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संकल्प से सिद्धि तक नरेंद्र मोदी की यात्रा

सत्यपाल सिंह कौशिक

(वरिष्ठ स्तंभकार)

गुजरात के वडनगर की गलियों से शुरू हुई एक यात्रा आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच चुकी है। 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी का सार्वजनिक जीवन संघर्ष, संगठन, सत्ता और बड़े लक्ष्यों की लंबी यात्रा रहा है। 2014 में देश की बागडोर संभालने के बाद वे 2019 में दोबारा प्रधानमंत्री बने और 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

लेकिन नरेंद्र मोदी की कहानी को केवल चुनावी जीत और सत्ता के आंकड़ों में समेटना इस यात्रा को छोटा कर देना होगा। असल कहानी उस राजनीतिक शैली की है, जिसने पिछले एक दशक से अधिक समय में भारतीय राजनीति की भाषा, प्राथमिकताओं और चुनावी विमर्श को काफी हद तक प्रभावित किया।

मोदी के राजनीतिक सफर में संकल्प शब्द बार-बार सामने आता है। गरीब कल्याण से लेकर डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत तक। सरकार ने बड़े लक्ष्य सामने रखे और उन्हें जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया। जनधन, आधार और मोबाइल जैसी व्यवस्थाओं के जरिए सरकारी लाभ को सीधे लोगों तक पहुंचाने की कोशिश हुई। डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने भी भारत की आर्थिक गतिविधियों में नई संभावनाएं पैदा की हैं।

लेकिन किसी भी सरकार के लिए घोषणाएं अंतिम उपलब्धि नहीं होतीं। असली सवाल जमीन पर परिणाम का होता है। क्या गरीब की जिंदगी बदली? क्या किसान की आय और सुरक्षा मजबूत हुई? क्या युवा को पर्याप्त रोजगार मिला? क्या छोटे कारोबारी के लिए कारोबार करना आसान हुआ? क्या गांव की सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर हुई? यही वे सवाल हैं, जिनके जवाब आने वाले वर्षों में मोदी सरकार के कामकाज का वास्तविक मूल्यांकन तय करेंगे।

मोदी सरकार ने ‘विकसित भारत 2047’ को दीर्घकालिक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में सामने रखा है। इसका अर्थ केवल बड़ी अर्थव्यवस्था बनना नहीं है। विकसित भारत की असली तस्वीर तब बनेगी, जब गांव और शहर के बीच अवसरों की दूरी घटेगी, युवाओं को गुणवत्तापूर्ण रोजगार मिलेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं मजबूत होंगी और भारत तकनीक तथा विनिर्माण के क्षेत्र में वैश्विक क्षमता हासिल करेगा।

यही कारण है कि मोदी के तीसरे कार्यकाल में आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, एमएसएमई, तकनीक और आत्मनिर्भरता पर जोर लगातार दिखाई देता है। 2026 के बजट को लेकर प्रधानमंत्री ने भी विकसित भारत के लक्ष्य से जुड़े सुधारों और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है।

विदेश नीति भी मोदी युग की महत्वपूर्ण पहचान बनी है। भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका को सक्रिय किया है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और योग दिवस जैसे प्रयासों तक, भारत की वैश्विक उपस्थिति को व्यापक बनाने की कोशिश हुई। आज भारत से दुनिया की अपेक्षाएं भी पहले की तुलना में अधिक हैं। इस बढ़ती भूमिका के साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं।

फिर भी लोकतंत्र में किसी नेता का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों की सूची से नहीं होता। सवाल पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। नीतियों के लाभ के साथ उनकी कमियों पर चर्चा भी जरूरी है। रोजगार, महंगाई, कृषि, सामाजिक असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्थाओं की भूमिका और नागरिक स्वतंत्रताओं जैसे विषयों पर देश में लगातार बहस होती रही है। समर्थकों के पास उपलब्धियों के तर्क हैं तो आलोचकों के पास नीतियों और उनके प्रभाव को लेकर सवाल। लोकतंत्र में दोनों पक्षों को सुनना जरूरी है।

नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा का एक और पहलू महत्वपूर्ण है, व्यक्ति से आगे संगठन और संगठन से आगे लक्ष्य को स्थापित करने की उनकी शैली। उनके समर्थक इसे निर्णायक नेतृत्व के रूप में देखते हैं। आलोचक इसे सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण से जोड़कर प्रश्न उठाते हैं। दोनों दृष्टिकोण भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं और इनका मूल्यांकन तथ्यों तथा परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

आज जन्मदिवस पर प्रधानमंत्री के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अब तक तय किए गए बड़े लक्ष्यों को अगले चरण में ठोस परिणामों में बदला जाए। 2047 का भारत केवल नारों से नहीं बनेगा। उसके लिए करोड़ों युवाओं की ऊर्जा, किसानों की समृद्धि, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, मजबूत शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रतिस्पर्धी उद्योग और सक्षम प्रशासन चाहिए।

वडनगर से दिल्ली तक की यह यात्रा बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में साधारण पृष्ठभूमि से आया व्यक्ति भी देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंच सकता है। यही लोकतंत्र की ताकत है। और तभी भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है।

वडनगर से विश्व मंच तक: मोदी के दौर का भारत कितना बदला?

