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नाना पाटेकर: भूख से शुरू हुआ सफर, अभिनय के शिखर तक पहुंचा और फिर खामोश हो गया एक सितारा

जिस लड़के ने 13 साल की उम्र में काम करना शुरू किया, वही आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे अलग आवाज बना

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मुंबई।

फिल्मी पर्दे पर कभी-कभी कोई कलाकार आता है और चला जाता है…

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कुछ कलाकार आते हैं, कुछ साल चमकते हैं और फिर नई पीढ़ी उन्हें पीछे छोड़ देती है।

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लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनके जाने के बाद सिर्फ एक अभिनेता की कमी महसूस नहीं होती…

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उनके जाने के बाद एक पूरी अभिनय-भाषा जैसे खामोश हो जाती है।


नाना पाटेकर ऐसे ही कलाकार थे।


एक ऐसा चेहरा, जिसे देखकर दर्शक समझ जाता था कि अब पर्दे पर कुछ अलग होने वाला है।

एक ऐसी आवाज, जिसमें गुस्सा था तो दर्द भी था…

जिसमें आक्रोश था तो अपनापन भी…

और जिसमें संवाद सिर्फ शब्द नहीं होते थे, बल्कि जैसे किसी जख्म से निकली हुई आवाज होते थे।

8 अक्टूबर 2026 की सुबह वही आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई।

75 साल की उम्र में नाना पाटेकर का गोवा में निधन हो गया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें तड़के गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया। मेडिकल टीम ने उन्हें बचाने की कोशिश की और अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने निधन की पुष्टि की।

लेकिन नाना पाटेकर की कहानी उनकी मौत से शुरू नहीं होती..

उनकी असली कहानी तो उस वक्त शुरू हुई थी, जब जिंदगी ने उन्हें बहुत कम उम्र में यह समझा दिया था कि सपने देखने से पहले रोटी कमानी पड़ती है।

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एक बच्चा… जिसने बचपन जल्दी खो दिया


1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर आगे चलकर दुनिया के लिए नाना पाटेकर बने।

लेकिन जिस नाम ने बाद में करोड़ों दर्शकों को प्रभावित किया, उसके पीछे संघर्ष की एक ऐसी कहानी थी जिसे सुनकर शायद कोई भी चौंक जाए।

नाना पाटेकर ने खुद अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताया था कि उन्होंने 13 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था।

परिवार की आर्थिक परिस्थितियां ऐसी थीं कि पढ़ाई के साथ काम करना मजबूरी बन गया था।

उन्होंने एक बातचीत में बताया था कि उस समय वह दिन में काम करते थे और स्कूल भी जाते थे। उनकी कमाई बेहद कम थी और कई बार घर में एक वक्त के भोजन की चिंता तक रहती थी।

यही भूख…

यही संघर्ष…

यही अभाव…

आगे चलकर उनके अभिनय की ताकत बन गए।

शायद इसलिए जब नाना किसी गरीब, परेशान या व्यवस्था से लड़ते हुए आदमी का किरदार निभाते थे तो वह अभिनय कम और जिंदगी ज्यादा लगता था।

क्योंकि वह दर्द उन्होंने सिर्फ पढ़ा नहीं था… जिया था।


थिएटर की दुनिया ने गढ़ा अभिनेता


नाना पाटेकर ने सीधे फिल्मी सितारे बनने का रास्ता नहीं चुना।

थिएटर उनके अभिनय की पहली बड़ी पाठशाला बना।

मंच ने उन्हें सिखाया कि बिना कैमरे के क्लोजअप के भी आंखों से बात कैसे की जाती है।

सिर्फ आवाज से दर्शक को कैसे बांधा जाता है।

और संवाद बोलने से ज्यादा जरूरी है—

संवाद के पीछे की भावना को महसूस करना।

यही वजह थी कि बाद में जब वह फिल्मी पर्दे पर आए तो उनकी अदाकारी बाकी कलाकारों से अलग दिखाई दी।

वह अभिनय करते नहीं दिखते थे…

वह किरदार बन जाते थे।


1978: पर्दे पर पहली दस्तक


फिल्मी दुनिया में उनका सफर 1978 की ‘गमन’ से शुरू हुआ।

उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह संघर्षशील अभिनेता आने वाले वर्षों में हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली कलाकारों में गिना जाएगा

