9 साल से झोपड़ी में परिवार, आवास सूची से नाम हटने का दावा

बर्डपुर नंबर-14 के खैरहवा टोले का मामला, दंपती ने वीडियो वायरल कर मांगा न्याय; पंचायत स्तर पर लगाए गंभीर आरोप
सिद्धार्थनगर। विकास खंड नौगढ़ की ग्राम पंचायत बर्डपुर नंबर-14 के टोला खैरहवा से प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर एक मामला सामने आया है। जयप्रकाश पुत्र गजाधर का परिवार करीब नौ वर्षों से छप्परनुमा मकान में रहने का दावा कर रहा है। परिवार की ओर से जारी तस्वीरों और वीडियो में घास-फूस से बने मकान में परिवार के रहने की स्थिति दिखाई गई है।
जयप्रकाश का कहना है कि वह अपनी पत्नी आशा और दो बच्चों के साथ इसी मकान में रह रहे हैं। परिवार के मुताबिक बारिश के दौरान छप्पर से पानी टपकने की समस्या रहती है और ऐसे मौसम में परिवार को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

आवास योजना की सूची से नाम हटाने का दावा
जयप्रकाश की पत्नी आशा का दावा है कि उनका नाम प्रधानमंत्री आवास योजना की सूची में शामिल था, लेकिन बाद में सूची से उनका नाम हटा दिया गया। महिला का आरोप है कि इसके बाद परिवार को आवास योजना के लाभ से वंचित रहना पड़ा।
आशा के अनुसार, कुछ समय पहले अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर परिवार की स्थिति का निरीक्षण भी किया था। महिला का कहना है कि निरीक्षण के दौरान उन्हें योजना के लिए पात्र बताए जाने की बात कही गई थी। हालांकि इन दावों की पुष्टि सरकारी अभिलेखों से होना बाकी है।