परमात्मा प्रसाद उपाध्याय

जन्मदिन पर व्यक्तित्व का नहीं, फैसलों और उनके परिणामों का हिसाब जरूरी

साढ़े बारह साल किसी सरकार को समझने के लिए कम समय नहीं होता। इतना समय किसी प्रधानमंत्री के राजनीतिक व्यक्तित्व को एक चुनावी नारे से आगे ले जाकर उसकी नीतियों, फैसलों और उनके परिणामों की कसौटी पर परखने के लिए पर्याप्त होता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल को भी अब इसी दृष्टि से देखने का समय है।

17 सितंबर को उनका जन्मदिन है। स्वाभाविक है कि देश में शुभकामनाओं और उपलब्धियों की चर्चा होगी, लेकिन इतिहास की दृष्टि से जन्मदिन का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ आत्ममंथन है—देश ने इस दौर में क्या पाया, क्या खोया और अभी क्या पाना बाकी है?
17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। एक साधारण सामाजिक पृष्ठभूमि से निकलकर संगठन की सीढ़ियां चढ़ते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने तक की उनकी यात्रा भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक संभावनाओं का उल्लेखनीय उदाहरण है। 2019 में दूसरी बार और उसके बाद लगातार सत्ता में बने रहने ने उनके नेतृत्व को भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली अध्यायों में शामिल कर दिया।

मोदी ने केवल सरकार नहीं चलाई, उन्होंने राजनीति करने और शासन को जनता तक पहुंचाने की शैली भी बदली। यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है। वे योजनाओं को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहने देते, उन्हें राजनीतिक अभियान और जनभागीदारी का विषय बना देते हैं। स्वच्छ भारत इसका प्रमुख उदाहरण है। शौचालय और स्वच्छता जैसे मुद्दे लंबे समय तक प्रशासनिक विषय माने जाते थे, लेकिन मोदी ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।

इसी तरह जनधन, आधार, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और डिजिटल भुगतान ने सरकार तथा नागरिक के आर्थिक संबंध को बदलने का प्रयास किया। यूपीआई का विस्तार इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा। आज डिजिटल भुगतान केवल महानगरों की सुविधा नहीं रह गया है। छोटे दुकानदार, ग्रामीण बाजार और आम उपभोक्ता भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
लेकिन यहीं से मूल्यांकन की दूसरी कसौटी शुरू होती है। किसी योजना की सफलता उसके उद्घाटन, विज्ञापन या आंकड़े से नहीं, उसके अंतिम लाभार्थी के जीवन में आए बदलाव से तय होती है। सरकार ने यदि करोड़ों लोगों तक सुविधा पहुंचाने का दावा किया है तो यह भी देखना होगा कि उस सुविधा की गुणवत्ता, निरंतरता और पहुंच कितनी है।

मोदी सरकार के दौर में बुनियादी ढांचे को राजनीतिक प्राथमिकता मिली। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर रेलवे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और वंदे भारत जैसी परियोजनाओं तक विकास को दृश्य रूप दिया गया। यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि बुनियादी ढांचा किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है।

मगर परियोजनाओं की संख्या से आगे बढ़कर यह देखना जरूरी है कि उनका आर्थिक लाभ कितना व्यापक है, रोजगार कितना पैदा हुआ और आम नागरिक के जीवन में कितनी वास्तविक सुविधा आई।
कल्याणकारी योजनाओं का दायरा भी व्यापक हुआ। ‘
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, जल जीवन मिशन, आवास, स्वच्छता, बिजली और वित्तीय समावेशन जैसे कार्यक्रमों ने बुनियादी जरूरतों को शासन की प्राथमिकता में रखा। इन योजनाओं ने गरीब और ग्रामीण भारत को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा है।
मगर किसी भी कल्याणकारी कार्यक्रम की स्थायी सफलता तभी मानी जाएगी जब वह लाभार्थी को सरकारी सहायता पर निर्भर रखने के बजाय उसके जीवन में आत्मनिर्भरता और अवसर पैदा करे।
आस्था और राजनीति के बीच संतुलन

मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व को भारत की सांस्कृतिक चेतना से अलग करके देखना भी संभव नहीं है। भारतीय परंपरा में रामराज्य केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और लोककल्याणकारी शासन की कल्पना भी रहा है। गीता कर्म और कर्तव्य की बात करती है, जबकि भारतीय राजनीतिक चिंतन में शासक की जिम्मेदारी प्रजा के संरक्षण और कल्याण से जुड़ी रही है।

आधुनिक लोकतंत्र में इन धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों का अर्थ संविधान से ऊपर कोई व्यवस्था नहीं हो सकता। आस्था व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की शक्ति हो सकती है, लेकिन शासन की अंतिम कसौटी संविधान, कानून, समान नागरिक अधिकार और संस्थागत जवाबदेही ही रहनी चाहिए।

मोदी की राजनीति ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय गौरव और विकास की आकांक्षा को एक साथ जोड़ा है। समर्थक इसे भारत की आत्मविश्वासी पहचान का पुनरुत्थान मानते हैं। आलोचक इसके भीतर सामाजिक ध्रुवीकरण की आशंका देखते हैं। लोकतंत्र में दोनों दृष्टियों के लिए जगह होनी चाहिए। बहुमत की लोकप्रियता महत्वपूर्ण है, लेकिन अल्पमत की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

विदेश नीति में आत्मविश्वास

मोदी युग की दूसरी बड़ी पहचान विदेश नीति है। भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ के साथ संबंधों को एक साथ साधने की कोशिश की है। बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना आसान नहीं है। चीन और पश्चिम के बीच बढ़ते तनाव तथा रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसी परिस्थितियों ने भारत के सामने जटिल कूटनीतिक चुनौतियां रखी हैं।

BRICS जैसे मंचों पर सक्रियता और ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रमुखता देना भारत की बढ़ती कूटनीतिक महत्वाकांक्षा का संकेत है। प्रधानमंत्री की लगातार विदेश यात्राओं और विश्व नेताओं से संवाद ने भारत की दृश्यता बढ़ाई है। लेकिन विदेश नीति की असली सफलता कैमरों के सामने होने वाली मुलाकातों से नहीं, बल्कि व्यापार, तकनीक, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा और वैश्विक निर्णयों में भारत की वास्तविक क्षमता से मापी जाएगी।