शुरुआत धीमी थी।

लेकिन नाना के भीतर एक बेचैनी थी।

कुछ अलग करने की बेचैनी।

कुछ सच्चा करने की बेचैनी।

और फिर आया वह दौर जिसने उनकी किस्मत बदलनी शुरू कर दी।

अंकुश और दूसरे शुरुआती किरदारों ने उन्हें पहचान दिलानी शुरू की। सलाम बॉम्बे! और फिर परिंदा ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया।


‘परिंदा’: जब अभिनय ने पहचान बदल दी


1989 की फिल्म ‘परिंदा’…

यही वह मोड़ था जहां नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं रहे।

वह एक ताकत बन गए।

उनकी अदाकारी में हिंसा थी, बेचैनी थी, मनोवैज्ञानिक तनाव था और भीतर से टूटता हुआ इंसान था।

उनकी भूमिका ने दर्शकों को झकझोर दिया।

और इस प्रदर्शन के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

यहीं से यह साफ हो गया कि भारतीय सिनेमा में एक ऐसी अभिनय प्रतिभा आ चुकी है जिसे किसी एक खांचे में बंद करना आसान नहीं होगा


फिर आया ‘प्रहार’…


नाना पाटेकर केवल अभिनेता बनकर संतुष्ट नहीं हुए।

1991 में उन्होंने ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया।

अभिनेता के साथ निर्देशक।

पर्दे के सामने भी और कैमरे के पीछे भी।

बाद में नाना ने खुद प्रहार को अपनी सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में माना था।

यह उस कलाकार का दूसरा रूप था, जो सिर्फ दूसरों की लिखी कहानी निभाना नहीं चाहता था…

वह कहानी को अपने तरीके से कहना भी चाहता था।


‘क्रांतिवीर’: और फिर नाना पाटेकर इतिहास बन गए


1994 में आई ‘क्रांतिवीर’।

और जैसे नाना पाटेकर के भीतर जमा वर्षों का गुस्सा, संघर्ष और अनुभव एक किरदार में उतर आया।

प्रताप नारायण तिलक का किरदार।

आवाज में आग।

चेहरे पर आक्रोश।

संवाद में व्यवस्था से सवाल।

और अभिनय में ऐसी ऊर्जा कि दर्शक सीट पर बैठा-बैठा किरदार के साथ खड़ा हो जाए।

इस भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान दिलाया।

उस दौर में नाना पाटेकर की लोकप्रियता का आलम यह था कि वह पारंपरिक अर्थों में ‘हीरो’ न होते हुए भी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन जाते थे।

उन्हें देखने के लिए दर्शक कहानी नहीं देखते थे…

नाना को देखने के लिए कहानी देखते थे।


‘अग्निसाक्षी’ और ‘खामोशी’: अभिनेता की गहराई


इसके बाद अग्निसाक्षी और खामोशी: द म्यूजिकल जैसी फिल्मों में उन्होंने फिर साबित किया कि वह सिर्फ गुस्से और आक्रोश वाले किरदारों के अभिनेता नहीं हैं।

वह मनोविज्ञान समझते थे।

वह खामोशी समझते थे।

वह टूटे हुए इंसान की आंखें पढ़ सकते थे।

अग्निसाक्षी के लिए उन्हें एक और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उनके करियर में कुल तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दर्ज हैं।


और फिर नाना ने सबको हंसा दिया…


जिस अभिनेता को देखकर दर्शक गंभीर हो जाते थे…

जिसकी आवाज सुनकर पर्दे पर तनाव महसूस होता था…

वही नाना एक दिन उदय शेट्टी बनकर सामने आए।

फिल्म थी ‘वेलकम’।

और भारतीय दर्शकों ने नाना का एक बिल्कुल नया चेहरा देखा।

यहां बंदूक की जगह कॉमेडी थी।

आक्रोश की जगह हास्य था।

लेकिन अभिनय वही था—पूरी ताकत के साथ।

उदय शेट्टी के किरदार ने साबित कर दिया कि नाना पाटेकर को किसी एक श्रेणी में रखना संभव ही नहीं था।

