वडनगर से विश्व मंच तक: मोदी के दौर का भारत कितना बदला?
परमात्मा प्रसाद उपाध्याय
जन्मदिन पर व्यक्तित्व का नहीं, फैसलों और उनके परिणामों का हिसाब जरूरी
साढ़े बारह साल किसी सरकार को समझने के लिए कम समय नहीं होता। इतना समय किसी प्रधानमंत्री के राजनीतिक व्यक्तित्व को एक चुनावी नारे से आगे ले जाकर उसकी नीतियों, फैसलों और उनके परिणामों की कसौटी पर परखने के लिए पर्याप्त होता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल को भी अब इसी दृष्टि से देखने का समय है।
17 सितंबर को उनका जन्मदिन है। स्वाभाविक है कि देश में शुभकामनाओं और उपलब्धियों की चर्चा होगी, लेकिन इतिहास की दृष्टि से जन्मदिन का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ आत्ममंथन है—देश ने इस दौर में क्या पाया, क्या खोया और अभी क्या पाना बाकी है?
17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। एक साधारण सामाजिक पृष्ठभूमि से निकलकर संगठन की सीढ़ियां चढ़ते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने तक की उनकी यात्रा भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक संभावनाओं का उल्लेखनीय उदाहरण है। 2019 में दूसरी बार और उसके बाद लगातार सत्ता में बने रहने ने उनके नेतृत्व को भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली अध्यायों में शामिल कर दिया।
मोदी ने केवल सरकार नहीं चलाई, उन्होंने राजनीति करने और शासन को जनता तक पहुंचाने की शैली भी बदली। यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है। वे योजनाओं को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहने देते, उन्हें राजनीतिक अभियान और जनभागीदारी का विषय बना देते हैं। स्वच्छ भारत इसका प्रमुख उदाहरण है। शौचालय और स्वच्छता जैसे मुद्दे लंबे समय तक प्रशासनिक विषय माने जाते थे, लेकिन मोदी ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।
इसी तरह जनधन, आधार, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और डिजिटल भुगतान ने सरकार तथा नागरिक के आर्थिक संबंध को बदलने का प्रयास किया। यूपीआई का विस्तार इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा। आज डिजिटल भुगतान केवल महानगरों की सुविधा नहीं रह गया है। छोटे दुकानदार, ग्रामीण बाजार और आम उपभोक्ता भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
लेकिन यहीं से मूल्यांकन की दूसरी कसौटी शुरू होती है। किसी योजना की सफलता उसके उद्घाटन, विज्ञापन या आंकड़े से नहीं, उसके अंतिम लाभार्थी के जीवन में आए बदलाव से तय होती है। सरकार ने यदि करोड़ों लोगों तक सुविधा पहुंचाने का दावा किया है तो यह भी देखना होगा कि उस सुविधा की गुणवत्ता, निरंतरता और पहुंच कितनी है।
मोदी सरकार के दौर में बुनियादी ढांचे को राजनीतिक प्राथमिकता मिली। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर रेलवे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और वंदे भारत जैसी परियोजनाओं तक विकास को दृश्य रूप दिया गया। यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि बुनियादी ढांचा किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है।
मगर परियोजनाओं की संख्या से आगे बढ़कर यह देखना जरूरी है कि उनका आर्थिक लाभ कितना व्यापक है, रोजगार कितना पैदा हुआ और आम नागरिक के जीवन में कितनी वास्तविक सुविधा आई।
कल्याणकारी योजनाओं का दायरा भी व्यापक हुआ। ‘
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, जल जीवन मिशन, आवास, स्वच्छता, बिजली और वित्तीय समावेशन जैसे कार्यक्रमों ने बुनियादी जरूरतों को शासन की प्राथमिकता में रखा। इन योजनाओं ने गरीब और ग्रामीण भारत को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा है।
मगर किसी भी कल्याणकारी कार्यक्रम की स्थायी सफलता तभी मानी जाएगी जब वह लाभार्थी को सरकारी सहायता पर निर्भर रखने के बजाय उसके जीवन में आत्मनिर्भरता और अवसर पैदा करे।
आस्था और राजनीति के बीच संतुलन
मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व को भारत की सांस्कृतिक चेतना से अलग करके देखना भी संभव नहीं है। भारतीय परंपरा में रामराज्य केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और लोककल्याणकारी शासन की कल्पना भी रहा है। गीता कर्म और कर्तव्य की बात करती है, जबकि भारतीय राजनीतिक चिंतन में शासक की जिम्मेदारी प्रजा के संरक्षण और कल्याण से जुड़ी रही है।
आधुनिक लोकतंत्र में इन धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों का अर्थ संविधान से ऊपर कोई व्यवस्था नहीं हो सकता। आस्था व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की शक्ति हो सकती है, लेकिन शासन की अंतिम कसौटी संविधान, कानून, समान नागरिक अधिकार और संस्थागत जवाबदेही ही रहनी चाहिए।
मोदी की राजनीति ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय गौरव और विकास की आकांक्षा को एक साथ जोड़ा है। समर्थक इसे भारत की आत्मविश्वासी पहचान का पुनरुत्थान मानते हैं। आलोचक इसके भीतर सामाजिक ध्रुवीकरण की आशंका देखते हैं। लोकतंत्र में दोनों दृष्टियों के लिए जगह होनी चाहिए। बहुमत की लोकप्रियता महत्वपूर्ण है, लेकिन अल्पमत की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
विदेश नीति में आत्मविश्वास
मोदी युग की दूसरी बड़ी पहचान विदेश नीति है। भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ के साथ संबंधों को एक साथ साधने की कोशिश की है। बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना आसान नहीं है। चीन और पश्चिम के बीच बढ़ते तनाव तथा रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसी परिस्थितियों ने भारत के सामने जटिल कूटनीतिक चुनौतियां रखी हैं।
