मदद चाहिए? कृपया पहले मरने का कष्ट करें
भारत में लोकतंत्र पूरी तरह जीवित है, बस नागरिक का जीवित रहना थोड़ा असुविधाजनक माना जाने लगा है। यदि आपकी पेंशन अटकी है, इलाज के पैसे नहीं हैं, सड़क टूटी पड़ी है या न्याय वर्षों से लंबित है, तो सबसे बड़ी गलती यही है कि आप अभी तक ज़िंदा हैं। जीवित व्यक्ति आवेदन देता है, दफ्तरों के चक्कर काटता है, निवेदन करता है और बदले में “कल आइए”, “साहब मीटिंग में हैं”, “फाइल ऊपर गई है” या “कुछ व्यवस्था करनी पड़ेगी” जैसे अमर वाक्य प्राप्त करता है। व्यवस्था भी क्या करे, जीवित आदमी में इमरजेंसी वाली चमक नहीं होती, न मीडिया की ब्रेकिंग बनता है, न ट्वीट योग्य संवेदना जगाता है।
लेकिन जैसे ही कोई हादसा होता है, एक मौत, एक आत्महत्या, एक वायरल वीडियो और व्यवस्था में करंट दौड़ जाता है। जहां फाइल महीनों से धूल खा रही थी, वहां एम्बुलेंस से तेज़ फैसले दौड़ने लगते हैं। नेता संवेदना व्यक्त करते हैं, अधिकारी दौरा करते हैं, जांच बैठती है, मुआवजा घोषित होता है और नौकरी का आश्वासन भी मिल जाता है। जो काम जीवित व्यक्ति वर्षों में नहीं करा पाया, वह मृतक कुछ घंटों में कर दिखाता है। जीते जी इलाज के लिए पचास हजार नहीं मिलते, मरने के बाद पांच लाख का मुआवजा मिल जाता है। जीते जी सड़क नहीं बनती, हादसे के बाद रातों-रात डामर बिछ जाता है; जीते जी सुनवाई नहीं होती, मौत के बाद विशेष जांच दल बैठ जाता है। मानो प्रशासन का मौन सूत्र हो, रोकथाम महंगी है, मुआवजा सस्ता पड़ता है।
संवेदनाएं भी अब मानो सरकारी कैलेंडर से संचालित होती हैं। घटना के दो घंटे बाद ट्वीट, छह घंटे बाद दौरा, चौबीस घंटे बाद मुआवजा, अड़तालिस घंटे बाद नई खबर और पुरानी फाइल बंद। धीरे-धीरे नागरिकों के बीच यह धारणा घर करती जा रही है कि जीवित इंसान समस्या है और मृत इंसान “मामला” बन जाता है। यह व्यंग्य जरूर है, पर यदि इसे पढ़कर हँसी नहीं आती तो शायद इसलिए कि सच इसके बहुत करीब खड़ा है।
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