भूटान में फटा मौत का ग्लेशियर! भारत के कई जिलों में बाढ़ का खतरा, 12 हजार लोगों का रेस्क्यू; अब दूसरी झील ने बढ़ाई टेंशन!
भूटान में ग्लेशियर झील फटने से मची तबाही, भारत के सीमावर्ती जिलों में मचा हड़कंप; 12 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया, अब घटने लगा संकोश नदी का जलस्तर
नई दिल्ली/भूटान। हिमालयी क्षेत्र में प्रकृति के बदलते स्वरूप और ग्लेशियरों से जुड़े खतरों ने एक बार फिर भारत और पड़ोसी देश भूटान की चिंता बढ़ा दी है। भूटान के गासा जिले में 29 अक्टूबर 2026 की शाम शिंटाफू (Sintaphu/Shintaphu) ग्लेशियर झील के अचानक फटने से भीषण बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई। झील से निकला पानी तेज रफ्तार से मो छू नदी में पहुंचा और आगे नदी तंत्र के माध्यम से भारत की ओर बढ़ने लगा। इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा हो गया। संभावित खतरे को देखते हुए प्रशासन ने बड़े पैमाने पर एहतियाती कदम उठाए और हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया।
हालांकि 31 अक्टूबर को सामने आई ताजा रिपोर्टों के अनुसार संकोश नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद तेजी से घटने लगा और पश्चिम बंगाल के प्रभावित क्षेत्रों में बड़ी बाढ़ की आशंका टल गई। लेकिन भूटान में बाढ़ के कारण एक नई अस्थायी झील बनने की सूचना के बाद संभावित दूसरे खतरे को लेकर निगरानी जारी है।
29 अक्टूबर की शाम अचानक फटी ग्लेशियर झील
जानकारी के मुताबिक भूटान के गासा जिले के लेमथांग क्षेत्र में स्थित शिंटाफू ग्लेशियर झील में 29 अक्टूबर की शाम अचानक पानी का दबाव बढ़ने के बाद झील से भारी मात्रा में पानी बाहर निकलने लगा। इस प्राकृतिक घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के अनुमानों के अनुसार झील में लगभग 60 से 70 लाख घन मीटर पानी मौजूद था। कुछ रिपोर्टों में लगभग 74 लाख घन मीटर पानी के बाहर निकलने का अनुमान बताया गया है। हालांकि वास्तविक रूप से कितना पानी बाहर निकला, इसका आकलन किया जा रहा है।
झील से निकला पानी अपने साथ मिट्टी, पत्थर और मलबा लेकर तेज बहाव के साथ नीचे की ओर बढ़ा। इसका सीधा असर भूटान की मो छू नदी और उसके आसपास के इलाकों में देखने को मिला।
गासा में गर्म पानी के प्राकृतिक झरने और सड़क-पुलों को नुकसान
इस प्राकृतिक आपदा का सबसे अधिक असर भूटान के गासा क्षेत्र में देखने को मिला। यहां स्थित प्रसिद्ध गासा त्साचू प्राकृतिक गर्म पानी के झरने का परिसर बाढ़ के पानी में बह गया। इसके अलावा सड़क मार्ग और स्थानीय बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचने की खबर है।
भूटान के स्थानीय समाचार माध्यमों के अनुसार लाया गांव की ओर जाने वाली सड़क का कुछ हिस्सा बह गया, जिसके चलते आवागमन प्रभावित हुआ। दो अस्थायी बेली ब्रिज के भी बह जाने की आशंका जताई गई।
हालांकि शुरुआती रिपोर्टों में किसी व्यक्ति की मौत या घायल होने की पुष्टि नहीं हुई। बताया गया कि खतरे की आशंका को देखते हुए संबंधित क्षेत्र को पहले ही खाली करा लिया गया था।
मो छू नदी से संकोश नदी की ओर बढ़ा पानी
भूटान में झील फटने के बाद सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर थी कि वहां से निकला पानी किस रफ्तार से भारत की ओर पहुंचेगा।
मो छू नदी में पहुंचे बाढ़ के पानी का प्रवाह आगे नदी तंत्र के माध्यम से पुनात्सांगछू और संकोश नदी प्रणाली से जुड़ता है। भारत में प्रवेश करने के बाद संकोश नदी पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण नदी बन जाती है।
इसी वजह से भारतीय अधिकारियों ने संभावित जलस्तर वृद्धि को देखते हुए पश्चिम बंगाल और असम के प्रशासन को सतर्क रहने की सलाह दी।
