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खबर या खुशामद? जब पत्रकारिता से गायब होने लगा सच का लाल पेन

📰 संपादकीय | FT News Digital


जब खबरों में विशेषण बढ़ने लगें, तो समझिए पत्रकारिता सवालों के घेरे में है

“समाचार का पहला धर्म सत्ता को सम्मान देना नहीं, समाज को सच बताना है।”

पत्रकारिता का संकट तब शुरू नहीं होता जब उस पर बाहरी दबाव आता है। असली संकट तब शुरू होता है, जब पत्रकार स्वयं अपनी भाषा से निष्पक्षता का समझौता करने लगता है।

एक दौर था जब संपादकीय डेस्क पर बैठा संपादक खबर के हर शब्द से पूछता था—”क्या यह तथ्य है?” यदि उत्तर ‘नहीं’ होता, तो लाल पेन बिना किसी हिचक के उस शब्द को हटा देता था। क्योंकि पत्रकारिता में विश्वास शब्दों की सादगी से बनता है, विशेषणों की चमक से नहीं।

आज कई समाचारों में ऐसा प्रतीत होता है कि तथ्य पीछे छूट रहे हैं और विशेषण आगे निकल रहे हैं। “माननीय”, “यशस्वी”, “लोकप्रिय”, “आदरणीय” जैसे शब्द यदि समाचार का हिस्सा बनने लगें, तो पाठक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या वह खबर पढ़ रहा है या किसी का प्रचार?

पत्रकारिता किसी का विरोध करने का माध्यम नहीं है, लेकिन किसी का गुणगान करना भी उसका दायित्व नहीं है।

यदि कोई जनप्रतिनिधि, अधिकारी या संस्था वास्तव में उत्कृष्ट कार्य कर रही है, तो उसके निर्णय, उसकी उपलब्धियाँ और जनता का विश्वास स्वयं उसकी पहचान बना देंगे। अखबार का काम प्रमाणपत्र देना नहीं, प्रमाण प्रस्तुत करना है।

इतिहास गवाह है कि महान समाचार संस्थानों की सबसे बड़ी ताकत उनकी निष्पक्ष भाषा थी। वहां खबरें सजाई नहीं जाती थीं, तराशी जाती थीं। शब्दों पर इतना अनुशासन होता था कि एक अनावश्यक विशेषण भी खबर की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बन सकता था।

आज आवश्यकता फिर उसी पत्रकारिता की है— जहाँ प्रेस विज्ञप्ति और समाचार में अंतर साफ दिखाई दे। जहाँ सवाल पूछना अपराध नहीं, पेशे की जिम्मेदारी माना जाए। जहाँ तथ्य किसी पद, व्यक्ति या विचारधारा से बड़े हों।

लोकतंत्र में मीडिया की ताकत उसकी पहुंच से नहीं, उसकी विश्वसनीयता से मापी जाती है। जिस दिन समाचार सत्ता से प्रश्न पूछना छोड़ देता है और केवल प्रशंसा लिखने लगता है, उसी दिन पत्रकारिता का आईना धुंधला होने लगता है।

पत्रकारिता को विशेषणों की नहीं, साहस की आवश्यकता है। उसे अलंकरण नहीं, प्रमाण चाहिए। उसे तालियों की नहीं, जनविश्वास की जरूरत है।

क्योंकि इतिहास हमेशा वही याद रखता है जिसने सच लिखा था—न कि वह जिसने सत्ता के लिए सबसे सुंदर विशेषण चुने थे।

लेखक : अमित ओझा

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 प्रस्तुति : FT News Digital | सच और… कुछ नहीं

एक्सप्रेस-वे की रफ्तार में कटते पेड़, बढ़ती गर्मी

सत्यपाल सिंह कौशिक 

भारत में ‘विकास’ की एक नई परिभाषा लिखी जा रही है, जिसकी चमक चमचमाते एक्सप्रेस-वे से नापी जा रही है।

देश में आधुनिक भारत की तस्वीर गढ़ने के लिए एक्सप्रेस-वे, फोरलेन और सिक्सलेन सड़कों का जाल तेजी से बिछाया जा रहा है। सरकारें इन्हें विकास, निवेश और आर्थिक प्रगति का प्रतीक बताती हैं। बेहतर सड़कें निस्संदेह समय की आवश्यकता हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल लगातार बना हुआ है, क्या विकास की इस दौड़ में पेड़ों का सामूहिक संहार भी अनिवार्य है? यदि नहीं, तो फिर करोड़ों लोगों को भीषण गर्मी, घटती वर्षा और बिगड़ते पर्यावरण की कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है।

कुछ दशक पहले तक देश की अधिकांश सड़कों के दोनों ओर नीम, पीपल, बरगद, इमली और आम जैसे विशाल वृक्षों की हरियाली दिखाई देती थी। तपती दोपहर में राहगीर उनकी छांव में विश्राम करते थे। ट्रक चालक, किसान, मजदूर और आम नागरिक इन्हीं पेड़ों के नीचे राहत पाते थे। आज वही सड़कें चौड़ी तो हो गई हैं, लेकिन उनकी आत्मा खत्म हो गई है। जहां कभी हरियाली थी, वहां अब कंक्रीट, डामर और धधकती गर्मी है।

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का परिणाम अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता नहीं, बल्कि आम जनता की रोजमर्रा की समस्या बन चुका है। भारतीय मौसम विभाग और विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि देश के अनेक हिस्सों में हीटवेव की अवधि और तीव्रता बढ़ रही है। कई राज्यों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। डामर और कंक्रीट दिनभर गर्मी सोखकर रात तक वातावरण को तपाते रहते हैं। यह स्थिति शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक महसूस की जा रही है।

पेड़ केवल छाया नहीं देते, बल्कि वे प्राकृतिक एयर कंडीशनर की तरह काम करते हैं। वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ऑक्सीजन छोड़ते हैं, मिट्टी में नमी बनाए रखते हैं, भूजल संरक्षण में मदद करते हैं और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखते हैं। जब हजारों-लाखों पेड़ एक साथ काट दिए जाते हैं, तो उसका असर तापमान, वर्षा, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य सभी पर पड़ता है।

