृहस्पति, बुध और शनि को आप बिना किसी उपकरण के देख पाएंगे। उस दौरान शुक्र ग्रह और बृहस्पति ग्रह की चमक अन्य साथी ग्रहों के मुक़ाबले सबसे ज्यादा दिखाई देगी। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अरुण ग्रह को देखने के लिए किसी अच्छी टेलिस्कोप/दूरबीन या किसी विशेष बिनाकुलर की जरूरत होगी, जबकि नेपच्यून को केवल किसी शक्तिशाली टेलिस्कोप से ही देखा जा सकेगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस दौरान आकाश में चांद का भी साथ होगा और इस शाम चांद भी 92% चमक के साथ बृहस्पति के बेहद करीब (लगभग 4°) पर नजर आएगा, जो इस दृश्य को और भी खूबसूरत बना देगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस प्रकार की खगोलीय घटना को खगोल विज्ञान की भाषा में प्लैनेटरी अलाइनमेंट’ या ग्रहीय संरेखण भी कहा जाता है, हालाँकि यह एक ‘प्लैनेटरी अलाइनमेंट’ या ग्रहीय संरेखण तो है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं जैसे कि समय की कमी इस दौरान बुध (Mercury) और शुक्र (Venus) सूर्यास्त के लगभग तुरंत बाद क्षितिज के नीचे डूब जाएंगे। इसलिए आपके पास इन्हें देखने के लिए बहुत कम समय होगा।

मंगल (Mars) कहाँ है? 

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मंगल इस समय सूर्य की दूसरी ओर होने के कारण इस ‘परेड’ का हिस्सा नहीं बनेगा।

क्या यह सभी ग्रह, हक़ीकत में एक साथ होंगे

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि दूरी से ये ग्रह केवल पृथ्वी से देखने पर एक लाइन में दिखते हैं, अंतरिक्ष में ये एक-दूसरे से करोड़ों किलोमीटर दूर अपनी कक्षाओं में होते हैं।

कैसे देख सकते हैं?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि देखने के लिए ऊंचाई वाली जगह चुनें, यदि सामने ऊंची इमारतें या पेड़ हैं, तो आप नीचे स्थित ग्रहों (बुध और शनि) को नहीं देख पाएंगे। साथ ही मौसम का हाल ख़्याल रखना ही होता है कि इसके लिए आसमान का साफ और बादल रहित होना अनिवार्य है। और कई प्रमुख समस्याओं में से एक जोकि है प्रकाश प्रदूषण इसीलिए इस लाइट पोल्यूशन से भी बचें ,शहर की तेज लाइटों से दूर अंधेरी जगह पर यह नजारा और भी साफ एवं स्पष्ट दिखेगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर आप पहली बार ग्रहों को पहचान रहे हैं, तो थोड़ा सा मुश्किल भी हो सकता है,

क्या क्या दिखाई देगा?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यदि आकाश साफ रहता है, तो इन छह ग्रहों में से केवल चार ग्रहों को ही नग्न आंखों/ (साधारण आंखों) से देखा जा सकेगा। साथ ही यूरेनस ( अरूण ग्रह) और नेपच्यून ( बरुण ग्रह) को देखने के लिए किसी अच्छी दूरबीन (टेलीस्कोप) या (विशेष बिनाकुलर) की आवश्यकता होगी। सच तो यही है कि यहाँ तक कि बुध (Mercury) को देख पाना भी कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, जो लोग इन ग्रहों को एक कतार में देखना चाहते हैं, उन्हें 28 फरवरी को सूर्यास्त के लगभग 25 से 30 मिनट बाद पश्चिम दिशा के आकाश की तरफ़ देखना चाहिए। लेकिन अगर आपको और भी अधिक स्पष्ट एवं सार्थक नज़ारा देखना है तब एक शर्त है कि इसके लिए साफ आसमान, पश्चिमी क्षितिज का स्पष्ट दृश्य और बेहतर अवलोकन के लिए किसी अच्छी दूरबीन/टेलीस्कोप या विशेष बिनाकुलर का होना जरूरी है।

इन छह ग्रहों में से चार ग्रह सूर्य के अत्यंत निकट होंगे, जो शाम के उजाले में केवल थोड़े समय के लिए ही दिखाई देंगे, या संभवतः कुछ को साधारण आंखों से बिल्कुल भी दिखाई न दें। शुक्र और बुध क्षितिज (धरती की रेखा) के सबसे करीब होंगे, उनके बाद शनि ग्रह और बरुण ग्रह का स्थान होगा। जबकि अरुण ग्रह और बृहस्पति ग्रह आकाश में काफी ऊंचाई पर स्थित होंगे। इस कारण तीन से अधिक ग्रहों को एक साथ देख पाना एक कठिन चुनौती हो सकती है। क्योंकि अरुण ग्रह बिना दूरबीन के दिखाई ही नहीं देता है।

यह खगोलीय घटना कितनी दुर्लभ है?

खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, 28 फरवरी 2026 को भारत में सूर्यास्त लगभग 6:20 PM (स्थान के अनुसार थोड़ा अलग) पर होगा। ग्रहों को देखने का सबसे अच्छा समय 6:45 PM से 7:15 PM के बीच होगा क्योंकि इसके बाद बुध ग्रह और शुक्र ग्रह और कुछ ही देर बाद में शनि ग्रह भी,क्षितिज से नीचे चले जाएंगे। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मौसम साफ होने पर सामान्यतः अधिकांश रातों में भी कम से कम एक चमकदार ग्रह देखा जा सकता है। या अलग अलग समय में दो भी हो सकते हैं, या कुछ यूं कहें कि आमतौर पर सूर्यास्त के आसपास दो या तीन ग्रह भी दिखाई दे जाते हैं, जोकि उनकी स्थिति एवं समय पर निर्भर करता है कि कब कौनसा ग्रह दिखाई देगा, लेकिन कभी कभार ही बिना किसी खगोलीय उपकरण के चार या पांच चमकदार ग्रहों को एक साथ देखा जा सकता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चार या पांच ग्रहों का नग्न आंखों (साधारण आंखों) से दिखने वाला स्पष्ट एवं दृश्य संरेखण (Alignment) कई वर्षों में एक बार ही घटित होता है।

वैसे तो समय समय पर ज़्यादातर 

मंगल, बृहस्पति और शनि ग्रह अक्सर रात के आकाश में दिखाई देते हैं। लेकिन जब शुक्र और बुध भी उनके साथ जुड़ जाते हैं, तो चार या पांच ग्रहों का यह मिलन अपने आप में कुछ विशेष हो जाता है। क्योंकि शुक्र और बुध, पृथ्वी की तुलना में सूर्य के बहुत करीब परिक्रमा करते हैं और उनकी कक्षाएं भी छोटी व तेज होती हैं।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि शुक्र ग्रह को उन कुछ महीनों के दौरान और भी स्पष्ट देखा जा सकता है जब वह आकाश में सूर्य से सबसे दूर होता है, और यह सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से कुछ पहले दिखाई देता है। वहीं बुध, जोकि मात्र 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है, या यूं कहें कि बुद्ध ग्रह का वर्ष,पृथ्वी के लगभग 88 दिनों के बराबर होता है,आमतौर पर यह सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले केवल दो सप्ताह या कभी-कभी केवल कुछ दिनों के लिए ही दिखाई देता है।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगली ऐसी खगोलीय घटना अक्टूबर 2028 के अंत में घटित होगी, जब सूर्योदय से पहले पांच ग्रह एक साथ दिखाई देंगे। इसके बाद, फरवरी 2034 के अंत में, पांच ग्रह फिर से सूर्यास्त के बाद दिखाई देंगे, हालांकि उस दौरान भी शुक्र और बुध को उतना स्पष्ट देख पाना कुछ चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

क्या सभी 6 ग्रह नग्न आंखों से दिखाई देंगे?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सभी छह ग्रह नग्न आंखों से नहीं दिखाई देंगे।

नग्न आंखों से तेज़ चमक वाले ग्रह: शुक्र, बृहस्पति, शनि, और कभी-कभी बुध देख पाए जाते हैं। यूरेनस और नेप्च्यून के लिए टेलीस्कोप या दूरबीन की ज़रूरत पड़ेगी ही।

क्या होता है दूरी का भ्रम

(Optical Illusion): खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूरी सौर प्रणाली में भौतिक रूप से एक सीधी रेखा में होने जैसा नहीं होगा, लेकिन पृथ्वी से देखने वाले के दृष्टिकोण से ये लगभग एक विस्तृत रेखा या एक साथ दिखाई देंगे, यह एक दृष्टि-प्रतिबद्ध संरेखण (line-of-sight alignment) है।