भारत सरकार ने जारी की विशेष चेतावनी
भूटान में ग्लेशियर झील फटने की सूचना मिलने के बाद भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग (CWC) की ओर से संबंधित राज्यों को विशेष चेतावनी जारी की गई।
चेतावनी में कहा गया कि भूटान के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अचानक पानी बढ़ने से भारत में संकोश नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार और असम के धुबरी जिले के निचले इलाकों में सतर्कता बरतने की जरूरत बताई गई।
प्रारंभिक अनुमान के अनुसार बाढ़ का पानी लगभग छह से आठ घंटे में भारत-भूटान सीमा के आसपास पहुंच सकता था। इसके बाद संबंधित प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को अलर्ट मोड पर रखा गया।
पश्चिम बंगाल के कई जिलों में अलर्ट, हजारों लोगों का सुरक्षित स्थानों पर कराया गया स्थानांतरण
भूटान से आने वाले पानी के संभावित प्रभाव को देखते हुए पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी सहित उत्तर बंगाल के संवेदनशील क्षेत्रों में प्रशासन ने सतर्कता बढ़ा दी।
विशेष रूप से संकोश नदी के किनारे बसे गांवों, चाय बागानों और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई।
अलीपुरद्वार जिले के कुमारग्राम क्षेत्र में प्रशासन ने राहत एवं बचाव की तैयारियां तेज कर दीं। कई स्थानों पर अस्थायी राहत शिविर बनाए गए। लोगों को उनके परिवारों और पशुओं के साथ सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
विभिन्न रिपोर्टों में शुरुआत में 10 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजे जाने की जानकारी सामने आई। बाद में पीटीआई की 30 अक्टूबर की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल प्रशासन के हवाले से लगभग 12 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए जाने की जानकारी दी गई।
प्रशासन की ओर से राहत शिविरों में भोजन, पेयजल और आवश्यक सामग्री की व्यवस्था की गई।
असम के धुबरी और कोकराझार में भी बढ़ाई गई निगरानी
इस घटना का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं था। असम के धुबरी और कोकराझार जिलों के संवेदनशील इलाकों में भी प्रशासन को सतर्क किया गया।
विशेष रूप से संकोश नदी के आसपास रहने वाले लोगों को नदी के जलस्तर पर नजर रखने और किसी भी आपात स्थिति में सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कार्यालय की ओर से भी स्थिति पर नजर रखे जाने की जानकारी दी गई। धुबरी जिला प्रशासन, पुलिस और आपदा प्रबंधन से जुड़ी टीमों को तैयार रहने के निर्देश दिए गए।
राज्य की आपदा प्रबंधन एजेंसियां भूटान से आने वाले पानी और नदी के जलस्तर की निगरानी कर रही थीं।
NDRF और SDRF की टीमें अलर्ट मोड पर
संभावित बाढ़ के खतरे को देखते हुए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF), पुलिस और नागरिक सुरक्षा से जुड़ी टीमों को सतर्क रखा गया।
संवेदनशील क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्य के लिए तैयारियां की गईं। लोगों को नदी के किनारे और निचले इलाकों से दूर रहने की सलाह दी गई।
प्रशासन की प्राथमिकता किसी भी संभावित आपदा से पहले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना और जान-माल के नुकसान को रोकना रही।
31 अक्टूबर की सबसे बड़ी राहत: घटने लगा संकोश नदी का जलस्तर
इस पूरे घटनाक्रम के बीच 31 अक्टूबर को सामने आई ताजा जानकारी लोगों के लिए राहत लेकर आई।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 30 अक्टूबर की सुबह भूटान की ओर से आए पानी के कारण संकोश नदी का जलस्तर सामान्य स्तर से लगभग डेढ़ मीटर तक बढ़ गया था। हालांकि कुछ समय बाद जलस्तर घटने लगा और दोपहर तक स्थिति में सुधार दिखाई देने लगा।
पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में बनाए गए राहत शिविरों में ठहरे लोगों को भी धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौटने की अनुमति दी गई।
प्रशासनिक स्तर पर अब तक पश्चिम बंगाल के प्रभावित क्षेत्रों में इस घटना से किसी बड़ी जनहानि या बड़े नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है।
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल ने लगभग 12 हजार लोगों को एहतियातन सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया था।
लेकिन एक नया खतरा: भूटान में बनी अस्थायी झील
बाढ़ के शुरुआती खतरे में कमी आने के बीच अब एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है।
भूटान के राष्ट्रीय जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान केंद्र (NCHM) के अनुसार बाढ़ के पानी के प्रभाव से टाक्त्सेमाखांग (Taktsemakhang) क्षेत्र में एक नई अस्थायी झील बन गई है।
यह झील सिंटाफू छू और लुंगू छू नदियों के संगम के आसपास बनी बताई गई है।
विशेषज्ञों की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि इस नई झील में पानी का दबाव बढ़ता है या इसका प्राकृतिक अवरोध कमजोर होता है तो दोबारा अचानक पानी निकलने की स्थिति पैदा हो सकती है।
इसी संभावित खतरे को देखते हुए भूटान के जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान केंद्र ने मो छू और पुनात्सांगछू नदी घाटियों के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने, नदी के किनारों और निचले क्षेत्रों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी है।
इसलिए पहली बाढ़ का दबाव कम होने के बावजूद पूरे क्षेत्र में निगरानी जारी रखना जरूरी है।
आखिर क्या है GLOF और क्यों है इतना खतरनाक?
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली एक गंभीर प्राकृतिक आपदा है।
जब ग्लेशियरों के पिघलने से उनके आसपास या सामने पानी जमा होकर बड़ी झील का रूप ले लेता है और किसी कारण से उसका प्राकृतिक बांध टूट जाता है, तो झील का पानी अचानक बहुत तेज गति से नीचे की ओर बहने लगता है।
इस पानी के साथ बड़े-बड़े पत्थर, मिट्टी, पेड़ और मलबा भी बहता है। यही वजह है कि GLOF सामान्य बाढ़ की तुलना में अधिक विनाशकारी साबित हो सकता है।
इसमें कुछ ही घंटों के भीतर नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और नदी के किनारे बसे गांव, सड़कें, पुल तथा अन्य निर्माण इसकी चपेट में आ सकते हैं।
हिमालयी क्षेत्रों के लिए बढ़ती चेतावनी
भूटान की यह घटना एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और उनसे बनने वाली झीलों की निगरानी की आवश्यकता को सामने लाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने, तापमान में बदलाव और पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ऐसी झीलों से अचानक बाढ़ आने का खतरा बना रहता है।
इसलिए भारत और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के बीच समय पर सूचना साझा करना, नदी के जलस्तर की निगरानी करना और आपदा प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था बनाए रखना बेहद जरूरी है।
फिलहाल राहत की बात यह है कि भूटान में ग्लेशियर झील फटने के बाद भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में जिस बड़े जलप्रलय की आशंका जताई जा रही थी, उसका गंभीर प्रभाव पश्चिम बंगाल में देखने को नहीं मिला। संकोश नदी का जलस्तर घटने से हजारों लोगों ने राहत की सांस ली है। लेकिन भूटान में बनी नई अस्थायी झील और संभावित दूसरे खतरे को देखते हुए संबंधित एजेंसियां लगातार निगरानी कर रही हैं।
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