इजराइल के साथ भारत के संबंधों में भी मोदी काल में नई सक्रियता दिखाई दी। सुरक्षा और तकनीक से लेकर पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति तक भारत को संतुलन साधना पड़ रहा है। यही संतुलन भविष्य की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगा।
सुरक्षा और राष्ट्रवाद
राष्ट्रीय सुरक्षा मोदी की राजनीति का केंद्रीय विषय रही है। आतंकवाद के खिलाफ कठोर नीति, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, सैन्य आधुनिकीकरण और रणनीतिक क्षमता बढ़ाने पर जोर ने सुरक्षा को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।

यहां भी बहस के दोनों पक्ष हैं। समर्थकों के लिए यह निर्णायक नेतृत्व का प्रमाण है, जबकि आलोचक सुरक्षा और राष्ट्रवाद के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठाते हैं।

लोकतंत्र में राष्ट्रहित के नाम पर सवाल बंद नहीं होने चाहिए और आलोचना के नाम पर राष्ट्रीय सुरक्षा की वास्तविक चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संतुलन और पारदर्शिता ही दोनों के बीच रास्ता निकाल सकती है।
आर्थिक विकास की अगली परीक्षा
मोदी सरकार के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था और डिजिटल ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। मगर आर्थिक सफलता का सवाल केवल जीडीपी के आकार या विकास दर तक सीमित नहीं है। रोजगार की गुणवत्ता, युवाओं के लिए अवसर, छोटे कारोबार की स्थिति, कृषि आय, महंगाई और आय-वितरण जैसे प्रश्न उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। यदि युवाओं को उनकी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिलता तो जनसांख्यिकीय लाभांश दबाव में बदल सकता है। ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब विकास का अनुभव आंकड़ों के साथ-साथ परिवारों की आय, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार में दिखाई दे।

व्यक्ति बनाम संस्थाएं

मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में एक यह है कि उन्होंने नेतृत्व को अत्यधिक प्रभावशाली व्यक्तिगत ब्रांड में बदल दिया। उनकी तस्वीर, भाषण शैली, योजनाओं के नाम और चुनावी संदेश भारतीय राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
लेकिन यही उनकी राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती भी है।
लोकप्रिय नेता लोकतंत्र को ऊर्जा दे सकता है, मगर लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति से बड़ा होता है। संसद में बहस, विपक्ष की भूमिका, मीडिया की स्वतंत्रता, संघीय ढांचे की मजबूती, न्यायिक और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता तथा नागरिक स्वतंत्रताएं किसी भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण कसौटियां हैं।
सरकार के समर्थक यदि उपलब्धियों का श्रेय प्रधानमंत्री को देते हैं तो आलोचकों को सवाल पूछने का अधिकार भी लोकतंत्र का उतना ही आवश्यक हिस्सा है। लोकप्रियता जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकती।
यही वह क्षेत्र है जहां मोदी की ऐतिहासिक विरासत का फैसला आने वाली पीढ़ियां करेंगी। किसी प्रधानमंत्री ने कितनी योजनाएं शुरू कीं, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उसके शासनकाल में संस्थाएं कितनी मजबूत हुईं।
इतिहास का फैसला अभी बाकी है
मोदी ने भारतीय राजनीति का शब्दकोश बदल दिया है। ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘डिजिटल भारत’, ‘विकसित भारत’ और वैश्विक स्तर पर भारत की बड़ी भूमिका की आकांक्षा अब राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा हैं। यह महत्वाकांक्षा सकारात्मक शक्ति बन सकती है, बशर्ते इसे शिक्षा, रोजगार, विज्ञान, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और संस्थागत सुधार का मजबूत आधार मिले।
इसलिए 17 सितंबर का दिन केवल प्रधानमंत्री को शुभकामना देने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह यह पूछने का भी दिन है कि पिछले साढ़े बारह वर्षों में देश किस दिशा में बढ़ा है।
मोदी के समर्थकों के लिए उनकी यात्रा संघर्ष और उपलब्धि की प्रेरक कहानी है। आलोचकों के लिए यह सत्ता के केंद्रीकरण और राजनीतिक ध्रुवीकरण की बहस है। दोनों के बीच लोकतंत्र का रास्ता मौजूद है—उपलब्धि हो तो श्रेय, कमी हो तो सवाल और हर स्थिति में संविधान सर्वोपरि।
भारत किसी एक नेता से बड़ा है। यही बात हर प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी ऐतिहासिक कसौटी होनी चाहिए।
नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति को बदला है, शासन की शैली को प्रभावित किया है और विश्व मंच पर भारत की आवाज को अधिक मुखर बनाया है। अब असली प्रश्न यह नहीं कि मोदी कितने लोकप्रिय हैं। असली प्रश्न यह है कि उनके बाद का भारत कितना मजबूत होगा।
क्या भारत अधिक समृद्ध होगा?
क्या युवा अधिक रोजगार पाएंगे?
क्या गरीब की जिंदगी अधिक सुरक्षित होगी?
क्या शिक्षा और स्वास्थ्य बेहतर होंगे?
क्या सामाजिक विश्वास मजबूत होगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी मजबूत रहेंगी कि किसी भी व्यक्ति से ऊपर संविधान और नागरिक का अधिकार कायम रहे?
इतिहास अंततः नारों, तस्वीरों और जयकारों से फैसला नहीं करता। वह परिणाम देखता है।
वडनगर से दिल्ली और दिल्ली से विश्व मंच तक पहुंची नरेंद्र मोदी की यात्रा अब भारतीय राजनीति के इतिहास का हिस्सा है। इस यात्रा की अंतिम व्याख्या आने वाला समय करेगा। जन्मदिन पर सबसे सार्थक शुभकामना यही होगी कि उपलब्धियों का ईमानदारी से सम्मान हो, कमियों पर निर्भीकता से सवाल उठें और भारत की संस्थाएं हर राजनीतिक व्यक्तित्व से अधिक मजबूत बनें।
क्योंकि किसी नेता की सबसे बड़ी विरासत उसका अपना कद नहीं, बल्कि उसके बाद भी मजबूत खड़ा रहने वाला देश होता है।

अस्पताल में इलाज या बढ़ता बिल? मरीजों के अधिकार पर उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली। बीमारी के समय मरीज और उसका परिवार डॉक्टर और अस्पताल पर भरोसा करके इलाज शुरू कराता है। लेकिन इलाज के साथ बढ़ता खर्च कई परिवारों के सामने बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि मरीज को दी जा रही हर जांच, हर प्रक्रिया और अस्पताल में रहने की अवधि की जानकारी उसे कितनी स्पष्टता से दी जा रही है?