क्या होगा धरती पर इसका असर।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सही ज्ञान सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान, इसीलिए सबसे पहले ठीक से जानें उसके बाद ही मानें, और अंधविश्वासों से रखें पूरी दूरी और नहीं होनी चाहिए कोई भी मजबूरी, साथ ही अंधविश्वासों से नाता तोड़ें और विज्ञान से नाता जोड़ें क्योंकि खगोल विज्ञान में किसी भी ग्रहों के पार्श्व प्रभाव धरती पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं डालते (जैसे भूकंप, मौसम में बदलाव या मनोवैज्ञानिक प्रभाव)। एवं इसका कोई भी अनिष्टकारक एवम् अलौकिक प्रभाव पृथ्वी पर रहने वाले लोगों पर कभी भी नहीं होता है।

सहारनपुर SSP द्वारा आयोजित हुई जनसुनवाई, समस्याओं का हुआ निस्तारण

सहारनपुर। पुलिस कार्यालय में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, सहारनपुर द्वारा जनसुनवाई आयोजित की गई। जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से आए नागरिकों ने अपनी समस्याएँ, शिकायतें व आवेदन प्रस्तुत किए, जिन्हें अधिकारियों द्वारा पूरी गंभीरता एवं संवेदनशीलता के साथ सुना गया सभी प्रकरणों में समयबद्ध, पारदर्शी एवं निष्पक्ष कार्यवाही सुनिश्चित करने के स्पष्ट निर्देश दिए जनसुनवाई में प्राप्त शिकायतों का त्वरित निस्तारण किया जाए। प्रत्येक शिकायतकर्ता को निस्तारण की समुचित सूचना उपलब्ध कराई जाए, जिससे जनता का भरोसा और मजबूत हो। जनसुनवाई का मुख्य उद्देश्य पुलिस-जनता के बीच संवाद को सुदृढ़ करना और जनपद में सुशासन एवं बेहतर कानून व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

घूसखोर पंडत:: विवादों से प्रचार पातीं फिल्में: अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

(वरिष्ठ स्तंभकार)