सरकारें अक्सर दावा करती हैं कि एक पेड़ काटने के बदले कई पौधे लगाए जाते हैं। लेकिन यह दावा तब खोखला साबित होता है, जब उन पौधों की देखभाल नहीं होती और वे कुछ ही महीनों में सूख जाते हैं। एक 50 वर्ष पुराने बरगद या पीपल का पर्यावरणीय योगदान किसी एक-दो फुट के पौधे से नहीं मापा जा सकता। पौधारोपण केवल फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों तक संरक्षण की जिम्मेदारी है।

सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को हो रही है, जो रोज सड़क पर रहते हैं। पैदल यात्री, साइकिल सवार, किसान, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक और दोपहिया वाहन चालक भीषण गर्मी में बिना किसी छांव के सफर करने को मजबूर हैं। पहले जहां हर कुछ किलोमीटर पर प्राकृतिक विश्राम स्थल मिल जाते थे, आज वहां केवल तपती सड़क और गर्म हवाएं हैं। क्या विकास का यही मॉडल आम नागरिक की सुविधा और स्वास्थ्य की अनदेखी करेगा?

यह भी सच है कि सड़क निर्माण जरूरी है। लेकिन दुनिया के कई देशों ने यह साबित किया है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। सड़कों की डिजाइन ऐसी बनाई जा सकती है जिससे कम से कम पेड़ कटें। जहां कटाई अपरिहार्य हो, वहां परिपक्व वृक्षों का वैज्ञानिक स्थानांतरण, स्थानीय प्रजातियों का बड़े पैमाने पर रोपण और उनकी पांच से दस वर्षों तक निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए। हर एक्सप्रेस-वे के किनारे हरित पट्टी और छायादार विश्राम स्थल विकसित किए जाने चाहिए।

आज आवश्यकता केवल नई सड़कें बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी विकास नीति अपनाने की है जिसमें प्रकृति साझेदार हो, शिकार नहीं। यदि आज भी पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर गंभीरता से रोक नहीं लगी, तो आने वाली पीढ़ियां तेज रफ्तार एक्सप्रेस-वे तो देखेंगी, लेकिन छांव, शुद्ध हवा, संतुलित मौसम और नियमित वर्षा केवल इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी।

विकास की असली पहचान ऊंचे पुल और चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जो इंसान और प्रकृति दोनों का भविष्य सुरक्षित रखे। अब समय आ गया है कि सरकारें केवल किलोमीटर की उपलब्धियां गिनना बंद करें और हर कटे पेड़ का वास्तविक हिसाब भी जनता को दें।

तारातला में गोदाम ढहा, मलबे में दबे श्रमिकों को निकालने की जंग जारी

राहत-बचाव अभियान तेज, हादसे के कारणों की जांच शुरू


पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित तारातला क्षेत्र में निर्माणाधीन गोदाम के ढहने से बड़ा हादसा हो गया। घटना के बाद राहत एवं बचाव एजेंसियों ने युद्धस्तर पर अभियान शुरू कर दिया। प्रशासन ने घायलों के उपचार के साथ-साथ हादसे के कारणों की जांच के भी निर्देश दिए हैं।

कोलकाता।

तारातला इलाके में निर्माणाधीन गोदाम का एक हिस्सा अचानक भरभराकर गिर गया, जिससे वहां कार्यरत कई श्रमिक मलबे में दब गए। घटना के तुरंत बाद स्थानीय लोगों ने बचाव कार्य शुरू किया, जिसके बाद पुलिस, दमकल, एनडीआरएफ और अन्य बचाव दल मौके पर पहुंच गए।

बचाव दल भारी मशीनों की सहायता से मलबा हटाकर फंसे लोगों को बाहर निकालने में जुटा है। घायलों को तत्काल नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जबकि मृतकों की पहचान की प्रक्रिया भी जारी है। राहत अभियान पूरा होने तक हताहतों की संख्या में बदलाव संभव है।

प्रशासन का कहना है कि हादसे की परिस्थितियों की गहन जांच कराई जाएगी। निर्माण कार्य में सुरक्षा मानकों का पालन हुआ था या नहीं, इसकी भी जांच की जा रही है। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे केवल प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें और अपुष्ट दावों या अफवाहों से बचें।


मुख्य बिंदु

निर्माणाधीन गोदाम ढहने से बड़ा हादसा

राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी

घायलों का अस्पताल में इलाज

मृतकों की पहचान की प्रक्रिया जारी

हादसे के कारणों की जांच शुरू

सारांश

तारातला गोदाम हादसे ने एक बार फिर निर्माण स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना और घायलों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराना है। जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

 

रेल पटरी के पास आग जलाने से बचें ग्रामीण: NE railway

लखनऊ, 23 अप्रैल, 2026। यात्री सुरक्षा एवं संरक्षित रेल संचालन को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए पूर्वाेत्तर रेलवे, लखनऊ मंडल के मण्डल रेल प्रबन्धक श्री गौरव अग्रवाल द्वारा रेलवे ट्रैक के निकट रहने वाले शहरी एवं ग्रामीण आम जनमानस से अपील की जाती है कि, वे रेलवे ट्रैक के आस पास आग जलाने से पूर्णतः परहेज करें तथा इस संबंध में अतिरिक्त सतर्कता बरतें।

रेलवे ट्रैक एवं यार्ड के निकट झाड़ियों या पटरियों के आसपास सूखी घास, पराली, कूड़ा आदि न जलाएं। ट्रैक के आसपास बस्तियों में स्टोव, अंगीठी, चूल्हा या गैस सिलेंडर का उपयोग बहुत सावधानी से करें। ट्रैक के आस पास के इलाकों में पटाखों , विस्फोटक या किसी भी प्रकार के ज्वलनशील पदार्थ का भण्डारण न करें।