यह सवाल किसी एक अस्पताल या चिकित्सक पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि मरीजों के अधिकार, इलाज की पारदर्शिता और चिकित्सा खर्च की स्पष्ट जानकारी को लेकर है।

बीमारी के साथ आर्थिक चिंता भी

गंभीर बीमारी में मरीज को कई दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है और बार-बार जांच या विशेष उपचार की वास्तविक चिकित्सकीय आवश्यकता भी हो सकती है। इसलिए लंबे इलाज को अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता।

लेकिन मरीज और उसके परिवार को यह समझने का अधिकार है कि कौन-सी जांच क्यों हो रही है, उपचार की अगली प्रक्रिया क्या है और संभावित खर्च कितना हो सकता है। भारत के मरीज अधिकारों के चार्टर में भी बीमारी, उपचार और अपेक्षित खर्च से संबंधित जानकारी पाने के अधिकार का उल्लेख है।

मरीज पूछ सकता है ये सवाल

• मेरी बीमारी और वर्तमान स्थिति क्या है?

• प्रस्तावित जांच की जरूरत क्यों है?

• इलाज की अनुमानित अवधि कितनी है?

• संभावित खर्च कितना हो सकता है?

• उपचार के विकल्प क्या हैं?

• डिस्चार्ज के बाद किन सावधानियों की जरूरत होगी?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब मरीज और परिवार को इलाज को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकते हैं।

पिपली | हर अतिरिक्त दिन का मतलब गलत इलाज नहीं

अस्पताल में मरीज को अधिक दिनों तक रखना कई बार चिकित्सकीय रूप से जरूरी हो सकता है। गंभीर बीमारी, ऑपरेशन के बाद निगरानी या अन्य चिकित्सा परिस्थितियों में भर्ती की अवधि बढ़ सकती है।

इसलिए केवल बिल अधिक आने या भर्ती लंबी होने के आधार पर किसी अस्पताल या डॉक्टर पर अनावश्यक इलाज या कमाई के लिए मरीज को रोकने का आरोप लगाना उचित नहीं होगा।

बिलिंग में पारदर्शिता क्यों जरूरी?

इलाज के दौरान परिवार को अलग-अलग जांच, दवाओं, कमरे और अन्य सेवाओं का खर्च उठाना पड़ सकता है। हालिया स्वास्थ्य क्षेत्र की एक रिपोर्ट में भी अस्पताल के बिलों की पारदर्शिता को लेकर मरीज परिवारों की चिंता सामने आई है।

ऐसे में मरीज के लिए बिल, मेडिकल रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण हो सकता है। किसी शुल्क या उपचार को लेकर संदेह हो तो अस्पताल से उसका विवरण और स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। मरीज की आवाज सुनी जानी चाहिए

मरीजों के अधिकारों से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज में शिकायत दर्ज कराने और उसके उचित समाधान की व्यवस्था का भी उल्लेख है।

यानी सवाल केवल बिल का नहीं, बल्कि जानकारी, सहमति और जवाबदेही का भी है।

सवाल व्यवस्था से, निशाना किसी एक पर नहीं

स्वास्थ्य क्षेत्र में डॉक्टर और अस्पताल गंभीर परिस्थितियों में मरीजों का उपचार करते हैं। इसलिए किसी पोस्टर या सोशल मीडिया संदेश में उठाए गए सवालों को सीधे किसी पूरे चिकित्सा संस्थान पर आरोप के रूप में पेश करना उचित नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि इलाज की आवश्यकता, खर्च और प्रक्रिया के बारे में मरीज तथा परिवार को पर्याप्त जानकारी मिले और चिकित्सा निर्णय मरीज की वास्तविक स्वास्थ्य जरूरत के आधार पर हों।

अस्पताल में इलाज के दौरान बढ़ते खर्च को लेकर मरीज और परिजनों की चिंता स्वाभाविक है। लेकिन हर महंगा या लंबा इलाज अनावश्यक नहीं माना जा सकता। असली मुद्दा है—इलाज की जरूरत, जांच, अनुमानित खर्च और उपचार की अवधि के बारे में मरीज को स्पष्ट जानकारी मिले। जागरूक मरीज और पारदर्शी चिकित्सा व्यवस्था दोनों ही जरूरी हैं।

यह लेख किसी विशेष अस्पताल, डॉक्टर, कंपनी या चिकित्सा संस्थान पर आरोप नहीं लगाता। इसका उद्देश्य मरीजों को उनके अधिकारों और इलाज में पारदर्शिता के महत्व के प्रति जागरूक करना है। किसी संस्था के खिलाफ अनियमितता का निष्कर्ष केवल प्रमाण, शिकायत की जांच अथवा सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

खबर या खुशामद? जब पत्रकारिता से गायब होने लगा सच का लाल पेन

📰 संपादकीय | FT News Digital


जब खबरों में विशेषण बढ़ने लगें, तो समझिए पत्रकारिता सवालों के घेरे में है

“समाचार का पहला धर्म सत्ता को सम्मान देना नहीं, समाज को सच बताना है।”

पत्रकारिता का संकट तब शुरू नहीं होता जब उस पर बाहरी दबाव आता है। असली संकट तब शुरू होता है, जब पत्रकार स्वयं अपनी भाषा से निष्पक्षता का समझौता करने लगता है।

एक दौर था जब संपादकीय डेस्क पर बैठा संपादक खबर के हर शब्द से पूछता था—”क्या यह तथ्य है?” यदि उत्तर ‘नहीं’ होता, तो लाल पेन बिना किसी हिचक के उस शब्द को हटा देता था। क्योंकि पत्रकारिता में विश्वास शब्दों की सादगी से बनता है, विशेषणों की चमक से नहीं।

आज कई समाचारों में ऐसा प्रतीत होता है कि तथ्य पीछे छूट रहे हैं और विशेषण आगे निकल रहे हैं। “माननीय”, “यशस्वी”, “लोकप्रिय”, “आदरणीय” जैसे शब्द यदि समाचार का हिस्सा बनने लगें, तो पाठक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या वह खबर पढ़ रहा है या किसी का प्रचार?