वह खलनायक हो सकते थे।

नायक हो सकते थे।

पुलिस अधिकारी हो सकते थे।

सैनिक हो सकते थे।

और अगले ही पल दर्शकों को हंसाने वाले किरदार भी बन सकते थे।

यही था नाना पाटेकर का जादू।


फिर आया ‘अब तक छप्पन’…


2000 के दशक में नाना ने पुलिस और अपराध की दुनिया से जुड़े गंभीर किरदारों में भी अपनी अलग छाप छोड़ी।

‘अब तक छप्पन’ का पुलिस अधिकारी ऐसा किरदार बना जिसे दर्शकों ने लंबे समय तक याद रखा।

वहां भी नाना की ताकत कोई चमकदार स्टारडम नहीं थी।

उनकी ताकत थी—

उनका चेहरा।

उनकी आवाज।

उनका ठहराव।

और उनकी आंखें।

‘राजनीति’ से ‘नटसम्राट’ तक

समय बदलता गया।

फिल्में बदलती गईं।

दर्शक बदलते गए।

लेकिन नाना का अभिनय बदलते समय के साथ और गहरा होता गया।

राजनीति जैसी फिल्म में उन्होंने अलग तरह का किरदार निभाया।

और फिर आया मराठी सिनेमा का वह पड़ाव, जिसने उनके अभिनय को एक और ऊंचाई दी—

‘नटसम्राट’।

एक ऐसा अभिनेता जो खुद एक अभिनेता का किरदार निभा रहा था।

मंच से विदा हो चुका कलाकार…

लेकिन जिसकी आत्मा अभी भी मंच पर थी।

परिवार, अकेलापन, उम्र, रिश्ते और टूटते हुए सपने…

नाना पाटेकर ने गणपतराव बेलवलकर के किरदार में जैसे अपने पूरे जीवन के अभिनय अनुभव को उड़ेल दिया।

यह सिर्फ अभिनय नहीं था।

यह एक अभिनेता का दूसरे अभिनेता को दिया गया सलाम था।


शोहरत आई, लेकिन संघर्ष की याद नहीं गई


नाना पाटेकर ने स्टारडम देखा।

पुरस्कार देखे।

तालियां सुनीं।

लेकिन उनके भीतर वह संघर्षशील लड़का कहीं नहीं मरा जिसने 13 साल की उम्र में काम शुरू किया था।

उन्होंने अपने बचपन की गरीबी और भूख के अनुभवों के बारे में कई बार खुलकर बात की।

यही वजह है कि किसान परिवारों की मदद से जुड़े उनके प्रयास भी चर्चा में रहे। 2026 की एक रिपोर्ट में उनके द्वारा किसान परिवारों की सहायता के लिए बड़ी राशि दिए जाने का भी उल्लेख किया गया।


आखिरी पड़ाव भी काम से भरा रहा


उम्र बढ़ रही थी।

लेकिन नाना ने खुद को पूरी तरह पर्दे से दूर नहीं किया।

वह नई फिल्मों में काम करते रहे।

हाल के वर्षों में The Vaccine War, Vanvaas और फिर 2025 में Housefull 5 तथा O Romeo और Subedar जैसे प्रोजेक्ट्स से उनका नाम जुड़ा रहा।

यानी जिस कलाकार ने 1978 में कैमरे के सामने कदम रखा था…

वह आखिरी दौर तक अभिनय की दुनिया से जुड़ा रहा।

पर्दा उनका पहला प्यार था और अभिनय उनकी पहचान।


और फिर 8 अक्टूबर की वह सुबह…


किसी फिल्म की तरह जिंदगी ने भी कोई लंबा क्लाइमेक्स नहीं दिया।

न कोई आखिरी संवाद।

न कोई अंतिम दृश्य।

न कोई कैमरा।

न कोई ‘कट’।

गोवा की सुबह थी।

अचानक तबीयत बिगड़ी।

मेडिकल टीम पहुंची।

अस्पताल ले जाया गया।

उन्हें बचाने की कोशिश की गई।

लेकिन इस बार जिंदगी की पटकथा में नाना के लिए अगला दृश्य नहीं था।

और फिर खबर आई—

नाना पाटेकर नहीं रहे।

75 साल का सफर खत्म हो गया।


लेकिन क्या सचमुच कहानी खत्म हो गई?


