फ्रेंड्स टाइम्स
Breaking News
नाग पंचमी पर सिमटती गई गुड़िया पीटने की परंपरा, मोबाइल युग में फीकी पड़ी पुराने उत्सव की रौनक

Screenshot 20260817 210130

सिद्धार्थनगर। नाग पंचमी के अवसर पर सिद्धार्थनगर जिला मुख्यालय स्थित पेट्रोल पंप तिराहे पर वर्षों पुरानी गुड़िया पीटने की परंपरा इस बार भी निभाई गई। बच्चों ने गुड़िया पीटकर अपनी परंपरा को आगे बढ़ाया, लेकिन स्थानीय लोगों की यादों में बसे पुराने दौर की तुलना में आयोजन में भीड़ और उत्साह कम नजर आया।

Screenshot 20260817 211807

स्थानीय लोगों के मुताबिक कभी नाग पंचमी के दिन पेट्रोल पंप तिराहे पर बड़ा आयोजन हुआ करता था। दूर-दराज से पहलवान पहुंचते थे, कुश्ती-दंगल आयोजित होते थे और आल्हा गायकों की प्रस्तुतियां भी आयोजन का हिस्सा हुआ करती थीं। लोगों का कहना है कि उस समय इतनी भीड़ जुटती थी कि तिराहे पर लोगों के खड़े होने तक की जगह मुश्किल से मिलती थी।


गुड़िया पीटने की परंपरा क्यों?

नाग पंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लोककथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। एक प्रचलित लोककथा में भगवान शिव के भक्त एक युवक और उसकी बहन का उल्लेख मिलता है। लोकमान्यता के अनुसार, बहन ने भाई को नाग से बचाने के प्रयास में नाग पर प्रहार कर दिया था। इसी घटना की प्रतीकात्मक स्मृति से गुड़िया पीटने की परंपरा जुड़ी होने की बात कही जाती है।

हालांकि इस कथा का स्वरूप लोकमान्यता पर आधारित है, इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। नाग पंचमी का धार्मिक महत्व मुख्य रूप से नाग देवता की पूजा और प्रकृति तथा जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की भावना से जुड़ा माना जाता है।


| कभी दंगल और आल्हा हुआ करते थे आकर्षण

स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक नाग पंचमी के दिन पेट्रोल पंप तिराहा सिर्फ गुड़िया पीटने का स्थान नहीं था, बल्कि लोक मनोरंजन और सामाजिक मेलजोल का भी प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

दूर-दराज से पहलवान आते थे और कुश्ती-दंगल देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे। इसके अलावा आल्हा गायकों का आयोजन भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहता था।

आल्हा की वीरगाथाओं से वातावरण गूंजता था और लोग घंटों तक कार्यक्रम का आनंद लेते थे।

इस बार क्या दिखा?

इस बार बच्चों ने गुड़िया पीटने की परंपरा निभाई, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक पहले जैसी भीड़ और उत्साह दिखाई नहीं दिया।

दंगल और पहलवानों की मौजूदगी की पुरानी तस्वीर भी नजर नहीं आई। इसी तरह आल्हा गायकों के आयोजन की कमी भी लोगों को महसूस हुई।

एक ओर छोटे बच्चे परंपरा में शामिल दिखाई दिए, तो दूसरी ओर उनसे बड़े बच्चे और युवा मोबाइल फोन में व्यस्त नजर आए। कहीं सेल्फी ली जा रही थी तो कहीं मोबाइल पर बातचीत चल रही थी।

स्थानीय महिला ने बताई पुरानी तस्वीर

Screenshot 20260817 210030

आयोजन के दौरान एक स्थानीय महिला से जब पूछा गया कि वह कब से गुड़िया पीटने का उत्सव देख रही हैं, तो उन्होंने बताया कि वह बचपन से इस आयोजन को देखती आ रही हैं।

महिला के मुताबिक पहले यहां बहुत ज्यादा भीड़ होती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे लोगों की संख्या सिमटती जा रही है।

उनकी बात में एक पीढ़ी के सामने बदलती हुई लोक परंपरा की तस्वीर साफ दिखाई देती है।

सारांश

सिद्धार्थनगर के पेट्रोल पंप तिराहे पर नाग पंचमी के दिन गुड़िया पीटने की परंपरा आज भी जारी है, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक समय के साथ इस आयोजन की पुरानी रौनक कम होती गई है।

कभी जहां कुश्ती-दंगल, दूर-दराज से आने वाले पहलवान, आल्हा गायन और बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी आयोजन की पहचान हुआ करती थी, वहीं अब आयोजन अपेक्षाकृत सीमित नजर आता है।

मोबाइल और डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच यह सवाल भी सामने आता है कि आने वाली पीढ़ी को स्थानीय लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से किस तरह जोड़ा जाए।

टिप्पणी

नाग पंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा अपने आप में सिद्धार्थनगर की स्थानीय सांस्कृतिक पहचान का एक हिस्सा है। समय के साथ त्योहारों को मनाने के तरीके बदलना स्वाभाविक है, लेकिन किसी परंपरा का जीवित रहना तभी संभव है जब उसकी कहानी और सांस्कृतिक महत्व भी अगली पीढ़ी तक पहुंचे।

आज मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों और युवाओं की जिंदगी का हिस्सा हैं। तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, लेकिन उसके साथ अपनी लोक संस्कृति, खेल, लोकगीत और पारंपरिक आयोजनों के लिए जगह बनाना भी जरूरी है।

सिद्धार्थनगर की यह तस्वीर शायद यही सवाल पूछ रही है—क्या गुड़िया पीटने की रस्म तो बची रहेगी, लेकिन उसके पीछे की पूरी लोक संस्कृति धीरे-धीरे यादों में सिमट जाएगी?

 

error: कोई भी कंटेंट कॉपी न करें, नहीं तो आप पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।