रेलवे प्रशासन द्वारा स्पष्ट किया जाता है कि पटरियों के समीप आग जलाने से रेलवे की महत्वपूर्ण संपत्ति को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। इसके अतिरिक्त, इससे ट्रैक की संरचना, सिग्नलिंग प्रणाली एवं अन्य तकनीकी उपकरणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप रेल संचालन बाधित हो सकता है ,जो यात्रियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार की लापरवाही से किसी भी समय अप्रिय दुर्घटना की संभावना बनी रहती है, जिससे जन-धन की हानि हो सकती है तथा ट्रेनों के आवागमन में अनावश्यक विलंब होता है।

रेल ट्रैक के निकट अथवा रेलवे क्षेत्र में कहीं भी आग लगने की घटना की जानकारी प्राप्त हो, तो तत्काल निकटतम रेलवे स्टेशन, आरपीएफ/जीआरपी थाना तथा रेलवे हेल्पलाइन न0 139 को सूचित करें। यदि कोई व्यक्ति रेलवे ट्रैक या रेलवे सम्पत्ति के आस-पास आग जलाता है या ऐसा करता हुआ पाया जाता है तो उसे रेलवे एक्ट की धारा 151 के तहत पॉच वर्ष तक की जेल अथवा जुर्माना भी हो सकता है। 

पूर्वाेत्तर रेलवे, लखनऊ मंडल प्रशासन सभी नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे रेलवे परिसरों एवं पटरियों के आसपास स्वच्छता बनाये रखें तथा रेलवे की संपत्ति और यात्रियों की सुरक्षा में अपना सहयोग करें।

आपके जनसहयोग से ही सुरक्षित, सुचारु एवं समयबद्ध रेल संचालन सुनिश्चित किया जा सकता है।

 

 

मंडल रेल प्रबंधक ने कर्मियों को किया सम्मानित

लखनऊ 10 अप्रैल 2026। पूर्वाेत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के मंडल रेल प्रबंधक श्री गौरव अग्रवाल ने मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय में सुरक्षित एवं संरक्षित रेल संचालन में उत्कृष्ट योगदान देने वाले संरक्षा से जुड़े परिचालन विभाग के 02, इंजीनियरिंग के 02 तथा विद्युत/परिचालन के 02 सहित कुल 06 रेलवे कर्मचारियों कोे मार्च 2026 माह के लिए “स्टार परफॉर्मर ऑफ द मंथ” संरक्षा पुरस्कार कार्यक्रम में प्रशस्ति पत्र व नगद पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर वरिष्ठ मंडल संरक्षा अधिकारी डॉ. शिल्पी कन्नौजिया एवं वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक श्री प्रसन्न कात्यायन उपस्थित थे।

सम्मानित किये गये कर्मचारियों में श्री उत्तम कुमार ठाकुर (लोको पायलट माल, गोंडा), श्री बलबीर यादव, वरिष्ठ सहायक लोको पायलट, गोंडा, श्री संदीप कुमार यादव, स्टेशन मास्टर, परसा तिवारी, श्री मो० अहमद, कांटा वाला, परसा तिवारी, श्री चन्द्रशेखर निषाद, ट्रैक मेंटेनर, आनंदनगर तथा श्री उमा नाथ ट्रैक मेंटेनर बस्ती शामिल थे।

इस अवसर पर मंडल रेल प्रबंधक श्री गौरव अग्रवाल ने संरक्षा पुरस्कार प्राप्त चयनित कर्मचारियों को बधाई देते हुए कहा कि उनका कार्य के प्रति समर्पण एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन अन्य कर्मचारियों के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी सभी कर्मचारी इसी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करते हुए रेलवे की सुरक्षा, संरक्षा एवं परिचालन व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाएंगे।

 

(महेश गुप्ता)

जनसम्पर्क अधिकारी

पूर्वाेत्तर रेलवे, लखनऊ

लखनऊ की सड़कों पर 126 गोलियां: कैसे ‘श्रीप्रकाश शुक्ला’ बना 90 के दशक का सबसे खौफनाक नाम

रिपोर्ट: सत्यपाल सिंह कौशिक 

लखनऊ, 31 मार्च 1997। सुबह का वक्त, बच्चों की हंसी और रिजल्ट डे की खुशियां… लेकिन कुछ ही पलों में गोलियों की तड़तड़ाहट ने पूरे माहौल को खौफ में बदल दिया। इंदिरानगर की सड़क पर दिनदहाड़े जिस शख्स को बेरहमी से गोलियों से छलनी किया गया, वह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि पूर्वांचल का चर्चित माफिया वीरेंद्र प्रताप शाही था।

और इसी हत्या के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में एक नया नाम गूंज उठा—श्रीप्रकाश शुक्ला।

रिजल्ट डे बना खून-खराबे का दिन

स्प्रिंगडेल स्कूल में बच्चों का रिजल्ट डे था। माता-पिता अपने बच्चों के साथ खुशियां मना रहे थे। तभी अचानक तीन हमलावरों ने इलाके में दहशत फैला दी।

एक के हाथ में पिस्टल, दूसरे के पास स्टेनगन और तीसरा कवर दे रहा था।

हमलावरों ने सड़क पर गिरे वीरेंद्र शाही के चेहरे और सीने पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हमलावरों की बेरहमी ने पूरे शहर को दहला दिया।

साधारण परिवार से अपराध की दुनिया तक का सफर

श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के मामखोर गांव में हुआ था। पिता एक शिक्षक थे और परिवार सामान्य जीवन जी रहा था।

लेकिन 1993 में बहन के साथ हुई छेड़खानी ने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी।

गुस्से में उसने बीच बाजार उस आरोपी की हत्या कर दी।

महज 20 साल की उम्र में उसने पहला मर्डर किया।

यहीं से शुरू हुआ उसका अपराध की दुनिया में खौफनाक सफर।

बैंकॉक से बिहार तक: अपराध का नेटवर्क

पहली हत्या के बाद शुक्ला बैंकॉक भाग गया।

वापस लौटकर वह बिहार के बाहुबली सूरजभान सिंह के संपर्क में आया और उसके गैंग में शामिल हो गया।