यही वजह है कि पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि परिवार का नाम वास्तव में सूची में था तो उसे किस आधार पर हटाया गया और यदि परिवार अपात्र था तो अपात्रता का आधिकारिक कारण क्या है?
वायरल वीडियो में न्याय की गुहार
मामले को लेकर जयप्रकाश और उनकी पत्नी आशा ने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल किया है। वीडियो में दंपती अपनी आवासीय स्थिति बताते हुए प्रशासन से न्याय की गुहार लगाते और आवास उपलब्ध कराने की मांग करते दिखाई दे रहे हैं।
वीडियो में महिला की ओर से पंचायत स्तर के जिम्मेदारों पर पैसे मांगने और मिलीभगत के आरोप भी लगाए गए हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि FT News Digital द्वारा नहीं की गई है। इसलिए इन आरोपों को तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित महिला द्वारा लगाए गए आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रधान-सचिव पर लगाए आरोप, जांच से साफ होगी तस्वीर
महिला की ओर से ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि आवास को लेकर पैसे की मांग की गई और बाद में उनका नाम सूची से हटा दिया गया।
हालांकि इन आरोपों पर संबंधित ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव का पक्ष इस रिपोर्ट के समय उपलब्ध नहीं है। इसलिए निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए उनका पक्ष सामने आना भी आवश्यक है।
यदि संबंधित पक्ष अपना स्पष्टीकरण देता है तो उसे भी समाचार में उचित स्थान दिया जाएगा।
जातिगत भेदभाव के आरोप भी जांच का विषय
परिवार की ओर से सूची से नाम हटाए जाने के पीछे जातिगत भेदभाव की आशंका भी व्यक्त की गई है। लेकिन इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
ऐसे में किसी व्यक्ति या पंचायत प्रतिनिधि को जातिगत भेदभाव का दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। इस आरोप की सच्चाई भी संबंधित रिकॉर्ड, पात्रता सूची, जांच रिपोर्ट और प्रशासनिक सत्यापन से ही सामने आ सकती है।
पहले आवास मिलने के दावे पर भी रिकॉर्ड जरूरी
मामले में महिला के पूर्व पारिवारिक जीवन और किसी अन्य स्थान पर पहले आवास योजना का लाभ मिलने से संबंधित दावे भी सामने रखे गए हैं।
लेकिन इस संबंध में बिना सरकारी दस्तावेज देखे कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यदि पूर्व में किसी स्थान पर आवास योजना का लाभ मिला था, तो वर्तमान मामले में उसकी प्रासंगिकता क्या है, यह संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और योजना के नियमों के आधार पर ही तय किया जा सकता है।
इसलिए इस बिंदु की भी प्रशासनिक जांच आवश्यक है।
अब प्रशासन के सामने ये सवाल
1. क्या जयप्रकाश के परिवार का नाम प्रधानमंत्री आवास योजना की सूची में था?
2. यदि नाम था तो उसे कब और किस आधार पर हटाया गया?
3. क्या परिवार का आधिकारिक स्थलीय सत्यापन हुआ था?
4. परिवार की वर्तमान पात्रता क्या है?
5. क्या परिवार के किसी सदस्य को पहले आवास योजना का लाभ मिला है?
6. प्रधान और सचिव पर लगाए गए पैसे मांगने के आरोपों की कोई आधिकारिक शिकायत हुई है या नहीं?
7. यदि परिवार पात्र है तो उसे योजना का लाभ क्यों नहीं मिला?
इन सभी सवालों का जवाब सरकारी रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
ग्रामीणों ने भी बताई परिवार की स्थिति
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जयप्रकाश का परिवार लंबे समय से इसी झोपड़ीनुमा मकान में रह रहा है और उनके पास रहने के लिए दूसरा पक्का मकान नहीं है।
ग्रामीणों के इस दावे की भी प्रशासनिक स्तर पर पुष्टि की जा सकती है। यदि प्रशासन मौके पर पहुंचकर स्थलीय सत्यापन करता है तो परिवार की वास्तविक आवासीय स्थिति और योजना की पात्रता दोनों स्पष्ट हो सकती हैं।
मामला आखिर जांच तक क्यों पहुंचे?
एक परिवार का दावा है कि वह करीब नौ वर्षों से झोपड़ी में रह रहा है। आवास योजना की सूची से नाम हटाए जाने का आरोप है। दंपती ने वीडियो वायरल कर प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। पंचायत स्तर पर पैसे मांगने और मिलीभगत के आरोप भी लगाए गए हैं। अब पूरा मामला सरकारी रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।
सारांश
नौ साल से झोपड़ी में रहने का दावा।
आवास सूची से नाम हटने का आरोप।
दंपती का वायरल वीडियो।
प्रधान-सचिव पर गंभीर आरोप।
ग्रामीणों ने भी उठाए सवाल।
अब प्रशासनिक जांच का इंतजार।
टिप्पणी
सरकारी आवास योजना जरूरतमंद परिवारों को सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित की जाती है। इसलिए किसी परिवार की पात्रता को लेकर शिकायत सामने आए तो उसका निष्पक्ष सत्यापन होना जरूरी है।
इस मामले में परिवार ने सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति रखी है और प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। दूसरी तरफ पंचायत स्तर के जिम्मेदारों पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
ऐसे में इस पूरे मामले का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड की जांच और मौके के सत्यापन से होना चाहिए।
यदि परिवार पात्र पाया जाता है तो नियमानुसार उसे योजना का लाभ मिलने का रास्ता साफ होना चाहिए। वहीं यदि वह किसी नियम के कारण पात्र नहीं है तो प्रशासन को कारण स्पष्ट करना चाहिए।
सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह जानने का है कि सरकारी रिकॉर्ड में इस परिवार की वास्तविक स्थिति क्या है और योजना के नियमों के अनुसार इसका हक बनता है या नहीं।
FT News Digital की स्पष्टता
यह समाचार परिवार एवं ग्रामीणों द्वारा बताए गए तथ्यों, उपलब्ध फोटो/वीडियो और उनके द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर तैयार किया गया है। ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक नहीं हुई है। किसी व्यक्ति को दोषी या भ्रष्ट घोषित करना इस समाचार का उद्देश्य नहीं है।
संबंधित ग्राम प्रधान, पंचायत सचिव अथवा किसी अन्य पक्ष का जवाब या स्पष्टीकरण प्राप्त होने पर उसे भी निष्पक्ष रूप से प्रकाशित किया जाएगा।
FT News Digital — सच और कुछ नहीं
एक जरूरी संपादकीय सावधानी: आपकी दी हुई तस्वीरों में परिवार और बच्चों के चेहरे स्पष्ट हैं। बच्चों की पहचान/चेहरा प्रकाशित करने से पहले विशेष सावधानी रखें। और अगर वीडियो में किसी व्यक्ति पर पैसे मांगने का आरोप है, तो “प्रधान ने पैसे मांगे” न लिखें; “महिला ने वीडियो में प्रधान पर पैसे मांगने का आरोप लगाया” लिखना कहीं अधिक सुरक्षित है। प्रेस काउंसिल भी बिना पर्याप्त आधार के किसी व्यक्ति को बदनाम करने वाली सामग्री और संदर्भ से बाहर/अनावश्यक आरोपों से बचने पर जोर देता है। �
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