कहाँ हो मंगरू, अब कहाँ पर पढ़त हौ?
गुरु जी की कलम से — शिक्षा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य
विशेष संवाददाता | FT News Digital
प्रदेश में शिक्षक पदों की रिक्तियों और भर्ती प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। एक ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी की चर्चा है, तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में शिक्षित अभ्यर्थी भर्ती प्रक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। इसी तस्वीर को व्यंग्य के जरिए सामने लाता है मंगरू और गुरु जी का यह संवाद—जहाँ सवाल सीधा है, लेकिन जवाब तलाशना आसान नहीं।
सुबह-सुबह मिला मंगरू, माथे पर चिंता की लकीरें
सुबह-सुबह मंगरू मिला। चेहरे पर वही पुरानी मासूमियत थी, लेकिन माथे पर चिंता की लकीरें कुछ ज्यादा गहरी थीं।
मैंने पूछा—
“कहाँ हो मंगरू?”
वह बोला—
“यहीं हैं गुरुजी, लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि अब पढ़ें कहाँ और पढ़ाएँ कौन?”
मैंने कहा—
“अरे, हुआ क्या?”
मंगरू ने जेब से अखबार निकाला और बोला—
“गुरुजी, खबरों में शिक्षक पदों की बड़ी संख्या में रिक्तियां बताई जा रही हैं। उधर लाखों पढ़े-लिखे लड़के-लड़कियां भर्ती का इंतजार कर रहे हैं। स्कूल में शिक्षक कम हैं और बेरोजगारों के घर में डिग्रियों का ढेर लगा है। अब आप ही बताइए—पढ़ा कहाँ जाए और पढ़ाए कौन?”
मैंने समझाते हुए कहा—
“धैर्य रखो मंगरू, भर्ती की प्रक्रिया और आयोग भी तो हैं।”
मंगरू मुस्कुराया और बोला—
“गुरुजी, हमारे यहां आयोग बनते-बनते बच्चे जवान हो जाते हैं और भर्ती निकलते-निकलते कई अभ्यर्थी उम्र की सीमा के करीब पहुंच जाते हैं।”
स्कूल में बच्चे हैं, शिक्षक कितने?
मंगरू की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उसने शिक्षा व्यवस्था की दूसरी तस्वीर सामने रख दी।
वह बोला—
“गुरुजी, गांव के स्कूल में कई कक्षाएं हैं, बच्चों की संख्या भी अच्छी-खासी है, लेकिन शिक्षक सीमित हैं। अब एक शिक्षक पढ़ाए या हाजिरी संभाले? दूसरा बच्चों को पढ़ाए या सरकारी रिपोर्ट और ऑनलाइन पोर्टल पूरा करे?”
यही सवाल आज कई सरकारी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर होने वाली चर्चाओं के केंद्र में रहता है।
शिक्षकों पर पढ़ाने के अलावा विभिन्न प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ होने की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि यदि शिक्षक का ज्यादा समय रिपोर्टिंग, डाटा और दूसरे कामों में चला जाए तो कक्षा में बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय कैसे मिले?
मोबाइल बना नया गुरु!
इतने में चाय वाला बोल पड़ा—
“बाबूजी, अब बच्चों को मास्टर से ज्यादा मोबाइल पढ़ाता है।”
मंगरू जोर से हंसा और बोला—
“सही कह रहे हो चच्चा। बच्चा स्कूल में गुरुजी को कम और घर में इंटरनेट को ज्यादा गुरु मानता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इंटरनेट कभी छुट्टी नहीं लेता!”
मजाक के पीछे सवाल गंभीर था।
डिजिटल दौर में मोबाइल और इंटरनेट बच्चों के लिए जानकारी का बड़ा माध्यम बन चुके हैं। लेकिन तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकती। किताब, शिक्षक और तकनीक—तीनों का संतुलित इस्तेमाल ही शिक्षा को मजबूत बना सकता है।
| मंगरू का सवाल बड़ा है
“स्कूल है, बच्चे हैं, किताबें हैं…
फिर सवाल सिर्फ इतना क्यों है कि पढ़ाएगा कौन?”
मंगरू का कहना है कि शिक्षा सुधार की चर्चा केवल नीतियों और घोषणाओं तक सीमित न रहकर स्कूल की वास्तविक जरूरतों तक पहुंचनी चाहिए।
नियम बदलते हैं, बयान बदलते हैं… बच्चे का क्या?
मंगरू ने अखबार का एक और पन्ना खोला। उसमें शिक्षा से जुड़े नियमों और पाठ्यक्रम को लेकर चल रही चर्चाओं का जिक्र था।
वह बोला—
“गुरुजी, पढ़ाई के नियम बदल रहे हैं, व्यवस्थाएं बदल रही हैं, बयान बदल रहे हैं… लेकिन बच्चों की चिंता कौन करेगा?”
