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खबर या खुशामद? जब पत्रकारिता से गायब होने लगा सच का लाल पेन

📰 संपादकीय | FT News Digital


जब खबरों में विशेषण बढ़ने लगें, तो समझिए पत्रकारिता सवालों के घेरे में है

“समाचार का पहला धर्म सत्ता को सम्मान देना नहीं, समाज को सच बताना है।”

पत्रकारिता का संकट तब शुरू नहीं होता जब उस पर बाहरी दबाव आता है। असली संकट तब शुरू होता है, जब पत्रकार स्वयं अपनी भाषा से निष्पक्षता का समझौता करने लगता है।

एक दौर था जब संपादकीय डेस्क पर बैठा संपादक खबर के हर शब्द से पूछता था—”क्या यह तथ्य है?” यदि उत्तर ‘नहीं’ होता, तो लाल पेन बिना किसी हिचक के उस शब्द को हटा देता था। क्योंकि पत्रकारिता में विश्वास शब्दों की सादगी से बनता है, विशेषणों की चमक से नहीं।

आज कई समाचारों में ऐसा प्रतीत होता है कि तथ्य पीछे छूट रहे हैं और विशेषण आगे निकल रहे हैं। “माननीय”, “यशस्वी”, “लोकप्रिय”, “आदरणीय” जैसे शब्द यदि समाचार का हिस्सा बनने लगें, तो पाठक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या वह खबर पढ़ रहा है या किसी का प्रचार?

पत्रकारिता किसी का विरोध करने का माध्यम नहीं है, लेकिन किसी का गुणगान करना भी उसका दायित्व नहीं है।

यदि कोई जनप्रतिनिधि, अधिकारी या संस्था वास्तव में उत्कृष्ट कार्य कर रही है, तो उसके निर्णय, उसकी उपलब्धियाँ और जनता का विश्वास स्वयं उसकी पहचान बना देंगे। अखबार का काम प्रमाणपत्र देना नहीं, प्रमाण प्रस्तुत करना है।

इतिहास गवाह है कि महान समाचार संस्थानों की सबसे बड़ी ताकत उनकी निष्पक्ष भाषा थी। वहां खबरें सजाई नहीं जाती थीं, तराशी जाती थीं। शब्दों पर इतना अनुशासन होता था कि एक अनावश्यक विशेषण भी खबर की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बन सकता था।

आज आवश्यकता फिर उसी पत्रकारिता की है— जहाँ प्रेस विज्ञप्ति और समाचार में अंतर साफ दिखाई दे। जहाँ सवाल पूछना अपराध नहीं, पेशे की जिम्मेदारी माना जाए। जहाँ तथ्य किसी पद, व्यक्ति या विचारधारा से बड़े हों।

लोकतंत्र में मीडिया की ताकत उसकी पहुंच से नहीं, उसकी विश्वसनीयता से मापी जाती है। जिस दिन समाचार सत्ता से प्रश्न पूछना छोड़ देता है और केवल प्रशंसा लिखने लगता है, उसी दिन पत्रकारिता का आईना धुंधला होने लगता है।

पत्रकारिता को विशेषणों की नहीं, साहस की आवश्यकता है। उसे अलंकरण नहीं, प्रमाण चाहिए। उसे तालियों की नहीं, जनविश्वास की जरूरत है।

क्योंकि इतिहास हमेशा वही याद रखता है जिसने सच लिखा था—न कि वह जिसने सत्ता के लिए सबसे सुंदर विशेषण चुने थे।

लेखक : अमित ओझा

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 प्रस्तुति : FT News Digital | सच और… कुछ नहीं

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