उस दौर में रेलवे टेंडर को लेकर पूर्वांचल में दो बड़े नाम हावी थे—

हरिशंकर तिवारी

वीरेंद्र प्रताप शाही

रेलवे ठेकों को लेकर गैंगवार आम बात हो गई थी, और यहीं से शुक्ला की एंट्री ने खेल बदल दिया।

शाही को मारो, AK-47 ले जाओ’

एक पूर्व आईपीएस अधिकारी के मुताबिक, सूरजभान सिंह ने शुक्ला को ऑफर दिया—

“वीरेंद्र शाही को मारो, एक नहीं दो AK-47 दूंगा।”

शुक्ला को आधुनिक हथियारों का शौक था।

यही लालच और बदले की आग उसे सीधे माफिया वर्ल्ड के टॉप टारगेट तक ले गई।

पहली भिड़ंत और 126 गोलियों का खौफ

गोरखपुर में पहली बार शुक्ला ने AK-47 का इस्तेमाल किया, लेकिन शाही बच निकला।

इसके बाद शुक्ला ने ठान लिया—अब शाही को खत्म करना ही होगा।

31 मार्च 1997 को लखनऊ के इंदिरानगर में उसने अपने मिशन को अंजाम दिया।

सड़क पर 100 से ज्यादा गोलियां चलाई गईं

शाही की मौके पर ही मौत हो गई

यह घटना यूपी के अपराध इतिहास की सबसे चर्चित हत्याओं में शामिल हो गई।

राजनीति और सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा

महज 19-20 साल की उम्र में अपराध की दुनिया में कदम रखने वाला शुक्ला जल्द ही इतना खतरनाक बन गया कि—

बड़े नेता

कारोबारी

पुलिस अधिकारी

सभी उसके नाम से डरने लगे।

उसने मुख्यमंत्री की हत्या की सुपारी लेने तक का साहस दिखाया।

STF का गठन और अंत की शुरुआत

श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक इतना बढ़ गया कि 1998 में उत्तर प्रदेश पुलिस को स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का गठन करना पड़ा।

लगातार पीछा और खुफिया ऑपरेशन के बाद आखिरकार—

22 सितंबर 1998

 गाजियाबाद

STF ने एक मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला को ढेर कर दिया।

आखिरी शब्द जो बन गए कहानी

मुठभेड़ में शामिल एक इंस्पेक्टर के अनुसार,

मरते वक्त शुक्ला के आखिरी शब्द थे—

 “जनेऊ का ख्याल तो किया होता…”

यह शब्द आज भी उस दौर की कहानी को और रहस्यमय बना देते हैं।

एक नाम, जिसने पूरे सिस्टम को हिला दिया

श्रीप्रकाश शुक्ला सिर्फ एक अपराधी नहीं, बल्कि 90 के दशक के उस दौर की पहचान बन गया, जब अपराध, राजनीति और सत्ता का खतरनाक गठजोड़ अपने चरम पर था।

 

पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी- कानून बना तो महिलाओं को नौकरी देना बंद कर सकते हैं नियोक्ता

नई दिल्ली। देश में महिलाओं के लिए पीरियड (मेनस्ट्रुअल) लीव को अनिवार्य करने की मांग पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि पीरियड लीव को कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं की नौकरी के अवसरों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। अदालत के इस बयान के बाद देशभर में एक नई बहस छिड़ गई है।

क्या कहा चीफ जस्टिस ने

सुनवाई के दौरान पीठ की अगुवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि मासिक धर्म अवकाश को कानूनन अनिवार्य कर दिया गया तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसा कानून बनने पर यह धारणा बन सकती है कि महिलाओं को काम में अतिरिक्त सुविधा देनी पड़ेगी, जिससे कंपनियां महिलाओं को नियुक्त करने में हिचकिचा सकती हैं।

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि यदि इसे कानून बनाया गया तो कई संस्थान महिलाओं को जिम्मेदारी वाले पद देने से भी बच सकते हैं और यह उनके करियर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

किस मामले में हुई सुनवाई

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई थी, जिसमें देशभर में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए पीरियड लीव नीति लागू करने की मांग की गई थी।

अदालत ने इस याचिका पर सीधे कानून बनाने से इनकार करते हुए कहा कि इस विषय पर नीति बनाना सरकार का काम है, इसलिए केंद्र सरकार इस पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने क्यों जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु रखे —

यदि पीरियड लीव अनिवार्य हुई तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं।

इससे महिलाओं को कम जिम्मेदारी वाले काम दिए जाने का खतरा बढ़ सकता है।

यह भी आशंका है कि इससे महिलाओं को कम सक्षम समझने की मानसिकता मजबूत हो सकती है।

दूसरी ओर क्या है समर्थन का तर्क

पीरियड लीव के समर्थकों का कहना है कि मासिक धर्म के दौरान कई महिलाओं को गंभीर दर्द, थकान और स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं।

इसलिए उन्हें काम या पढ़ाई से एक-दो दिन की छुट्टी मिलना मानवाधिकार और स्वास्थ्य के लिहाज से जरूरी है। कुछ राज्य और निजी कंपनियां पहले से स्वैच्छिक रूप से ऐसी सुविधा दे रही हैं।

देश में पहले से कहां लागू है पीरियड लीव

भारत में कुछ संस्थानों और कंपनियों ने स्वेच्छा से यह सुविधा दी है।

उदाहरण के तौर पर कुछ विश्वविद्यालयों और निजी कंपनियों में मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन यह कानूनन अनिवार्य नहीं है।

क्या आगे बन सकता है कानून

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में कानून बनाने का आदेश नहीं दिया है, लेकिन केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस विषय पर नीति बनाने की संभावना पर विचार कर सकती है।

यानी भविष्य में सरकार चाहे तो इस पर गाइडलाइन या नीति बना सकती है, लेकिन फिलहाल इसे अनिवार्य बनाने का कोई आदेश नहीं दिया गया है।

पीरियड लीव को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने देश में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। एक तरफ इसे महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकार से जुड़ा मुद्दा बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अदालत का मानना है कि इसे कानून बनाना महिलाओं के रोजगार के अवसरों को प्रभावित कर सकता है।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कोई नीति या दिशा-निर्देश जारी करती है या नहीं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: सरकारी योजनाओं से सशक्त होती महिलाएं, फिर भी कई क्षेत्रों में असमानता बरकरार