फिल्मों का एक सुनियोजित रणनीति के तहत विवादों में परोसना और फिर उस पर वितंडा खड़ा करके प्रचार पाना अब कोई नयी बात नहीं रह गई है। दरअसल फिल्मकारों ने आस्था, भावना और मूल्यों के खिलाफ फिल्में बनाकर बेशुमार धन इकठ्ठा करने का एक चलन बना लिया है। भले ही इससे किसी जाति, धर्म आस्था और भावना को चोट क्यों न पहुंचती हो। ऐसी ही एक फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ भी रुपहले पर्दे पर चढ़ने को तैयार है जिसके टाईटल को लेकर वितंडा उठ खड़ा हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस फिल्म के टाईटल को लेकर विरोध-प्रदर्शन जारी है। खुद फिल्म निर्माता संघ (एफएमसी) ने इस फिल्म को लेकर निर्माता नीरज पांडेय को नोटिस जारी किया है और कहा है कि फिल्म निर्माता ने नियमों के अनुसार शीर्षक के लिए अनिवार्य अनुमति प्राप्त नहीं की है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि फिल्म निर्माता ने जानबुझकर फिल्म को विवादों की परिधि में लाकर प्रचार पाने के लिए यह सारा उपक्रम किया था। अब जब विवाद चरम पर पहुंच गया है और फिल्म भी खूब प्रचार पा ली है तो फिल्म निर्माता नीरज पांडेय और अभिनेता मनोज वाजपेई द्वारा सफाई दी जा रही है कि उनका मकसद किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था। वे अब विवादित प्रचार सामग्री को हटाने की भी दुहाई दे रहे हैं। लेकिन सच तो यह है कि फिल्म निर्माता ने अपनी फिल्म को विवादों के जरिए जितना प्रचार पाना चाहा था उतना पा लिया। उसका मकसद पूरा हुआ। अब सवाल यह है कि क्या ऐसे फिल्म निर्माताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी जो धन कमाने के निमित्त इस किस्म का घिनौने हथकंडा अपनाते हैं। कहना मुश्किल है। इसलिए कि इस तरह के हथकंडे बार-बार अपनाए जा रहे हैं। याद होगा गत वर्ष पहले ओम राउत निर्देशित फिल्म आदिपुरुष भी आई थी जिसमें अमर्यादित और फूहड़ संवादों और बेतुकी कल्पनाओं के जरिए भगवान श्रीराम और उनके भक्त हनुमान के अपमान के साथ-साथ महाकाव्य रामायण की प्रमाणिकता, ऐतिहासिकता, संदर्भ, गरिमा और आस्था से जमकर खिलवाड़ किया गया था। इसी तरह तमिल फिल्म निर्माता लीना मणिमेकलाई ने अपनी फिल्म काली के पोस्टर में हिंदू देवी का रुप धरे महिला किरदार को सिगरेट पीते दिखाया था। इस किरदार के एक हाथ में एलजीबीटीक्यू समुदाय के 6 रंगे झंडे को भी दिखाया गया था। तब भी विरोध हुआ था लेकिन लीना मणिमेकलाई हिंदू संवेदनाओं को समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं दिखी। तब उन्होंने कहा था कि वह जीवित रहने तक निडर होकर अपनी आवाज का इस्तेमाल करती रहेंगी। विडंबना यह है कि तब भी कुछ सेलिब्रेटी राजनीतिक हस्तियां लीना मणिमेकलाई के समर्थन में आवाज बुलंद करती दिखी थी जैसा कि आज ‘घुसखोर पंडित’ टाईटल के समर्थन में खड़े दिख रहे हैं। मौंजू सवाल यह कि क्या नीरज पांडेय, ओम राउत और लीना मणिमेकलाई सरीखे फिल्म मेकर्स हिंदू जातियों, हिंदू धर्म, हिंदू आस्था की तरह अन्य धर्मों की जातियों, उनके आराध्यों और उन्हें असहज करने वाली भावनाओं को अपनी फिल्मों में अमर्यादित तरीके से दिखाने का साहस कर सकते हैं? शायद नहीं। तब फतवा जारी हो जाएगा और उन्हें जान बचाने के लाले पड़ जाएंगे। याद होगा गत वर्ष पहले देश के जाने-माने फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘पद्मावती’ के जरिए रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच प्रेम संबंधों का निरुपण कर वितंडा खड़ा किया था। इसे लेकर देश में भारी बवाल हुआ था। मार्च 2015 में फिल्म ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ भी विवादों से घिरी जब फिल्म का फर्स्टलुक जारी हुआ। इस पोस्टर में अभिनेत्री मल्लिका तीन रंगों वाले राष्ट्रीय ध्वजों में लिपटी नजर आयी। हैदराबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर मल्लिका और सरकार को नोटिस भी जारी किया। जनवरी 2016 में हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’ में समलैंगिक शब्द के इस्तेमाल पर सेंसर बोर्ड ने ऐतराज जताया। उल्लेखनीय है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरस के जीवन से जुड़ी सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म में मनोज वाजपेयी और राजकुमार राव ने प्रमुख भूमिका निभायी थी। अभी गत वर्ष पहले अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ विवादों के केंद्र में रहा। इस फिल्म का कथानक पंजाब में नशाखोरी के इर्द-गिर्द गढ़ा-बुना गया था। इसके कुछ दृश्यों और डॉयलाग को लेकर बवाल मचा। बेशक एक फिल्मकार को अधिकार है कि वह फिल्मों का निर्माण करे। लेकिन उसका उत्तरदायित्व भी है कि वह धर्म, संस्कृति और इतिहास को पढ़े-समझे और उसकी वास्तविकताओं एवं भावनाओं का ख्याल रखकर फिल्मों का निर्माण करे। उसे ध्यान रखना चाहिए कि फिल्मों के जरिए समाज के नैसर्गिक स्वभाव और आस्था पर बुरा असर न पड़े। यह उचित नहीं कि चंद पैसों के लालच में या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर हिंदू धर्म, संस्कृति और इतिहास पर हमला किया जाए। देखा जा रहा है कि विगत कई दशकों से भारत में हिंदू देवी-देवताओं और सनातन संस्कृति को टारगेट कर फिल्में बनायी जा रही हैं। यह सोच न सिर्फ विघटनकारी और नफरतपूर्ण है बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म, संस्कृति और इतिहास पर प्रहार भी है। दरअसल इसके दो मकसद हैं। एक, हिंदू धर्म को बदनाम करना और दूसरा विवादों के जरिए अकूत संपदा इकठ्ठा करना। विश्वरुपम, हैदर, एमएसजी, पीके, मद्रास कैफे, सिंघम, आरक्षण, माई नेम इज खान, जोधा-अकबर, वाटर, जो बोले सो निहाल और फायर इत्यादि फिल्में इसी तरह का उदाहरण हैं। फिल्मकारों ने यह धारणा पाल रखी है कि फिल्मों पर जितना अधिक बवाल होगा उनकी कमाई में उतना ही इजाफा होगा। बेशक एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज में कहने-सुनने, लिखने-पढ़ने और दिखने-दिखाने की आजादी होनी चाहिए। विशेष रुप से कला के क्षेत्र में तो और भी अधिक। क्योंकि समाज में जो कुछ भी घटित होता है, उसे कला के जरिए पर्दे पर उकेरा जाता है। लेकिन कला और अभिव्यक्ति की आड़ लेकर अरबों कमाने की लालच में किसी धर्म और आस्था पर प्रहार कहां तक उचित है? एक वक्त था जब फिल्मों का कथानक समाज और राष्ट्र के जीवन में चेतना का संचार करता था। युवाओं को प्रेरणा देता था। आजादी की लड़ाई को धार देने से लेकर समाज के गुणसूत्र को बदलने-रचने में फिल्मों की अहम भूमिका रही है। आज भी कुछ फिल्में सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों को उकेरती दिख जाती हैं। लेकिन अधिकांश फिल्में वास्तविकताओं से दूर अतिरंजित और फूहड़पन से लैस होती हैं। नतीजा उन्हें विवादों का विषय बनते देर नहीं लगती। इसमें किसी को आपत्ति नहीं कि फिल्मों का शीर्षक क्या हो अथवा उसका कथानक कैसा हो यह तय करने का अधिकार फिल्म के प्रोड्यूसर और निर्देशक का है। एक फिल्मकार को अधिकार और आजादी है कि वह ऐतिहासिक और धार्मिक कथानकों को फिल्मों के जरिए दुनिया के सामने लाए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह धार्मिकता, ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता के साथ छेड़छाड़ कर आस्था लहूलुहान करे। अगर किसी फिल्म के शीर्षक, कथानक या डॉयलाग से समाज का कोई वर्ग आहत होता है तो इसकी जिम्मेदारी सेंसर बोर्ड की है कि वह इसे पास न करे। याद होगा दिसंबर 2015 में ‘क्या कूल हैं हम’ और ‘मस्तीजादे’ पर सेंसर बोर्ड ने कैंची चलायी थी। ‘क्या कूल हैं हम’ में 107 सीन प्रोड्यूसर ने, जबकि 32 सीन सेंसर बोर्ड ने काटे थे। इसी तरह ‘मस्तीजादे’ में 349 सीन प्रोड्यूसर ने जबकि 32 सीन सेंसर बोर्ड ने काटे थे। इसके बाद भी इन फिल्मों को ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ रिलीज की अनुमति दी गयी। नवंबर 2015 में जेम्स बांड की सीरिज की 24 वीं फिल्म ‘स्पेक्टर’ के एक दृश्य पर भी सेंसर बोर्ड ने कैंची चलायी गयी थी। सवाल लाजिमी है कि फिर किसी फिल्म का नाम ‘घुसखोर पंडित’ कैसे रख दिया गया। इस अनुचित और अविवेकपूर्ण टाईटल पर कैंची क्यों नहीं चलायी गई? उचित होगा कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड अथवा भारतीय सेंसर बोर्ड फिल्मों के अनुचित टाईटल, दृश्यों और अनर्गल संवादों पर तत्काल कैंची चलाए ताकि देश-समाज का माहौल विषाक्त न बने और न ही किसी की भावना को ठेस पहुंचे।