पत्रकारिता किसी का विरोध करने का माध्यम नहीं है, लेकिन किसी का गुणगान करना भी उसका दायित्व नहीं है।

यदि कोई जनप्रतिनिधि, अधिकारी या संस्था वास्तव में उत्कृष्ट कार्य कर रही है, तो उसके निर्णय, उसकी उपलब्धियाँ और जनता का विश्वास स्वयं उसकी पहचान बना देंगे। अखबार का काम प्रमाणपत्र देना नहीं, प्रमाण प्रस्तुत करना है।

इतिहास गवाह है कि महान समाचार संस्थानों की सबसे बड़ी ताकत उनकी निष्पक्ष भाषा थी। वहां खबरें सजाई नहीं जाती थीं, तराशी जाती थीं। शब्दों पर इतना अनुशासन होता था कि एक अनावश्यक विशेषण भी खबर की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बन सकता था।

आज आवश्यकता फिर उसी पत्रकारिता की है— जहाँ प्रेस विज्ञप्ति और समाचार में अंतर साफ दिखाई दे। जहाँ सवाल पूछना अपराध नहीं, पेशे की जिम्मेदारी माना जाए। जहाँ तथ्य किसी पद, व्यक्ति या विचारधारा से बड़े हों।

लोकतंत्र में मीडिया की ताकत उसकी पहुंच से नहीं, उसकी विश्वसनीयता से मापी जाती है। जिस दिन समाचार सत्ता से प्रश्न पूछना छोड़ देता है और केवल प्रशंसा लिखने लगता है, उसी दिन पत्रकारिता का आईना धुंधला होने लगता है।

पत्रकारिता को विशेषणों की नहीं, साहस की आवश्यकता है। उसे अलंकरण नहीं, प्रमाण चाहिए। उसे तालियों की नहीं, जनविश्वास की जरूरत है।

क्योंकि इतिहास हमेशा वही याद रखता है जिसने सच लिखा था—न कि वह जिसने सत्ता के लिए सबसे सुंदर विशेषण चुने थे।

लेखक : अमित ओझा

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 प्रस्तुति : FT News Digital | सच और… कुछ नहीं

एक्सप्रेस-वे की रफ्तार में कटते पेड़, बढ़ती गर्मी

सत्यपाल सिंह कौशिक 

भारत में ‘विकास’ की एक नई परिभाषा लिखी जा रही है, जिसकी चमक चमचमाते एक्सप्रेस-वे से नापी जा रही है।

देश में आधुनिक भारत की तस्वीर गढ़ने के लिए एक्सप्रेस-वे, फोरलेन और सिक्सलेन सड़कों का जाल तेजी से बिछाया जा रहा है। सरकारें इन्हें विकास, निवेश और आर्थिक प्रगति का प्रतीक बताती हैं। बेहतर सड़कें निस्संदेह समय की आवश्यकता हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल लगातार बना हुआ है, क्या विकास की इस दौड़ में पेड़ों का सामूहिक संहार भी अनिवार्य है? यदि नहीं, तो फिर करोड़ों लोगों को भीषण गर्मी, घटती वर्षा और बिगड़ते पर्यावरण की कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है।

कुछ दशक पहले तक देश की अधिकांश सड़कों के दोनों ओर नीम, पीपल, बरगद, इमली और आम जैसे विशाल वृक्षों की हरियाली दिखाई देती थी। तपती दोपहर में राहगीर उनकी छांव में विश्राम करते थे। ट्रक चालक, किसान, मजदूर और आम नागरिक इन्हीं पेड़ों के नीचे राहत पाते थे। आज वही सड़कें चौड़ी तो हो गई हैं, लेकिन उनकी आत्मा खत्म हो गई है। जहां कभी हरियाली थी, वहां अब कंक्रीट, डामर और धधकती गर्मी है।

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का परिणाम अब केवल पर्यावरणविदों की चिंता नहीं, बल्कि आम जनता की रोजमर्रा की समस्या बन चुका है। भारतीय मौसम विभाग और विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि देश के अनेक हिस्सों में हीटवेव की अवधि और तीव्रता बढ़ रही है। कई राज्यों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। डामर और कंक्रीट दिनभर गर्मी सोखकर रात तक वातावरण को तपाते रहते हैं। यह स्थिति शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक महसूस की जा रही है।

पेड़ केवल छाया नहीं देते, बल्कि वे प्राकृतिक एयर कंडीशनर की तरह काम करते हैं। वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर ऑक्सीजन छोड़ते हैं, मिट्टी में नमी बनाए रखते हैं, भूजल संरक्षण में मदद करते हैं और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखते हैं। जब हजारों-लाखों पेड़ एक साथ काट दिए जाते हैं, तो उसका असर तापमान, वर्षा, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य सभी पर पड़ता है।

सरकारें अक्सर दावा करती हैं कि एक पेड़ काटने के बदले कई पौधे लगाए जाते हैं। लेकिन यह दावा तब खोखला साबित होता है, जब उन पौधों की देखभाल नहीं होती और वे कुछ ही महीनों में सूख जाते हैं। एक 50 वर्ष पुराने बरगद या पीपल का पर्यावरणीय योगदान किसी एक-दो फुट के पौधे से नहीं मापा जा सकता। पौधारोपण केवल फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों तक संरक्षण की जिम्मेदारी है।

सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को हो रही है, जो रोज सड़क पर रहते हैं। पैदल यात्री, साइकिल सवार, किसान, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक और दोपहिया वाहन चालक भीषण गर्मी में बिना किसी छांव के सफर करने को मजबूर हैं। पहले जहां हर कुछ किलोमीटर पर प्राकृतिक विश्राम स्थल मिल जाते थे, आज वहां केवल तपती सड़क और गर्म हवाएं हैं। क्या विकास का यही मॉडल आम नागरिक की सुविधा और स्वास्थ्य की अनदेखी करेगा?