“नारी तू नारायणी” भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, ममता, त्याग और सृजन का प्रतीक माना गया है। हमारे साहित्य और धर्मग्रंथों में भी नारी को उच्च स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध पंक्तियां “नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग तल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के समतल में” नारी की महानता और उसके महत्व को दर्शाती हैं। भारतीय समाज में नारी को परिवार की आधारशिला और समाज की प्रेरणा शक्ति के रूप में देखा जाता है।

हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के अवसर पर महिलाओं के अधिकार, सम्मान और सशक्तिकरण पर चर्चा होती है। यह दिन न केवल महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देने का अवसर है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि समाज में आज भी कई क्षेत्रों में महिलाओं को समान अधिकार और अवसर के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

महिलाओं के उत्थान के लिए सरकारी योजनाएं

भारत में महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें लगातार विभिन्न योजनाएं चला रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान करना है।

महिलाओं की शिक्षा और उनके जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना शुरू की गई। इस योजना का उद्देश्य समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना और उन्हें शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना है। इस योजना के माध्यम से कई क्षेत्रों में बेटियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और बालिका शिक्षा को बढ़ावा मिला है।

इसी प्रकार बेटियों के भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने के लिए सुकन्या समृद्धि योजना शुरू की गई। इस योजना के तहत माता-पिता अपनी बेटियों के नाम से बचत खाता खोल सकते हैं, जिसमें जमा की गई राशि पर सरकार की ओर से अच्छा ब्याज मिलता है। इससे बेटियों की उच्च शिक्षा और विवाह के लिए आर्थिक सहायता मिलती है।

महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत महिलाओं को स्वरोजगार के लिए बिना गारंटी के ऋण दिया जाता है। इससे महिलाएं छोटे व्यवसाय, दुकान, सिलाई केंद्र, ब्यूटी पार्लर या अन्य स्वरोजगार शुरू कर सकती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को संगठित कर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस मिशन के तहत स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाओं को प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी जाती है। आज हजारों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से छोटे उद्योग और व्यवसाय चला रही हैं।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सरकार ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना चलाई जा रही है। इस योजना के माध्यम से गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य देखभाल के लिए आर्थिक मदद मिलती है।

बदलती सामाजिक स्थिति और बढ़ती भागीदारी

पिछले कुछ दशकों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। पहले जहां महिलाओं को केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित माना जाता था, वहीं आज महिलाएं शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, राजनीति, खेल और व्यवसाय जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

आज भारत की महिलाएं डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, सैनिक, पुलिस अधिकारी और राजनेता के रूप में देश के विकास में योगदान दे रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी महिलाओं की भूमिका तेजी से बदल रही है। वे कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों के माध्यम से परिवार की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

स्वयं सहायता समूहों और सरकारी योजनाओं की मदद से ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और समाज में उनकी पहचान भी मजबूत हुई है। आज कई महिलाएं पंचायतों और स्थानीय प्रशासन में नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं, जिससे ग्रामीण विकास में उनकी भागीदारी बढ़ रही है।

अब भी मौजूद हैं कई चुनौतियां

हालांकि महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, लेकिन आज भी समाज के कई हिस्सों में महिलाएं भेदभाव और असमानता का सामना कर रही हैं। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में अभी भी बेटियों की शिक्षा को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना बेटों को दिया जाता है।

बाल विवाह, घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याएं अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। कई महिलाओं को आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

इसके अलावा कार्यस्थलों पर भी महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई जगहों पर समान कार्य के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है। निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उनकी भागीदारी सीमित रहती है।

सुरक्षा के मुद्दे भी महिलाओं के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। कई महिलाएं आज भी सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षित महसूस करती हैं। ऐसे में समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

सामाजिक सोच में बदलाव की जरूरत

महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए समाज की सोच में बदलाव होना भी आवश्यक है। जब तक महिलाओं को बराबरी का सम्मान और अवसर नहीं मिलेगा, तब तक सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण संभव नहीं होगा।

परिवार और समाज को यह समझना होगा कि महिला केवल घर संभालने वाली नहीं है, बल्कि वह समाज और देश के विकास में समान भागीदार है। बेटियों को भी बेटों की तरह शिक्षा, स्वतंत्रता और अवसर मिलना चाहिए।

जब महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगी, तभी समाज और देश की प्रगति संभव होगी। इसलिए महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता की भावना विकसित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

महिलाएं समाज की आधारशिला हैं। उनके बिना किसी भी समाज या राष्ट्र का विकास संभव नहीं है। सरकार की विभिन्न योजनाओं और समाज में बढ़ती जागरूकता के कारण महिलाओं की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही हैं। फिर भी कई क्षेत्रों में महिलाओं को समान अधिकार और अवसर दिलाने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। समाज के हर वर्ग को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर मिलें।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहां स्त्री की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास रहता है। इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम महिलाओं के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करेंगे और उन्हें आगे बढ़ने के लिए हर संभव सहयोग देंगे। जब महिलाएं सशक्त होंगी, तभी समाज और राष्ट्र सच्चे अर्थों में समृद्ध और विकसित बन सकेगा।

हमसफर बनेंगे IPS केके विश्नोई और IPS अंशिका वर्मा, गोरखपुर से शुरू हुई थी लव स्टोरी

गोरखपुर : पुलिस के दो तेजतर्रार आईपीएस अधिकारियों की प्रेम कहानी अब विवाह के मुकाम तक पहुंच गई है। संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार विश्नोई और बरेली की पुलिस अधीक्षक अंशिका वर्मा जल्द ही शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं। दोनों की शादी 28 मार्च को राजस्थान के बारमेर जिले में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होगी। इससे पहले 27 मार्च को बाड़मेर जिले के धोरीमना गांव में हल्दी और संगीत समारोह आयोजित होगा, जबकि 30 मार्च को जोधपुर के एक रिसोर्ट में भव्य रिसेप्शन रखा जाएगा।

