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एक्सप्रेस-वे की रफ्तार में कटते पेड़, बढ़ती गर्मी

सत्यपाल सिंह कौशिक 

भारत में ‘विकास’ की एक नई परिभाषा लिखी जा रही है, जिसकी चमक चमचमाते एक्सप्रेस-वे से नापी जा रही है।

देश में आधुनिक भारत की तस्वीर गढ़ने के लिए एक्सप्रेस-वे, फोरलेन और सिक्सलेन सड़कों का जाल तेजी से बिछाया जा रहा है। सरकारें इन्हें विकास, निवेश और आर्थिक प्रगति का प्रतीक बताती हैं। बेहतर सड़कें निस्संदेह समय की आवश्यकता हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल लगातार बना हुआ है, क्या विकास की इस दौड़ में पेड़ों का सामूहिक संहार भी अनिवार्य है? यदि नहीं, तो फिर करोड़ों लोगों को भीषण गर्मी, घटती वर्षा और बिगड़ते पर्यावरण की कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है।

कुछ दशक पहले तक देश की अधिकांश सड़कों के दोनों ओर नीम, पीपल, बरगद, इमली और आम जैसे विशाल वृक्षों की हरियाली दिखाई देती थी। तपती दोपहर में राहगीर उनकी छांव में विश्राम करते थे। ट्रक चालक, किसान, मजदूर और आम नागरिक इन्हीं पेड़ों के नीचे राहत पाते थे। आज वही सड़कें चौड़ी तो हो गई हैं, लेकिन उनकी आत्मा खत्म हो गई है। जहां कभी हरियाली थी, वहां अब कंक्रीट, डामर और धधकती गर्मी है।

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का परिणाम अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता नहीं, बल्कि आम जनता की रोजमर्रा की समस्या बन चुका है। भारतीय मौसम विभाग और विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि देश के अनेक हिस्सों में हीटवेव की अवधि और तीव्रता बढ़ रही है। कई राज्यों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। डामर और कंक्रीट दिनभर गर्मी सोखकर रात तक वातावरण को तपाते रहते हैं। यह स्थिति शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक महसूस की जा रही है।

पेड़ केवल छाया नहीं देते, बल्कि वे प्राकृतिक एयर कंडीशनर की तरह काम करते हैं। वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ऑक्सीजन छोड़ते हैं, मिट्टी में नमी बनाए रखते हैं, भूजल संरक्षण में मदद करते हैं और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखते हैं। जब हजारों-लाखों पेड़ एक साथ काट दिए जाते हैं, तो उसका असर तापमान, वर्षा, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य सभी पर पड़ता है।

सरकारें अक्सर दावा करती हैं कि एक पेड़ काटने के बदले कई पौधे लगाए जाते हैं। लेकिन यह दावा तब खोखला साबित होता है, जब उन पौधों की देखभाल नहीं होती और वे कुछ ही महीनों में सूख जाते हैं। एक 50 वर्ष पुराने बरगद या पीपल का पर्यावरणीय योगदान किसी एक-दो फुट के पौधे से नहीं मापा जा सकता। पौधारोपण केवल फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों तक संरक्षण की जिम्मेदारी है।

सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को हो रही है, जो रोज सड़क पर रहते हैं। पैदल यात्री, साइकिल सवार, किसान, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक और दोपहिया वाहन चालक भीषण गर्मी में बिना किसी छांव के सफर करने को मजबूर हैं। पहले जहां हर कुछ किलोमीटर पर प्राकृतिक विश्राम स्थल मिल जाते थे, आज वहां केवल तपती सड़क और गर्म हवाएं हैं। क्या विकास का यही मॉडल आम नागरिक की सुविधा और स्वास्थ्य की अनदेखी करेगा?

यह भी सच है कि सड़क निर्माण जरूरी है। लेकिन दुनिया के कई देशों ने यह साबित किया है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। सड़कों की डिजाइन ऐसी बनाई जा सकती है जिससे कम से कम पेड़ कटें। जहां कटाई अपरिहार्य हो, वहां परिपक्व वृक्षों का वैज्ञानिक स्थानांतरण, स्थानीय प्रजातियों का बड़े पैमाने पर रोपण और उनकी पांच से दस वर्षों तक निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए। हर एक्सप्रेस-वे के किनारे हरित पट्टी और छायादार विश्राम स्थल विकसित किए जाने चाहिए।

आज आवश्यकता केवल नई सड़कें बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी विकास नीति अपनाने की है जिसमें प्रकृति साझेदार हो, शिकार नहीं। यदि आज भी पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर गंभीरता से रोक नहीं लगी, तो आने वाली पीढ़ियां तेज रफ्तार एक्सप्रेस-वे तो देखेंगी, लेकिन छांव, शुद्ध हवा, संतुलित मौसम और नियमित वर्षा केवल इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी।

विकास की असली पहचान ऊंचे पुल और चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जो इंसान और प्रकृति दोनों का भविष्य सुरक्षित रखे। अब समय आ गया है कि सरकारें केवल किलोमीटर की उपलब्धियां गिनना बंद करें और हर कटे पेड़ का वास्तविक हिसाब भी जनता को दें।

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