यह भी सच है कि सड़क निर्माण जरूरी है। लेकिन दुनिया के कई देशों ने यह साबित किया है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। सड़कों की डिजाइन ऐसी बनाई जा सकती है जिससे कम से कम पेड़ कटें। जहां कटाई अपरिहार्य हो, वहां परिपक्व वृक्षों का वैज्ञानिक स्थानांतरण, स्थानीय प्रजातियों का बड़े पैमाने पर रोपण और उनकी पांच से दस वर्षों तक निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए। हर एक्सप्रेस-वे के किनारे हरित पट्टी और छायादार विश्राम स्थल विकसित किए जाने चाहिए।

आज आवश्यकता केवल नई सड़कें बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी विकास नीति अपनाने की है जिसमें प्रकृति साझेदार हो, शिकार नहीं। यदि आज भी पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर गंभीरता से रोक नहीं लगी, तो आने वाली पीढ़ियां तेज रफ्तार एक्सप्रेस-वे तो देखेंगी, लेकिन छांव, शुद्ध हवा, संतुलित मौसम और नियमित वर्षा केवल इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी।

विकास की असली पहचान ऊंचे पुल और चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जो इंसान और प्रकृति दोनों का भविष्य सुरक्षित रखे। अब समय आ गया है कि सरकारें केवल किलोमीटर की उपलब्धियां गिनना बंद करें और हर कटे पेड़ का वास्तविक हिसाब भी जनता को दें।

तारातला में गोदाम ढहा, मलबे में दबे श्रमिकों को निकालने की जंग जारी

राहत-बचाव अभियान तेज, हादसे के कारणों की जांच शुरू


पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित तारातला क्षेत्र में निर्माणाधीन गोदाम के ढहने से बड़ा हादसा हो गया। घटना के बाद राहत एवं बचाव एजेंसियों ने युद्धस्तर पर अभियान शुरू कर दिया। प्रशासन ने घायलों के उपचार के साथ-साथ हादसे के कारणों की जांच के भी निर्देश दिए हैं।

कोलकाता।

तारातला इलाके में निर्माणाधीन गोदाम का एक हिस्सा अचानक भरभराकर गिर गया, जिससे वहां कार्यरत कई श्रमिक मलबे में दब गए। घटना के तुरंत बाद स्थानीय लोगों ने बचाव कार्य शुरू किया, जिसके बाद पुलिस, दमकल, एनडीआरएफ और अन्य बचाव दल मौके पर पहुंच गए।

बचाव दल भारी मशीनों की सहायता से मलबा हटाकर फंसे लोगों को बाहर निकालने में जुटा है। घायलों को तत्काल नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जबकि मृतकों की पहचान की प्रक्रिया भी जारी है। राहत अभियान पूरा होने तक हताहतों की संख्या में बदलाव संभव है।

प्रशासन का कहना है कि हादसे की परिस्थितियों की गहन जांच कराई जाएगी। निर्माण कार्य में सुरक्षा मानकों का पालन हुआ था या नहीं, इसकी भी जांच की जा रही है। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे केवल प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें और अपुष्ट दावों या अफवाहों से बचें।


मुख्य बिंदु

निर्माणाधीन गोदाम ढहने से बड़ा हादसा

राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी

घायलों का अस्पताल में इलाज

मृतकों की पहचान की प्रक्रिया जारी

हादसे के कारणों की जांच शुरू

सारांश

तारातला गोदाम हादसे ने एक बार फिर निर्माण स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना और घायलों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराना है। जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

 

रेल पटरी के पास आग जलाने से बचें ग्रामीण: NE railway

लखनऊ, 23 अप्रैल, 2026। यात्री सुरक्षा एवं संरक्षित रेल संचालन को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए पूर्वाेत्तर रेलवे, लखनऊ मंडल के मण्डल रेल प्रबन्धक श्री गौरव अग्रवाल द्वारा रेलवे ट्रैक के निकट रहने वाले शहरी एवं ग्रामीण आम जनमानस से अपील की जाती है कि, वे रेलवे ट्रैक के आस पास आग जलाने से पूर्णतः परहेज करें तथा इस संबंध में अतिरिक्त सतर्कता बरतें।

रेलवे ट्रैक एवं यार्ड के निकट झाड़ियों या पटरियों के आसपास सूखी घास, पराली, कूड़ा आदि न जलाएं। ट्रैक के आसपास बस्तियों में स्टोव, अंगीठी, चूल्हा या गैस सिलेंडर का उपयोग बहुत सावधानी से करें। ट्रैक के आस पास के इलाकों में पटाखों , विस्फोटक या किसी भी प्रकार के ज्वलनशील पदार्थ का भण्डारण न करें।

रेलवे प्रशासन द्वारा स्पष्ट किया जाता है कि पटरियों के समीप आग जलाने से रेलवे की महत्वपूर्ण संपत्ति को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। इसके अतिरिक्त, इससे ट्रैक की संरचना, सिग्नलिंग प्रणाली एवं अन्य तकनीकी उपकरणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप रेल संचालन बाधित हो सकता है ,जो यात्रियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार की लापरवाही से किसी भी समय अप्रिय दुर्घटना की संभावना बनी रहती है, जिससे जन-धन की हानि हो सकती है तथा ट्रेनों के आवागमन में अनावश्यक विलंब होता है।