गोरखपुर में शुरू हुई थी लव स्टोरी

दोनों आईपीएस अधिकारियों की प्रेम कहानी की शुरुआत वर्ष 2021 में हुई थी। उस समय गोरखपुर में पोस्टिंग के दौरान उनकी पहली मुलाकात हुई थी। उस समय कृष्ण कुमार बिश्नोई गोरखपुर में एसपी सिटी के पद पर तैनात थे, जबकि अंशिका वर्मा वहां प्रशिक्षण के दौरान अंडर ट्रेनिंग आईपीएस अधिकारी थीं। ड्यूटी के दौरान हुई मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदली और फिर यही दोस्ती समय के साथ एक मजबूत रिश्ते में बदल गई। अब लगभग पांच साल बाद दोनों अपने रिश्ते को शादी के रूप में नई पहचान देने जा रहे हैं।

राजस्थान में होंगे सभी शादी समारोह

दोनों परिवारों की सहमति के बाद शादी की सभी रस्में राजस्थान में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। 27 मार्च को बाड़मेर जिले के धोरीमना गांव में हल्दी और संगीत समारोह होगा। इसके बाद 28 मार्च को विवाह संपन्न होगा। शादी के बाद 30 मार्च को जोधपुर के एक रिसोर्ट में भव्य रिसेप्शन आयोजित किया जाएगा, जिसमें प्रशासनिक सेवा और पुलिस विभाग से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हो सकते हैं।

होली में भी चर्चा में रहे दोनों अधिकारी

हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस की होली के दौरान भी दोनों अधिकारी काफी चर्चा में रहे थे। बरेली में होली समारोह के दौरान एसपी अंशिका वर्मा ने काला चश्मा पहनकर लोकप्रिय गीत “लंदन ठुमकदा” पर डांस किया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ। इसके अगले दिन संभल में एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने भी अनोखे अंदाज में पुलिस लाइन में एंट्री की थी। उन्होंने शिकारी स्टाइल की टोपी पहनकर खुली जिप्सी से फिल्मी गाने पर पुलिसकर्मियों के बीच प्रवेश किया था। उनके इस अंदाज को भी लोगों ने खूब पसंद किया।

राजस्थान के किसान परिवार से आते हैं केके बिश्नोई

आईपीएस कृष्ण कुमार बिश्नोई उत्तर प्रदेश कैडर के 2018 बैच के अधिकारी हैं। उनका जन्म राजस्थान के बाड़मेर जिले के धोरीमना गांव में एक किसान परिवार में हुआ। छह भाई-बहनों में सबसे छोटे बिश्नोई ने बचपन से ही पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। 12वीं के बाद वे दिल्ली चले गए और सेंट स्टीफेन्स कालेज से 2013 में बीए की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने विदेश में पढ़ाई का सपना देखा और फ्रांस सरकार की स्कॉलरशिप हासिल की। उन्हें करीब 40 लाख रुपये की स्कॉलरशिप मिली और उन्होंने पेरिस स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विषय में मास्टर डिग्री प्राप्त की।

विदेश में भी किया महत्वपूर्ण काम

विदेश में पढ़ाई के दौरान बिश्नोई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनुभव हासिल किया। उन्हें यूनाइटेड नेशन के ट्रेड सेंटर में कंसल्टेंट के रूप में काम करने का अवसर मिला, जहां उन्हें लगभग 30 लाख रुपये सालाना का पैकेज मिला। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा और शोध कार्य जारी रखा और बाद में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली, लेकिन दूसरे प्रयास में उन्होंने यूपीएससी परीक्षा पास कर 2018 बैच के आईपीएस अधिकारी बन गए।

पुलिस सेवा में तेजतर्रार छवि

आईपीएस बनने के बाद 2019 में उनकी पहली पोस्टिंग मेरठ के परतापुर थाने में थाना प्रभारी के रूप में हुई। इसके बाद वे मुजफ्फरनगर में एएसपी और बाद में संभल में एसपी के पद पर तैनात हुए। संभल में रहते हुए उन्होंने 100 करोड़ रुपये से अधिक के बीमा धोखाधड़ी घोटाले का खुलासा किया, जिसमें 70 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इसके लिए उन्हें उत्कृष्ट सेवा पुलिस पदक और प्लैटिनम मेडल से सम्मानित किया गया।

अंशिका वर्मा की प्रेरणादायक कहानी

आईपीएस अंशिका वर्मा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की रहने वाली हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नोएडा में हुई। उन्होंने जेएसएस अकेडमी ऑफ टेक्निकल एडुकेशन नोएडा से इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की। उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के दूसरे प्रयास में शानदार सफलता हासिल की और 136 वीं रैंक प्राप्त कर आईपीएस अधिकारी बनीं। उनके पिता उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड से सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं।

पुलिस सेवा में तेजतर्रार पहचान

अंशिका वर्मा की पहली पोस्टिंग आगरा जिले के फतेहपुर सीकरी थाने में ट्रेनी अधिकारी के रूप में हुई। इसके बाद उन्हें गोरखपुर में एएसपी के रूप में तैनाती मिली। वर्तमान में वे बरेली जिले में एसपी के पद पर कार्यरत हैं और अपनी कार्यशैली, अनुशासन और सक्रिय पुलिसिंग के लिए जानी जाती हैं।

सोशल मीडिया पर भी लोकप्रिय

आईपीएस अंशिका वर्मा सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रिय हैं। इंस्टाग्राम पर उनके छह लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। उनके काम और व्यक्तित्व के कारण युवा वर्ग उन्हें काफी पसंद करता है।

नई शुरुआत की ओर कदम

अब दोनों आईपीएस अधिकारी अपने पेशेवर जीवन के साथ-साथ निजी जीवन में भी एक नई शुरुआत करने जा रहे हैं। पुलिस विभाग, प्रशासनिक सेवा और उनके परिचितों के बीच इस शादी को लेकर उत्साह का माहौल है। 28 मार्च को होने वाली यह शादी न केवल दो परिवारों के लिए बल्कि पुलिस विभाग के लिए भी एक खास अवसर बनने जा रही है। सभी लोग इस जोड़ी के सुखद और सफल वैवाहिक जीवन की कामना कर रहे हैं।