नहीं।

क्योंकि कुछ कहानियां मौत के बाद खत्म नहीं होतीं।

वह फिल्मों में चलती रहती हैं।

परिंदा चलेगी।

क्रांतिवीर चलेगी।

प्रहार याद किया जाएगा।

अग्निसाक्षी देखी जाएगी।

खामोशी की खामोशी महसूस की जाएगी।

अब तक छप्पन में पुलिस अधिकारी फिर सामने आएगा।

वेलकम का उदय शेट्टी फिर लोगों को हंसाएगा।

और नटसम्राट का गणपतराव फिर किसी की आंखें नम कर देगा।

यानी नाना पाटेकर चले गए…

लेकिन नाना पाटेकर का अभिनय नहीं गया।


एक सितारा टूटा है… मगर रोशनी बाकी है


फिल्मी दुनिया में सितारे बहुत हैं।

हर साल नए चेहरे आते हैं।

नई आवाजें आती हैं।

नई कहानियां आती हैं।

लेकिन नाना पाटेकर जैसा कलाकार किसी एक दौर की जरूरत नहीं था।

वह कई पीढ़ियों का अभिनेता था।

उनकी सबसे बड़ी खूबी यह नहीं थी कि वह हर किरदार कर लेते थे।

उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि हर किरदार को अपना बना लेते थे।

इसलिए शायद आज जब उनके जाने की खबर सामने आई है तो दुख सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री को नहीं है।

दुख उन दर्शकों को भी है जिन्होंने कभी उनकी फिल्म देखकर तालियां बजाईं…

कभी उनके संवाद पर सीटियां बजाईं…

कभी उनके किरदार से डर गए…

और कभी उसी नाना को देखकर खुलकर हंसे।


नाना पाटेकर की सबसे बड़ी फिल्म… उनकी जिंदगी थी


एक गरीब बच्चा।

13 साल की उम्र में काम।

भूख।

संघर्ष।

थिएटर।

छोटे किरदार।

गमन।

अंकुश।

परिंदा।

क्रांतिवीर।

अग्निसाक्षी।

खामोशी।

अब तक छप्पन।

वेलकम।

राजनीति।

नटसम्राट।

और फिर अंतिम दौर तक लगातार अभिनय…

यह सिर्फ फिल्मोग्राफी नहीं है।

यह एक आदमी के संघर्ष से किंवदंती बनने की कहानी है।


अंतिम सलाम


आज भारतीय सिनेमा का एक बड़ा अध्याय बंद हो गया।

एक ऐसा कलाकार चला गया जिसने साबित किया कि अभिनय के लिए सिर्फ खूबसूरत चेहरा नहीं चाहिए…

दिल चाहिए।

दर्द चाहिए।

संघर्ष चाहिए

और सबसे बढ़कर—

किरदार में उतर जाने की क्षमता चाहिए।

नाना पाटेकर के पास यह सब था।

शायद इसीलिए जब वह पर्दे पर आते थे तो दर्शक अभिनेता को भूल जाता था…

सिर्फ किरदार दिखाई देता था।

आज वह किरदार निभाने वाला इंसान हमारे बीच नहीं है।

लेकिन उनकी आवाज फिल्मों में रहेगी।

उनकी आंखें पर्दे पर रहेंगी।

उनके संवाद लोगों की जुबान पर रहेंगे।

और उनकी कहानी उन कलाकारों को प्रेरित करती रहेगी जो चमक-दमक से नहीं…

संघर्ष से अपना रास्ता बनाना चाहते हैं।

फिल्मी जगत का एक सितारा टूट गया है…

लेकिन उस सितारे की रोशनी अभी बहुत लंबे समय तक भारतीय सिनेमा के आकाश में दिखाई देती रहेगी।

नाना पाटेकर को अंतिम सलाम।


FT NEWS DIGITAL EDITORIAL


“कुछ कलाकार पर्दे से विदा होते हैं…

कुछ कलाकार पर्दे का हिस्सा बन जाते हैं।

नाना पाटेकर अब उसी सिनेमा का हिस्सा हैं, जिसे उन्होंने अपनी आवाज दी।”

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