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हाईकोर्ट के सख्त तेवर: अरेस्ट स्टे के बावजूद गिरफ्तारी पर सरकार को 5 लाख मुआवजा देने का आदेश

इटवा थाना प्रकरण में कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, थाना प्रभारी पर विभागीय कार्रवाई के निर्देश

सिद्धार्थनगर। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी पर रोक (अरेस्ट स्टे) के बावजूद एक युवक को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने के मामले को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को एक माह के भीतर पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।

न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि जब किसी व्यक्ति को न्यायालय से अंतरिम संरक्षण प्राप्त हो चुका हो, तब उसकी गिरफ्तारी करना न्यायालय के आदेश की अवहेलना की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

मामला सिद्धार्थनगर जनपद के इटवा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। न्यायालय में दाखिल याचिका के अनुसार एक युवक के विरुद्ध दुष्कर्म एवं एससी-एसटी एक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। युवक ने उक्त मुकदमे को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय की शरण ली थी, जहां से उसे गिरफ्तारी से अंतरिम राहत प्राप्त हुई थी।

याचिका में आरोप लगाया गया कि न्यायालय द्वारा गिरफ्तारी पर रोक लगाए जाने के बावजूद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इस मामले को पुनः न्यायालय के समक्ष उठाए जाने पर खंडपीठ ने पूरे घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाया।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि जब न्यायालय का आदेश पारित हुआ था, तब सरकारी पक्ष के अधिवक्ता अदालत में मौजूद थे। ऐसे में आदेश की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक न पहुंचने का तर्क स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रदेश में यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है कि या तो न्यायालय के आदेश समय से अधिकारियों तक नहीं पहुंचाए जाते, अथवा कुछ मामलों में आदेशों की अनदेखी की जाती है। न्यायालय ने इसे प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय बताया।

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़ित पक्ष को एक माह के भीतर पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकार उचित समझे तो उक्त धनराशि की वसूली संबंधित जिम्मेदार अधिकारी से की जा सकती है।

न्यायालय ने पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थनगर को 13 जुलाई 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आदेश के अनुपालन में लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय की जा सकती है।

महत्वपूर्ण

यह समाचार न्यायालय के आदेश और उपलब्ध न्यायिक अभिलेखों पर आधारित है। मामले से संबंधित आरोपों एवं तथ्यों का अंतिम सत्यापन न्यायिक प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारियों के निर्णय के अधीन रहेगा।

 

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