स्कूल असेंबली में गूंज रहीं देश-दुनिया की खबरें, छात्रों की बढ़ रही जागरूकता

देशभर के स्कूलों में अब सुबह की प्रार्थना सभा केवल प्रार्थना और अनुशासन तक सीमित नहीं रह गई है। यहां रोज़ाना देश और दुनिया की ताज़ा खबरें सुनाई जा रही हैं, जिससे विद्यार्थियों की सामान्य ज्ञान क्षमता मजबूत हो रही है और वे वर्तमान घटनाक्रम से अपडेट रह रहे हैं।
शिक्षाविदों का मानना है कि स्कूल असेंबली में समाचार वाचन की परंपरा बच्चों को जागरूक नागरिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। राष्ट्रीय घटनाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों तक की जानकारी छात्रों को दी जा रही है, ताकि वे व्यापक दृष्टिकोण विकसित कर सकें।
हाल के दिनों में शिक्षा, विज्ञान, खेल, पर्यावरण और तकनीक से जुड़ी खबरें असेंबली का हिस्सा बनी हैं। डिजिटल शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर सरकार के बढ़ते फोकस की जानकारी भी विद्यार्थियों को दी जा रही है। साथ ही, खेल जगत में भारतीय खिलाड़ियों की उपलब्धियां बच्चों में प्रेरणा का संचार कर रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही आर्थिक बैठकों, पर्यावरण संरक्षण की पहल और अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़ी खबरों को भी सरल भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि छात्र वैश्विक घटनाओं को समझ सकें।
विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित समाचार वाचन से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ता है, भाषा कौशल बेहतर होता है और सार्वजनिक मंच पर बोलने की क्षमता विकसित होती है। यही कारण है कि कई विद्यालयों में अब समाचार पढ़ने की जिम्मेदारी छात्रों को ही सौंपी जा रही है।
विद्यालय प्रशासन का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य बच्चों को सिर्फ पाठ्यपुस्तक तक सीमित न रखकर उन्हें समाज और राष्ट्र की गतिविधियों से जोड़ना है।
स्पष्ट है कि स्कूल असेंबली में समाचार वाचन की यह परंपरा विद्यार्थियों को जिम्मेदार, सजग और जागरूक नागरिक बनाने की दिशा में प्रभावी साबित हो रही है।

तिरुपति लड्डू घी प्रकरण: CBI की चार्जशीट से उठा आस्था और व्यवस्था पर बड़ा सवाल

नई दिल्ली / तिरुपति।
देश के सबसे प्रतिष्ठित और आस्था से जुड़े धार्मिक स्थलों में शामिल तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) से जुड़ा एक गंभीर मामला अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच गया है। लड्डू प्रसाद निर्माण में उपयोग किए गए घी की आपूर्ति को लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने विस्तृत जांच के बाद अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी है।
यह मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि तिरुपति मंदिर में वितरित होने वाला लड्डू प्रसाद न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का प्रतीक भी माना जाता है।
जांच में क्या सामने आया
CBI-SIT की जांच के अनुसार, प्रसाद निर्माण के लिए वर्षों तक जिस घी की आपूर्ति की गई, उसकी गुणवत्ता, स्रोत और आपूर्ति प्रक्रिया को लेकर कई स्तरों पर अनियमितताएं पाई गईं।
जांच एजेंसी का कहना है कि घी की सप्लाई तय मानकों और प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं थी।
बताया गया है कि यह आपूर्ति लंबे समय तक और बड़ी मात्रा में की गई, जिसकी कुल मात्रा लाखों किलोग्राम तक बताई जा रही है। इसी आपूर्ति श्रृंखला में गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद मामला CBI तक पहुंचा।
चार्जशीट और आगे की प्रक्रिया
CBI ने अपनी जांच पूरी कर संबंधित अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है।
चार्जशीट में आपूर्तिकर्ताओं, संबंधित व्यक्तियों और व्यवस्था से जुड़े कुछ जिम्मेदार पक्षों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। हालांकि, जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय अदालत द्वारा ही किया जाएगा।
CBI सूत्रों के अनुसार, मामले में दस्तावेज़ी साक्ष्य, आपूर्ति रिकॉर्ड और गुणवत्ता जांच रिपोर्ट को आधार बनाया गया है।
आस्था से जुड़ा मामला, इसलिए संवेदनशीलता अधिक
तिरुपति मंदिर में लड्डू प्रसाद की एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है। ऐसे में इस मामले ने आस्था, पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास जैसे मुद्दों को भी केंद्र में ला दिया है।
हालांकि, मंदिर प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में प्रसाद निर्माण और वितरण व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रित और सुरक्षित है, तथा भविष्य में ऐसी किसी भी संभावना को रोकने के लिए सप्लाई सिस्टम को और सख्त किया गया है।
आधिकारिक पक्ष
CBI और प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि
चार्जशीट दाखिल होने के बाद अब मामला अदालत के विचाराधीन है और आगे की कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होगी।
फिलहाल किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।नि