28 फरबरी 2026 को आसमान में दिखेगी ग्रहों की परेड, 28 फरवरी की शाम एक साथ नजर आएंगे 6 ग्रह

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यदि आप ग्रहों, उपग्रहों और चांद और सितारों की दुनिया में दिलचस्पी रखते हैं, तो 28 फरवरी की शाम अपनी नजरें आसमान की ओर टिका लीजिए। इस दिन हमारे सौर मंडल के छह ग्रह—बुध (Mercury), शुक्र (Venus), शनि (Saturn), अरुण (Uranus), बरुण(Neptune),और बृहस्पति(Jupiter) , लगभग एक ही कतार में दिखाई देंगे।

क्या होता है ग्रहीय संरेखण या प्लैनेटरी परेड (Planetary Parade)

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह वह खगोलीय स्थिति है जब सौर मंडल के कई ग्रह एक ही समय में आकाश के लगभग एक ही हिस्से में, एक काल्पनिक रेखा (क्रांतिवृत्त Ecliptic) के आसपास दिखाई देते हैं। खगोल वैज्ञानिक रूप से इसका अर्थ है कि सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा लगभग एक ही समतल (plane) में करते हैं।

पृथ्वी से देखने पर वे उसी मार्ग पर एक कतार या चाप (arc) में दिखाई देते हैं। यही दृष्टि-आधारित संरेखण (line-of-sight alignment) होता है, वास्तव में ग्रह अंतरिक्ष में एक सीधी रेखा में पास-पास नहीं होते; वे करोड़ों किलोमीटर दूर अपनी-अपनी कक्षाओं में रहते हैं।

कितने ग्रह हों तो “परेड” कहा जाता है?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 3 या अधिक ग्रह एक साथ दिखाई दें तो सामान्यत: इसे “प्लैनेटरी परेड” कहा जाता है।

4–5 ग्रह नग्न आँखों से दिख जाएँ तो यह अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता है।

6 या उससे अधिक ग्रहों का एक साथ दृश्य होना और भी कम बार होता है।

कैसे और कहाँ देखें?

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला ( तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह अद्भुत खगोलीय नजारा सूर्यास्त के लगभग 30 मिनट बाद शुरू होगा। आपको बस एक ऐसी जगह ढूंढनी है जहाँ से पश्चिमी क्षितिज (Western Horizon) साफ दिखाई दे।

बिना टेलिस्कोप के (नग्न आंखों से): शुक्र, बृहस्पति, बुध और शनि को आप बिना किसी उपकरण के देख पाएंगे। उस दौरान शुक्र ग्रह और बृहस्पति ग्रह की चमक अन्य साथी ग्रहों के मुक़ाबले सबसे ज्यादा दिखाई देगी। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अरुण ग्रह को देखने के लिए किसी अच्छी टेलिस्कोप/दूरबीन या किसी विशेष बिनाकुलर की जरूरत होगी, जबकि नेपच्यून को केवल किसी शक्तिशाली टेलिस्कोप से ही देखा जा सकेगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस दौरान आकाश में चांद का भी साथ होगा और इस शाम चांद भी 92% चमक के साथ बृहस्पति के बेहद करीब (लगभग 4°) पर नजर आएगा, जो इस दृश्य को और भी खूबसूरत बना देगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस प्रकार की खगोलीय घटना को खगोल विज्ञान की भाषा में प्लैनेटरी अलाइनमेंट’ या ग्रहीय संरेखण भी कहा जाता है, हालाँकि यह एक ‘प्लैनेटरी अलाइनमेंट’ या ग्रहीय संरेखण तो है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं जैसे कि समय की कमी इस दौरान बुध (Mercury) और शुक्र (Venus) सूर्यास्त के लगभग तुरंत बाद क्षितिज के नीचे डूब जाएंगे। इसलिए आपके पास इन्हें देखने के लिए बहुत कम समय होगा।

मंगल (Mars) कहाँ है? 

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मंगल इस समय सूर्य की दूसरी ओर होने के कारण इस ‘परेड’ का हिस्सा नहीं बनेगा।

क्या यह सभी ग्रह, हक़ीकत में एक साथ होंगे

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि दूरी से ये ग्रह केवल पृथ्वी से देखने पर एक लाइन में दिखते हैं, अंतरिक्ष में ये एक-दूसरे से करोड़ों किलोमीटर दूर अपनी कक्षाओं में होते हैं।

कैसे देख सकते हैं?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि देखने के लिए ऊंचाई वाली जगह चुनें, यदि सामने ऊंची इमारतें या पेड़ हैं, तो आप नीचे स्थित ग्रहों (बुध और शनि) को नहीं देख पाएंगे। साथ ही मौसम का हाल ख़्याल रखना ही होता है कि इसके लिए आसमान का साफ और बादल रहित होना अनिवार्य है। और कई प्रमुख समस्याओं में से एक जोकि है प्रकाश प्रदूषण इसीलिए इस लाइट पोल्यूशन से भी बचें ,शहर की तेज लाइटों से दूर अंधेरी जगह पर यह नजारा और भी साफ एवं स्पष्ट दिखेगा।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगर आप पहली बार ग्रहों को पहचान रहे हैं, तो थोड़ा सा मुश्किल भी हो सकता है,

क्या क्या दिखाई देगा?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यदि आकाश साफ रहता है, तो इन छह ग्रहों में से केवल चार ग्रहों को ही नग्न आंखों/ (साधारण आंखों) से देखा जा सकेगा। साथ ही यूरेनस ( अरूण ग्रह) और नेपच्यून ( बरुण ग्रह) को देखने के लिए किसी अच्छी दूरबीन (टेलीस्कोप) या (विशेष बिनाकुलर) की आवश्यकता होगी। सच तो यही है कि यहाँ तक कि बुध (Mercury) को देख पाना भी कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, जो लोग इन ग्रहों को एक कतार में देखना चाहते हैं, उन्हें 28 फरवरी को सूर्यास्त के लगभग 25 से 30 मिनट बाद पश्चिम दिशा के आकाश की तरफ़ देखना चाहिए। लेकिन अगर आपको और भी अधिक स्पष्ट एवं सार्थक नज़ारा देखना है तब एक शर्त है कि इसके लिए साफ आसमान, पश्चिमी क्षितिज का स्पष्ट दृश्य और बेहतर अवलोकन के लिए किसी अच्छी दूरबीन/टेलीस्कोप या विशेष बिनाकुलर का होना जरूरी है।

