सीमा पार त्रासदी पर ककरहवा की संवेदना
सरहदें अलग कर सकती हैं देश, दर्द नहीं—नेपाल की बाढ़ पर ककरहवा में जलीं मोमबत्तियां
नेपाल की त्रासदी में जान गंवाने वालों को श्रद्धांजलि, कैंडल मार्च में उमड़ी संवेदनशीलता
ककरहवा, सिद्धार्थनगर।
सरहदें भले ही दो देशों को अलग करती हों, लेकिन इंसानियत और संवेदनाओं की कोई सीमा नहीं होती। नेपाल में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदा में हुई जनहानि ने भारत-नेपाल सीमा से सटे ककरहवा के लोगों को भी गहरे तक विचलित किया। पड़ोसी देश में अपनों को खोने वाले परिवारों के दर्द को महसूस करते हुए ककरहवा में लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर दिवंगतों को श्रद्धांजलि दी।
रविवार शाम ककरहवा स्थित श्रीराम कॉम्प्लेक्स से नेपाल सीमा की ओर निकला कैंडल मार्च महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के बीच मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं का संदेश बन गया। हाथों में जलती मोमबत्तियां और दिल में नेपाल के लिए दर्द लिए व्यापारी, जनप्रतिनिधि और ग्रामीण बड़ी संख्या में मार्च में शामिल हुए।
मोमबत्तियों की रोशनी में इंसानियत का संदेश
कैंडल मार्च का उद्देश्य नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि देना और उनके परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट करना रहा। कार्यक्रम में शामिल लोगों ने कहा कि प्राकृतिक आपदा किसी सीमा, धर्म या देश को देखकर नहीं आती। ऐसे कठिन समय में पीड़ितों के साथ खड़ा होना ही सच्ची मानवीय संवेदना है।
| सीमा के इस पार, दर्द उस पार
ककरहवा और नेपाल के सीमावर्ती इलाकों के बीच वर्षों से सामाजिक, कारोबारी और पारिवारिक संबंध रहे हैं। इसलिए नेपाल में आई आपदा का असर सीमा से लगे भारतीय इलाकों में भी महसूस किया गया। कैंडल मार्च में शामिल लोगों की संवेदना ने यही संदेश दिया कि मुसीबत के वक्त इंसानियत सबसे बड़ी पहचान है।
व्यापारी और ग्रामीण भी बने संवेदना के सहभागी
व्यापार संगठन ककरहवा एवं स्वर्णकार समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मार्च में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए। व्यापारी, ग्रामीण और जनप्रतिनिधियों ने मोमबत्तियां जलाकर नेपाल में आपदा के दौरान जान गंवाने वालों की आत्मा की शांति के लिए श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम का नेतृत्व ग्राम प्रधान प्रतिनिधि दिलीप पाण्डेय ने किया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदा किसी सीमा को नहीं पहचानती। नेपाल में जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके दुख की घड़ी में ककरहवा के व्यापारी और ग्रामीण उनके साथ खड़े हैं।
मार्च में शामिल लोगों ने भी कहा कि आपदा की इस घड़ी में नेपाल के साथ खड़ा होना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सीमा के आर-पार कायम मानवीय रिश्तों की जिम्मेदारी है।
सारांश
नेपाल में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदा से हुई जनहानि पर ककरहवा के लोगों ने संवेदना व्यक्त करते हुए कैंडल मार्च निकाला। श्रीराम कॉम्प्लेक्स से नेपाल सीमा तक निकले मार्च में व्यापारी, ग्रामीण और जनप्रतिनिधि शामिल हुए। मोमबत्तियों की रोशनी में दिवंगतों को श्रद्धांजलि देते हुए लोगों ने पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी एकजुटता जताई।
सरहद के पार भी धड़कता है इंसानियत का दिल
ककरहवा का यह कैंडल मार्च इसलिए खास है क्योंकि यहां संवेदना किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि आम लोगों के दिल से निकलती दिखाई दी। नेपाल और भारत के बीच सीमा जरूर है, लेकिन दोनों ओर रहने वाले लोगों के सामाजिक और मानवीय रिश्ते दशकों पुराने हैं।
आपदा के समय किसी पीड़ित के साथ खड़ा होना ही इंसानियत की सबसे बड़ी पहचान है। ककरहवा के लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर यही संदेश दिया कि दर्द की कोई सीमा नहीं होती और इंसानियत की कोई सरहद नहीं होती।
FT News Digital के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सीमा के आर-पार जीवित मानवीय संवेदनाओं की तस्वीर है।
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