मैंने कहा—
“देखो मंगरू, शिक्षा में सुधार जरूरी है। व्यवस्था में बदलाव भी समय की जरूरत है।”
वह बोला—
“सुधार से किसे एतराज है गुरुजी? लेकिन सुधार किताबों में ज्यादा दिखाई देता है, जमीन पर कम। पहले स्कूल में पर्याप्त शिक्षक तो पहुंचें, फिर उनसे पूरी उम्मीद भी रखिए।”
उसकी बात में व्यंग्य जरूर था, लेकिन सवाल गंभीर था।
| समस्या की तस्वीर
शिक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रमुख सवाल
रिक्त शिक्षक पदों को भरने की प्रक्रिया कितनी तेज हो?
भर्ती प्रक्रिया में लगने वाले समय को कैसे कम किया जाए?
शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से कितना मुक्त किया जाए?
ग्रामीण स्कूलों में शिक्षक और छात्र का अनुपात कैसे सुधरे?
डिजिटल शिक्षा के साथ शिक्षक की भूमिका कैसे मजबूत हो?
बच्चों की पढ़ाई को प्रशासनिक प्रक्रियाओं से ऊपर कैसे रखा जाए?
आयोग, कोर्ट और कैलेंडर के बीच अभ्यर्थी
मंगरू बोला—
“गुरुजी, पढ़े-लिखे नौजवान नौकरी के लिए तैयारी करते हैं। फिर भर्ती का इंतजार करते हैं। उसके बाद परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज और कभी-कभी कानूनी प्रक्रिया… इसी बीच कैलेंडर बदलता रहता है।”
उसने मुस्कुराते हुए कहा—
“कई बार लगता है कि अभ्यर्थी नौकरी की तैयारी कम और इंतजार करने की तैयारी ज्यादा कर रहा है।”
व्यंग्य के इस अंदाज में भर्ती प्रक्रिया की देरी और अभ्यर्थियों की बेचैनी पर सवाल उठता है। हालांकि किसी भी भर्ती प्रक्रिया में नियम, पात्रता, परीक्षा और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक होता है।
असली सवाल कक्षा में बैठा बच्चा पूछता है
आज शिक्षा पर बहस खूब होती है। मंचों पर शिक्षा की योजनाओं की चर्चा होती है, सरकारी स्तर पर नई पहल और डिजिटल व्यवस्थाएं सामने आती हैं और अधिकारी अपने स्तर पर व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन असली सवाल तब सामने आता है, जब एक बच्चा स्कूल की कक्षा में बैठकर पूछता है—
“गुरुजी, आज कौन पढ़ाएगा?”
इस सवाल का जवाब किसी भाषण से नहीं, बल्कि स्कूल में मौजूद शिक्षक से मिलेगा।
मंगरू का आखिरी तीर
मंगरू जाने लगा तो मैंने पूछा—
“तो समाधान क्या है?”
वह पलटा और बोला—
“बहुत आसान है गुरुजी। पहले स्कूल में पर्याप्त शिक्षक भेजो, फिर शिक्षक को पढ़ाने दो। हर महीने नया आदेश, नया ऐप, नई रिपोर्ट और नया पोर्टल भेजने से पहले यह देखो कि बच्चे की कक्षा में गुरुजी मौजूद हैं या नहीं।”
मैं चुप रहा।
मंगरू ने जाते-जाते आखिरी तीर छोड़ा—
“सरकार कहती है—’सब पढ़ें, सब बढ़ें’… गांव वाले बस इतना पूछ रहे हैं—पहले यह तो बताइए, पढ़ाएगा कौन?”
मंगरू चला गया, लेकिन उसका सवाल वहीं रह गया।
स्कूल हैं, बच्चे हैं, किताबें हैं, योजनाएं हैं—अब जरूरत है कि कक्षा में पर्याप्त शिक्षक भी हों और उन्हें बच्चों को पढ़ाने का पूरा अवसर मिले।
गुरु जी की कलम से
यह व्यंग्य शिक्षा व्यवस्था से जुड़े व्यापक सवालों को सामने रखने का एक रचनात्मक प्रयास है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार पर व्यक्तिगत आरोप लगाना नहीं, बल्कि व्यवस्था पर विचार करने के लिए सवाल उठाना है।
संक्षिप्त सारांश
शिक्षक पदों की रिक्तियों, भर्ती की प्रतीक्षा और सरकारी स्कूलों में शिक्षकों पर बढ़ते गैर-शैक्षणिक कार्यों को लेकर ‘गुरु जी की कलम से’ व्यंग्य के जरिए शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। मंगरू के संवाद के माध्यम से पूछा गया है कि जब स्कूल और बच्चे मौजूद हैं, तो कक्षा में पर्याप्त शिक्षक कब होंगे?

