एक सेंटर मिला तो पूरे जिले की जांच क्यों नहीं?
सिद्धार्थनगर में अल्ट्रासाउंड सेंटरों की निगरानी पर बड़ा सवाल, कार्रवाई के बावजूद दोबारा संचालन की शिकायत ने बढ़ाई चिंता
सिद्धार्थनगर। जनपद में अल्ट्रासाउंड सेंटरों के संचालन और उनकी निगरानी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल सामने आया है। खुनियांव ब्लॉक के बढ़या चौराहे पर नोडल अधिकारी के आकस्मिक निरीक्षण में एक अल्ट्रासाउंड सेंटर के बिना पंजीकरण संचालित पाए जाने की जानकारी सामने आने के बाद अब सवाल केवल एक सेंटर तक सीमित नहीं रह गया है।
जानकारी के अनुसार सिद्धार्थ पैथालॉजी एंड दीक्षा पाली क्लिनिक में निरीक्षण के दौरान अल्ट्रासाउंड संबंधी गतिविधियां संचालित मिलीं। उपलब्ध जानकारी में यह भी बताया गया है कि संबंधित संस्थान के विरुद्ध पूर्व में सीलिंग और मुकदमे जैसी कार्रवाई की जा चुकी है। इसके बावजूद दोबारा संचालन की स्थिति सामने आने की बात कही जा रही है।
यदि पूर्व में कार्रवाई हुई थी, तो फिर संचालन कैसे शुरू हुआ?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
अब पूरे सिद्धार्थनगर की हो आकस्मिक जांच
एक स्थान पर निरीक्षण के दौरान यदि नियमों से जुड़ी कमी सामने आती है, तो क्या जिले के बाकी अल्ट्रासाउंड सेंटरों का भी अचानक और निष्पक्ष भौतिक सत्यापन नहीं होना चाहिए?
कितने सेंटर पंजीकृत हैं?
कितनों का पंजीकरण वैध है?
कितने सेंटरों पर पूर्व में कार्रवाई हो चुकी है?
कार्रवाई के बाद उनकी वर्तमान स्थिति क्या है?
और क्या पंजीकरण से संबंधित रिकॉर्ड तथा मौके की वास्तविक स्थिति एक-दूसरे से मेल खाते हैं?
इन सवालों का जवाब कागजों से नहीं, बल्कि जिलेभर में आकस्मिक निरीक्षण से ज्यादा स्पष्ट हो सकता है।
PCPNDT अधिनियम के तहत अल्ट्रासाउंड/इमेजिंग सुविधा वाले संबंधित केंद्रों का पंजीकरण आवश्यक है और Appropriate Authority को निरीक्षण तथा नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई के अधिकार दिए गए हैं।
दो बार कार्रवाई के बाद तीसरी बार संचालन? जांच में सामने आएगा सच
यदि किसी केंद्र के विरुद्ध पहले सीलिंग अथवा मुकदमे की कार्रवाई हुई थी और बाद में उसी स्थान पर किसी दूसरे नाम से संचालन की बात सामने आ रही है, तो यह रिकॉर्ड के आधार पर जांच का विषय है।
क्या नया पंजीकरण हुआ था?
क्या मशीन और संस्था का विवरण विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज था?
क्या पूर्व कार्रवाई के बाद दोबारा निरीक्षण हुआ?
यदि हुआ तो उसकी रिपोर्ट क्या थी?
इन सवालों के जवाब संबंधित विभाग के रिकॉर्ड से ही सामने आने चाहिए।
‘बाबू संभाल रहे हैं’—तो अंतिम जवाबदेही किसकी?
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कामकाज को लेकर अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि “रिकॉर्ड और काम तो बाबू संभाल रहे हैं।”
लेकिन जनहित का सवाल यह है कि यदि पंजीकरण, नवीनीकरण, निरीक्षण और कार्रवाई से जुड़े रिकॉर्ड किसी कर्मचारी के स्तर पर रखे जाते हैं, तो अंतिम निगरानी और जवाबदेही किस अधिकारी की है?
यह किसी कर्मचारी पर आरोप लगाने का सवाल नहीं है।
सवाल सिर्फ इतना है कि व्यवस्था में जिम्मेदारी की स्पष्ट रेखा क्या है और यदि कोई अनधिकृत संचालन सामने आता है तो इसकी जवाबदेही तय कैसे होती है?
क्या सिर्फ एक जगह जांच से पूरी तस्वीर सामने आएगी?
सिद्धार्थनगर में केवल अल्ट्रासाउंड सेंटर ही नहीं, बल्कि निजी अस्पताल, क्लीनिक, पैथालॉजी और अन्य स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों की भी नियमानुसार जांच की आवश्यकता पर सवाल उठ रहे हैं।
यदि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ब्लॉकवार व्यापक आकस्मिक निरीक्षण कराए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करे, तो जिले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
कहां पंजीकरण वैध है, कहां नवीनीकरण लंबित है, कहां पूर्व में कार्रवाई हुई और कार्रवाई के बाद क्या स्थिति है—इन सभी सवालों का रिकॉर्ड आधारित जवाब जनता के सामने आना चाहिए।
सीएमओ कार्यालय से जुड़े सवाल—आरोप नहीं, जवाब की मांग
इस पूरे मामले में निगरानी, पंजीकरण और कार्रवाई से जुड़े काम स्वास्थ्य विभाग के अधिकार क्षेत्र से संबंधित हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि जवाबदेही को लेकर सवाल विभागीय स्तर पर भी उठेंगे।
लेकिन FT News Digital किसी अधिकारी या कर्मचारी पर मिलीभगत, संरक्षण अथवा भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा रहा है।
हमारा सवाल सीधा है—
अगर पूर्व कार्रवाई के बावजूद किसी केंद्र के दोबारा संचालित होने की बात सामने आती है, तो विभागीय रिकॉर्ड में इसकी निगरानी कैसे हुई?
अगर जिले में कहीं और भी ऐसी शिकायतें हैं, तो क्या उनका सत्यापन कराया जाएगा?
और अगर जांच में अनियमितता मिलती है, तो क्या जिम्मेदारी तय होगी?
यही वह सवाल है जिसका जवाब सीएमओ कार्यालय और संबंधित Appropriate Authority के आधिकारिक पक्ष से जनता को मिलना चाहिए।
FT NEWS DIGITAL की पड़ताल का सवाल
एक जगह कमी सामने आई है—अब पूरे सिद्धार्थनगर की आकस्मिक जांच कब होगी?
क्योंकि मामला किसी एक क्लिनिक का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी व्यवस्था और जनता के भरोसे का है।
यदि व्यवस्था सही है तो व्यापक जांच से यह साबित हो जाएगा।
यदि कहीं कमी है तो कार्रवाई से वह सामने आ जाएगी।
जनता को आरोप नहीं, रिकॉर्ड चाहिए।
सवाल नहीं, जवाब चाहिए।
और कार्रवाई हुई है तो उसका असर जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।
नोट: यह रिपोर्ट उपलब्ध जानकारी और निरीक्षण से संबंधित दावों के आधार पर तैयार की गई है। किसी व्यक्ति, अधिकारी, कर्मचारी या संस्था पर मिलीभगत, भ्रष्टाचार या संरक्षण का निष्कर्ष नहीं लगाया जा रहा है। संबंधित विभाग/संस्था का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे खबर में शामिल किया जाएगा। अंतिम तथ्य संबंधित जांच और सक्षम प्राधिकारी की रिपोर्ट से ही निर्धारित होंगे।
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