रेल ट्रैक के निकट अथवा रेलवे क्षेत्र में कहीं भी आग लगने की घटना की जानकारी प्राप्त हो, तो तत्काल निकटतम रेलवे स्टेशन, आरपीएफ/जीआरपी थाना तथा रेलवे हेल्पलाइन न0 139 को सूचित करें। यदि कोई व्यक्ति रेलवे ट्रैक या रेलवे सम्पत्ति के आस-पास आग जलाता है या ऐसा करता हुआ पाया जाता है तो उसे रेलवे एक्ट की धारा 151 के तहत पॉच वर्ष तक की जेल अथवा जुर्माना भी हो सकता है। 

पूर्वाेत्तर रेलवे, लखनऊ मंडल प्रशासन सभी नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे रेलवे परिसरों एवं पटरियों के आसपास स्वच्छता बनाये रखें तथा रेलवे की संपत्ति और यात्रियों की सुरक्षा में अपना सहयोग करें।

आपके जनसहयोग से ही सुरक्षित, सुचारु एवं समयबद्ध रेल संचालन सुनिश्चित किया जा सकता है।

 

 

मंडल रेल प्रबंधक ने कर्मियों को किया सम्मानित

लखनऊ 10 अप्रैल 2026। पूर्वाेत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के मंडल रेल प्रबंधक श्री गौरव अग्रवाल ने मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय में सुरक्षित एवं संरक्षित रेल संचालन में उत्कृष्ट योगदान देने वाले संरक्षा से जुड़े परिचालन विभाग के 02, इंजीनियरिंग के 02 तथा विद्युत/परिचालन के 02 सहित कुल 06 रेलवे कर्मचारियों कोे मार्च 2026 माह के लिए “स्टार परफॉर्मर ऑफ द मंथ” संरक्षा पुरस्कार कार्यक्रम में प्रशस्ति पत्र व नगद पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया। इस अवसर पर वरिष्ठ मंडल संरक्षा अधिकारी डॉ. शिल्पी कन्नौजिया एवं वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक श्री प्रसन्न कात्यायन उपस्थित थे।

सम्मानित किये गये कर्मचारियों में श्री उत्तम कुमार ठाकुर (लोको पायलट माल, गोंडा), श्री बलबीर यादव, वरिष्ठ सहायक लोको पायलट, गोंडा, श्री संदीप कुमार यादव, स्टेशन मास्टर, परसा तिवारी, श्री मो० अहमद, कांटा वाला, परसा तिवारी, श्री चन्द्रशेखर निषाद, ट्रैक मेंटेनर, आनंदनगर तथा श्री उमा नाथ ट्रैक मेंटेनर बस्ती शामिल थे।

इस अवसर पर मंडल रेल प्रबंधक श्री गौरव अग्रवाल ने संरक्षा पुरस्कार प्राप्त चयनित कर्मचारियों को बधाई देते हुए कहा कि उनका कार्य के प्रति समर्पण एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन अन्य कर्मचारियों के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में भी सभी कर्मचारी इसी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करते हुए रेलवे की सुरक्षा, संरक्षा एवं परिचालन व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ बनाएंगे।

 

(महेश गुप्ता)

जनसम्पर्क अधिकारी

पूर्वाेत्तर रेलवे, लखनऊ

लखनऊ की सड़कों पर 126 गोलियां: कैसे ‘श्रीप्रकाश शुक्ला’ बना 90 के दशक का सबसे खौफनाक नाम

रिपोर्ट: सत्यपाल सिंह कौशिक 

लखनऊ, 31 मार्च 1997। सुबह का वक्त, बच्चों की हंसी और रिजल्ट डे की खुशियां… लेकिन कुछ ही पलों में गोलियों की तड़तड़ाहट ने पूरे माहौल को खौफ में बदल दिया। इंदिरानगर की सड़क पर दिनदहाड़े जिस शख्स को बेरहमी से गोलियों से छलनी किया गया, वह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि पूर्वांचल का चर्चित माफिया वीरेंद्र प्रताप शाही था।

और इसी हत्या के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में एक नया नाम गूंज उठा—श्रीप्रकाश शुक्ला।

रिजल्ट डे बना खून-खराबे का दिन

स्प्रिंगडेल स्कूल में बच्चों का रिजल्ट डे था। माता-पिता अपने बच्चों के साथ खुशियां मना रहे थे। तभी अचानक तीन हमलावरों ने इलाके में दहशत फैला दी।

एक के हाथ में पिस्टल, दूसरे के पास स्टेनगन और तीसरा कवर दे रहा था।

हमलावरों ने सड़क पर गिरे वीरेंद्र शाही के चेहरे और सीने पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हमलावरों की बेरहमी ने पूरे शहर को दहला दिया।

साधारण परिवार से अपराध की दुनिया तक का सफर

श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के मामखोर गांव में हुआ था। पिता एक शिक्षक थे और परिवार सामान्य जीवन जी रहा था।

लेकिन 1993 में बहन के साथ हुई छेड़खानी ने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी।

गुस्से में उसने बीच बाजार उस आरोपी की हत्या कर दी।

महज 20 साल की उम्र में उसने पहला मर्डर किया।

यहीं से शुरू हुआ उसका अपराध की दुनिया में खौफनाक सफर।

बैंकॉक से बिहार तक: अपराध का नेटवर्क

पहली हत्या के बाद शुक्ला बैंकॉक भाग गया।

वापस लौटकर वह बिहार के बाहुबली सूरजभान सिंह के संपर्क में आया और उसके गैंग में शामिल हो गया।

उस दौर में रेलवे टेंडर को लेकर पूर्वांचल में दो बड़े नाम हावी थे—

हरिशंकर तिवारी

वीरेंद्र प्रताप शाही

रेलवे ठेकों को लेकर गैंगवार आम बात हो गई थी, और यहीं से शुक्ला की एंट्री ने खेल बदल दिया।

शाही को मारो, AK-47 ले जाओ’

