सरकारी पोखरी पर कब्जे की शिकायत से गरमाया मामला, जांच के आदेश से बढ़ी हलचल
सिद्धार्थनगर में सरकारी जमीनों की सुरक्षा पर उठे सवाल, प्रशासन की जांच पर टिकी निगाहें
सिद्धार्थनगर। नगर पालिका क्षेत्र में सरकारी पोखरी और कथित अतिक्रमण को लेकर मामला अब प्रशासन के संज्ञान में पहुंच गया है। भाजपा जिला अध्यक्ष दीपक मौर्य ने जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जीएन को लिखित शिकायत देकर संबंधित पोखरी की जमीनों की पैमाइश कराने, अभिलेखों की जांच करने तथा यदि अतिक्रमण की पुष्टि हो तो नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

शिकायत में सिविल लाइन स्थित शास्त्री नगर में पंजाब नेशनल बैंक के सामने सरकारी पोखरी की जमीन पर कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से कब्जे का प्रयास किए जाने का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा शास्त्री नगर क्षेत्र में पोखरी की जमीन पर कथित कब्जे और निर्माण को लेकर भी शिकायत की गई है।

वाल्मीकि नगर की पोखरी को लेकर भी शिकायत
वार्ड संख्या-1 वाल्मीकि नगर निवासी बालमुकुंद त्रिपाठी ने भी पोखरी की जमीन के दायरे को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि क्षेत्र में पहले करीब पांच बीघे की पोखरी बताई जाती थी, लेकिन समय के साथ इसका दायरा कम हुआ है।

उन्होंने गाटा संख्या 408, 409 और 410 से संबंधित जमीन को लेकर भी शिकायत की है और कुछ लोगों पर कथित रूप से पोखरी की जमीन पर कब्जा करने के आरोप लगाए हैं।
बालमुकुंद त्रिपाठी का कहना है कि इस संबंध में उन्होंने संबंधित अधिकारियों से शिकायतें की हैं। उन्होंने कुछ लोगों की ओर से धमकी दिए जाने का भी आरोप लगाया है।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और किसी व्यक्ति को इन आरोपों के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता।
DM ने गठित की जांच टीम
मामले में जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जीएन ने कहा कि प्रकरण उनके संज्ञान में आया है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए अपर जिलाधिकारी न्यायिक की अगुवाई में टीम गठित किए जाने की जानकारी दी।

जिलाधिकारी के अनुसार जांच टीम मौके पर जाकर पूरे प्रकरण की जांच-पड़ताल करेगी। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद तथ्यों के आधार पर संबंधित के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
अब प्रशासनिक जांच में यह स्पष्ट होगा कि शिकायत में जिन जमीनों का उल्लेख किया गया है, उनका राजस्व अभिलेखों में वास्तविक दर्जा क्या है और मौके पर उनकी स्थिति क्या है।

सबसे बड़ा सवाल
सरकारी पोखरी की जमीन आखिर कितनी सुरक्षित?
पोखरी और सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में केवल शिकायत या आरोप के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। वास्तविक स्थिति राजस्व अभिलेख, पैमाइश और मौके की जांच से ही स्पष्ट हो सकती है।
यदि जांच में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई और जमीन की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की अगली जिम्मेदारी होगी। वहीं यदि आरोप सही नहीं पाए जाते हैं तो जांच के जरिए स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।
सारांश
सिद्धार्थनगर में सरकारी पोखरी की जमीन पर कथित कब्जे को लेकर शिकायत के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ है। भाजपा जिला अध्यक्ष दीपक मौर्य ने जिलाधिकारी से शिकायत कर पैमाइश और कार्रवाई की मांग की है। वाल्मीकि नगर निवासी बालमुकुंद त्रिपाठी ने भी पोखरी की जमीन और गाटा संख्या 408, 409 व 410 को लेकर शिकायत की है। जिलाधिकारी ने ADM न्यायिक की अगुवाई में जांच टीम गठित करने की बात कही है। अब जांच रिपोर्ट पर सबकी नजर है।
संपादकीय टिप्पणी
सरकारी जमीन किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। पोखरी और तालाब जैसी सार्वजनिक संपत्तियां केवल आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है कि कार्रवाई आरोप या प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड, मौके की पैमाइश और निष्पक्ष जांच के आधार पर हो।
अगर जांच में अतिक्रमण मिलता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए और अगर शिकायत में लगाए गए आरोप सही नहीं मिलते तो वह तथ्य भी सामने आना चाहिए।
कानून सबके लिए समान है—सरकारी जमीन की सुरक्षा भी इसी सिद्धांत पर होनी चाहिए।