ष्कर्ष

तिरुपति लड्डू घी से जुड़ा यह प्रकरण केवल एक आपूर्ति विवाद नहीं, बल्कि आस्था से जुड़े सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही का मामला बन गया है।
CBI की चार्जशीट के बाद अब सभी की निगाहें अदालत की कार्यवाही और आगे सामने आने वाले तथ्यों पर टिकी हैं।

राजधानी दिल्ली से लापता लोगों के चौंकाने वाले आंकड़े, बच्चों की संख्या ने बढ़ाई चिंता

देश की राजधानी दिल्ली में साल 2026 की शुरुआत ने सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 के पहले 27 दिनों में 807 लोगों के लापता होने के मामले दर्ज किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं?

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक—

कुल लापता मामले: 807

अब तक ट्रेस किए गए लोग: 235

अब भी लापता: 538

लापता बच्चों की संख्या: 137

इन आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो यह सामने आता है कि राजधानी में हर दिन औसतन 27 लोग लापता हुए, जबकि करीब 9 लोगों को प्रतिदिन ट्रेस किया गया।

बच्चों की बढ़ती संख्या बनी सबसे बड़ी चिंता

लापता मामलों में बच्चों की संख्या को लेकर विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है। बाल अधिकारों से जुड़े जानकारों का कहना है कि नाबालिगों के मामलों में शुरुआती 24 से 48 घंटे बेहद अहम होते हैं, ऐसे में समय पर सूचना और सतर्कता की भूमिका और भी बढ़ जाती है।

पुलिस की कार्रवाई और प्रयास

दिल्ली पुलिस द्वारा लापता व्यक्तियों की तलाश के लिए तकनीकी संसाधनों, डेटाबेस और फील्ड लेवल सर्च ऑपरेशन का सहारा लिया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि कई मामलों में लोग स्वेच्छा से घर छोड़ने, मानसिक तनाव, या रोजगार संबंधी कारणों से भी लापता पाए जाते हैं और उन्हें सुरक्षित वापस परिजनों से मिलाया जा रहा है।

यह आंकड़े दर्ज मामलों पर आधारित हैं, जिनमें जांच और तलाश की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है।

विशेषज्ञों की राय

सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि महानगरों में—

जनसंख्या घनत्व

आर्थिक दबाव

पारिवारिक तनाव

डिजिटल और सामाजिक बदलाव

जैसे कारण भी लापता मामलों की संख्या को प्रभावित करते हैं। ऐसे में जनजागरूकता, समय पर शिकायत और सामुदायिक सहयोग बेहद जरूरी है।

प्रशासन और समाज की साझा जिम्मेदारी

यह मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, परिवार और प्रशासन — तीनों की साझा जिम्मेदारी को दर्शाता है। बच्चों और कमजोर वर्ग की सुरक्षा को लेकर सतर्कता और संवाद की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

 

वर्दी हुई शर्मसार..4 लाख रिश्वत लेते इंस्पेक्टर हुआ गिरफ्तार

बेंगलुरू: बीते 31 जनवरी को बेंगलुरु में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत एंटी करप्शन ब्यूरो / लोकायुक्त पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एक पुलिस इंस्पेक्टर को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।

जानकारी के मुताबिक, के.पी. अग्रहार पुलिस स्टेशन में तैनात इंस्पेक्टर गोविंदराजू पर आरोप है कि उन्होंने एक व्यक्ति को धोखाधड़ी के मामले में फंसाने की चेतावनी देते हुए उससे चार लाख रुपये की अवैध मांग की थी। पीड़ित द्वारा शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद सतर्कता एजेंसी ने पूरे मामले की गोपनीय जांच की और फिर जाल बिछाया।

जैसे ही तय योजना के तहत रिश्वत की रकम दी गई, एसीबी की टीम ने मौके पर पहुंचकर इंस्पेक्टर को रंगे हाथों दबोच लिया। कार्रवाई के दौरान इंस्पेक्टर द्वारा कथित तौर पर हंगामा करने और लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश भी सामने आई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

हालांकि, जांच एजेंसी ने तकनीकी और भौतिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तारी की पुष्टि की है। फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारी है और यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस तरह की गतिविधियों में अन्य लोग भी शामिल थे।

इस घटना के बाद पुलिस विभाग में खलबली मच गई है, वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर आम लोगों में चर्चा तेज हो गई है।

 

 

 

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