एक पूर्व आईपीएस अधिकारी के मुताबिक, सूरजभान सिंह ने शुक्ला को ऑफर दिया—

“वीरेंद्र शाही को मारो, एक नहीं दो AK-47 दूंगा।”

शुक्ला को आधुनिक हथियारों का शौक था।

यही लालच और बदले की आग उसे सीधे माफिया वर्ल्ड के टॉप टारगेट तक ले गई।

पहली भिड़ंत और 126 गोलियों का खौफ

गोरखपुर में पहली बार शुक्ला ने AK-47 का इस्तेमाल किया, लेकिन शाही बच निकला।

इसके बाद शुक्ला ने ठान लिया—अब शाही को खत्म करना ही होगा।

31 मार्च 1997 को लखनऊ के इंदिरानगर में उसने अपने मिशन को अंजाम दिया।

सड़क पर 100 से ज्यादा गोलियां चलाई गईं

शाही की मौके पर ही मौत हो गई

यह घटना यूपी के अपराध इतिहास की सबसे चर्चित हत्याओं में शामिल हो गई।

राजनीति और सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा

महज 19-20 साल की उम्र में अपराध की दुनिया में कदम रखने वाला शुक्ला जल्द ही इतना खतरनाक बन गया कि—

बड़े नेता

कारोबारी

पुलिस अधिकारी

सभी उसके नाम से डरने लगे।

उसने मुख्यमंत्री की हत्या की सुपारी लेने तक का साहस दिखाया।

STF का गठन और अंत की शुरुआत

श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक इतना बढ़ गया कि 1998 में उत्तर प्रदेश पुलिस को स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का गठन करना पड़ा।

लगातार पीछा और खुफिया ऑपरेशन के बाद आखिरकार—

22 सितंबर 1998

 गाजियाबाद

STF ने एक मुठभेड़ में श्रीप्रकाश शुक्ला को ढेर कर दिया।

आखिरी शब्द जो बन गए कहानी

मुठभेड़ में शामिल एक इंस्पेक्टर के अनुसार,

मरते वक्त शुक्ला के आखिरी शब्द थे—

 “जनेऊ का ख्याल तो किया होता…”

यह शब्द आज भी उस दौर की कहानी को और रहस्यमय बना देते हैं।

एक नाम, जिसने पूरे सिस्टम को हिला दिया

श्रीप्रकाश शुक्ला सिर्फ एक अपराधी नहीं, बल्कि 90 के दशक के उस दौर की पहचान बन गया, जब अपराध, राजनीति और सत्ता का खतरनाक गठजोड़ अपने चरम पर था।

 

पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी- कानून बना तो महिलाओं को नौकरी देना बंद कर सकते हैं नियोक्ता

नई दिल्ली। देश में महिलाओं के लिए पीरियड (मेनस्ट्रुअल) लीव को अनिवार्य करने की मांग पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि पीरियड लीव को कानून के जरिए अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं की नौकरी के अवसरों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। अदालत के इस बयान के बाद देशभर में एक नई बहस छिड़ गई है।

क्या कहा चीफ जस्टिस ने

सुनवाई के दौरान पीठ की अगुवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि मासिक धर्म अवकाश को कानूनन अनिवार्य कर दिया गया तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसा कानून बनने पर यह धारणा बन सकती है कि महिलाओं को काम में अतिरिक्त सुविधा देनी पड़ेगी, जिससे कंपनियां महिलाओं को नियुक्त करने में हिचकिचा सकती हैं।

चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि यदि इसे कानून बनाया गया तो कई संस्थान महिलाओं को जिम्मेदारी वाले पद देने से भी बच सकते हैं और यह उनके करियर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

किस मामले में हुई सुनवाई

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई थी, जिसमें देशभर में कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए पीरियड लीव नीति लागू करने की मांग की गई थी।

अदालत ने इस याचिका पर सीधे कानून बनाने से इनकार करते हुए कहा कि इस विषय पर नीति बनाना सरकार का काम है, इसलिए केंद्र सरकार इस पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने क्यों जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु रखे —

यदि पीरियड लीव अनिवार्य हुई तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं।

इससे महिलाओं को कम जिम्मेदारी वाले काम दिए जाने का खतरा बढ़ सकता है।

यह भी आशंका है कि इससे महिलाओं को कम सक्षम समझने की मानसिकता मजबूत हो सकती है।

दूसरी ओर क्या है समर्थन का तर्क

पीरियड लीव के समर्थकों का कहना है कि मासिक धर्म के दौरान कई महिलाओं को गंभीर दर्द, थकान और स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं।

इसलिए उन्हें काम या पढ़ाई से एक-दो दिन की छुट्टी मिलना मानवाधिकार और स्वास्थ्य के लिहाज से जरूरी है। कुछ राज्य और निजी कंपनियां पहले से स्वैच्छिक रूप से ऐसी सुविधा दे रही हैं।

देश में पहले से कहां लागू है पीरियड लीव

भारत में कुछ संस्थानों और कंपनियों ने स्वेच्छा से यह सुविधा दी है।

उदाहरण के तौर पर कुछ विश्वविद्यालयों और निजी कंपनियों में मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन यह कानूनन अनिवार्य नहीं है।

क्या आगे बन सकता है कानून

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में कानून बनाने का आदेश नहीं दिया है, लेकिन केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस विषय पर नीति बनाने की संभावना पर विचार कर सकती है।

यानी भविष्य में सरकार चाहे तो इस पर गाइडलाइन या नीति बना सकती है, लेकिन फिलहाल इसे अनिवार्य बनाने का कोई आदेश नहीं दिया गया है।

पीरियड लीव को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने देश में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। एक तरफ इसे महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकार से जुड़ा मुद्दा बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अदालत का मानना है कि इसे कानून बनाना महिलाओं के रोजगार के अवसरों को प्रभावित कर सकता है।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कोई नीति या दिशा-निर्देश जारी करती है या नहीं।

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