इन छह ग्रहों में से चार ग्रह सूर्य के अत्यंत निकट होंगे, जो शाम के उजाले में केवल थोड़े समय के लिए ही दिखाई देंगे, या संभवतः कुछ को साधारण आंखों से बिल्कुल भी दिखाई न दें। शुक्र और बुध क्षितिज (धरती की रेखा) के सबसे करीब होंगे, उनके बाद शनि ग्रह और बरुण ग्रह का स्थान होगा। जबकि अरुण ग्रह और बृहस्पति ग्रह आकाश में काफी ऊंचाई पर स्थित होंगे। इस कारण तीन से अधिक ग्रहों को एक साथ देख पाना एक कठिन चुनौती हो सकती है। क्योंकि अरुण ग्रह बिना दूरबीन के दिखाई ही नहीं देता है।

यह खगोलीय घटना कितनी दुर्लभ है?

खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, 28 फरवरी 2026 को भारत में सूर्यास्त लगभग 6:20 PM (स्थान के अनुसार थोड़ा अलग) पर होगा। ग्रहों को देखने का सबसे अच्छा समय 6:45 PM से 7:15 PM के बीच होगा क्योंकि इसके बाद बुध ग्रह और शुक्र ग्रह और कुछ ही देर बाद में शनि ग्रह भी,क्षितिज से नीचे चले जाएंगे। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मौसम साफ होने पर सामान्यतः अधिकांश रातों में भी कम से कम एक चमकदार ग्रह देखा जा सकता है। या अलग अलग समय में दो भी हो सकते हैं, या कुछ यूं कहें कि आमतौर पर सूर्यास्त के आसपास दो या तीन ग्रह भी दिखाई दे जाते हैं, जोकि उनकी स्थिति एवं समय पर निर्भर करता है कि कब कौनसा ग्रह दिखाई देगा, लेकिन कभी कभार ही बिना किसी खगोलीय उपकरण के चार या पांच चमकदार ग्रहों को एक साथ देखा जा सकता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि चार या पांच ग्रहों का नग्न आंखों (साधारण आंखों) से दिखने वाला स्पष्ट एवं दृश्य संरेखण (Alignment) कई वर्षों में एक बार ही घटित होता है।

वैसे तो समय समय पर ज़्यादातर 

मंगल, बृहस्पति और शनि ग्रह अक्सर रात के आकाश में दिखाई देते हैं। लेकिन जब शुक्र और बुध भी उनके साथ जुड़ जाते हैं, तो चार या पांच ग्रहों का यह मिलन अपने आप में कुछ विशेष हो जाता है। क्योंकि शुक्र और बुध, पृथ्वी की तुलना में सूर्य के बहुत करीब परिक्रमा करते हैं और उनकी कक्षाएं भी छोटी व तेज होती हैं।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि शुक्र ग्रह को उन कुछ महीनों के दौरान और भी स्पष्ट देखा जा सकता है जब वह आकाश में सूर्य से सबसे दूर होता है, और यह सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से कुछ पहले दिखाई देता है। वहीं बुध, जोकि मात्र 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है, या यूं कहें कि बुद्ध ग्रह का वर्ष,पृथ्वी के लगभग 88 दिनों के बराबर होता है,आमतौर पर यह सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले केवल दो सप्ताह या कभी-कभी केवल कुछ दिनों के लिए ही दिखाई देता है।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि अगली ऐसी खगोलीय घटना अक्टूबर 2028 के अंत में घटित होगी, जब सूर्योदय से पहले पांच ग्रह एक साथ दिखाई देंगे। इसके बाद, फरवरी 2034 के अंत में, पांच ग्रह फिर से सूर्यास्त के बाद दिखाई देंगे, हालांकि उस दौरान भी शुक्र और बुध को उतना स्पष्ट देख पाना कुछ चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

क्या सभी 6 ग्रह नग्न आंखों से दिखाई देंगे?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सभी छह ग्रह नग्न आंखों से नहीं दिखाई देंगे।

नग्न आंखों से तेज़ चमक वाले ग्रह: शुक्र, बृहस्पति, शनि, और कभी-कभी बुध देख पाए जाते हैं। यूरेनस और नेप्च्यून के लिए टेलीस्कोप या दूरबीन की ज़रूरत पड़ेगी ही।

क्या होता है दूरी का भ्रम

(Optical Illusion): खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पूरी सौर प्रणाली में भौतिक रूप से एक सीधी रेखा में होने जैसा नहीं होगा, लेकिन पृथ्वी से देखने वाले के दृष्टिकोण से ये लगभग एक विस्तृत रेखा या एक साथ दिखाई देंगे, यह एक दृष्टि-प्रतिबद्ध संरेखण (line-of-sight alignment) है।

क्या होगा धरती पर इसका असर।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सही ज्ञान सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान, इसीलिए सबसे पहले ठीक से जानें उसके बाद ही मानें, और अंधविश्वासों से रखें पूरी दूरी और नहीं होनी चाहिए कोई भी मजबूरी, साथ ही अंधविश्वासों से नाता तोड़ें और विज्ञान से नाता जोड़ें क्योंकि खगोल विज्ञान में किसी भी ग्रहों के पार्श्व प्रभाव धरती पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं डालते (जैसे भूकंप, मौसम में बदलाव या मनोवैज्ञानिक प्रभाव)। एवं इसका कोई भी अनिष्टकारक एवम् अलौकिक प्रभाव पृथ्वी पर रहने वाले लोगों पर कभी भी नहीं होता है।

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