BRICS जैसे मंचों पर सक्रियता और ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रमुखता देना भारत की बढ़ती कूटनीतिक महत्वाकांक्षा का संकेत है। प्रधानमंत्री की लगातार विदेश यात्राओं और विश्व नेताओं से संवाद ने भारत की दृश्यता बढ़ाई है। लेकिन विदेश नीति की असली सफलता कैमरों के सामने होने वाली मुलाकातों से नहीं, बल्कि व्यापार, तकनीक, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा और वैश्विक निर्णयों में भारत की वास्तविक क्षमता से मापी जाएगी।
इजराइल के साथ भारत के संबंधों में भी मोदी काल में नई सक्रियता दिखाई दी। सुरक्षा और तकनीक से लेकर पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति तक भारत को संतुलन साधना पड़ रहा है। यही संतुलन भविष्य की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगा।
सुरक्षा और राष्ट्रवाद
राष्ट्रीय सुरक्षा मोदी की राजनीति का केंद्रीय विषय रही है। आतंकवाद के खिलाफ कठोर नीति, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, सैन्य आधुनिकीकरण और रणनीतिक क्षमता बढ़ाने पर जोर ने सुरक्षा को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।
यहां भी बहस के दोनों पक्ष हैं। समर्थकों के लिए यह निर्णायक नेतृत्व का प्रमाण है, जबकि आलोचक सुरक्षा और राष्ट्रवाद के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठाते हैं।
लोकतंत्र में राष्ट्रहित के नाम पर सवाल बंद नहीं होने चाहिए और आलोचना के नाम पर राष्ट्रीय सुरक्षा की वास्तविक चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संतुलन और पारदर्शिता ही दोनों के बीच रास्ता निकाल सकती है।
आर्थिक विकास की अगली परीक्षा
मोदी सरकार के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था और डिजिटल ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। मगर आर्थिक सफलता का सवाल केवल जीडीपी के आकार या विकास दर तक सीमित नहीं है। रोजगार की गुणवत्ता, युवाओं के लिए अवसर, छोटे कारोबार की स्थिति, कृषि आय, महंगाई और आय-वितरण जैसे प्रश्न उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। यदि युवाओं को उनकी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिलता तो जनसांख्यिकीय लाभांश दबाव में बदल सकता है। ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब विकास का अनुभव आंकड़ों के साथ-साथ परिवारों की आय, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार में दिखाई दे।
व्यक्ति बनाम संस्थाएं
मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में एक यह है कि उन्होंने नेतृत्व को अत्यधिक प्रभावशाली व्यक्तिगत ब्रांड में बदल दिया। उनकी तस्वीर, भाषण शैली, योजनाओं के नाम और चुनावी संदेश भारतीय राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
लेकिन यही उनकी राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती भी है।
लोकप्रिय नेता लोकतंत्र को ऊर्जा दे सकता है, मगर लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति से बड़ा होता है। संसद में बहस, विपक्ष की भूमिका, मीडिया की स्वतंत्रता, संघीय ढांचे की मजबूती, न्यायिक और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता तथा नागरिक स्वतंत्रताएं किसी भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण कसौटियां हैं।
सरकार के समर्थक यदि उपलब्धियों का श्रेय प्रधानमंत्री को देते हैं तो आलोचकों को सवाल पूछने का अधिकार भी लोकतंत्र का उतना ही आवश्यक हिस्सा है। लोकप्रियता जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकती।
यही वह क्षेत्र है जहां मोदी की ऐतिहासिक विरासत का फैसला आने वाली पीढ़ियां करेंगी। किसी प्रधानमंत्री ने कितनी योजनाएं शुरू कीं, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उसके शासनकाल में संस्थाएं कितनी मजबूत हुईं।
इतिहास का फैसला अभी बाकी है
मोदी ने भारतीय राजनीति का शब्दकोश बदल दिया है। ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘डिजिटल भारत’, ‘विकसित भारत’ और वैश्विक स्तर पर भारत की बड़ी भूमिका की आकांक्षा अब राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा हैं। यह महत्वाकांक्षा सकारात्मक शक्ति बन सकती है, बशर्ते इसे शिक्षा, रोजगार, विज्ञान, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और संस्थागत सुधार का मजबूत आधार मिले।
इसलिए 17 सितंबर का दिन केवल प्रधानमंत्री को शुभकामना देने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह यह पूछने का भी दिन है कि पिछले साढ़े बारह वर्षों में देश किस दिशा में बढ़ा है।
मोदी के समर्थकों के लिए उनकी यात्रा संघर्ष और उपलब्धि की प्रेरक कहानी है। आलोचकों के लिए यह सत्ता के केंद्रीकरण और राजनीतिक ध्रुवीकरण की बहस है। दोनों के बीच लोकतंत्र का रास्ता मौजूद है—उपलब्धि हो तो श्रेय, कमी हो तो सवाल और हर स्थिति में संविधान सर्वोपरि।
भारत किसी एक नेता से बड़ा है। यही बात हर प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी ऐतिहासिक कसौटी होनी चाहिए।
नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति को बदला है, शासन की शैली को प्रभावित किया है और विश्व मंच पर भारत की आवाज को अधिक मुखर बनाया है। अब असली प्रश्न यह नहीं कि मोदी कितने लोकप्रिय हैं। असली प्रश्न यह है कि उनके बाद का भारत कितना मजबूत होगा।
क्या भारत अधिक समृद्ध होगा?
क्या युवा अधिक रोजगार पाएंगे?
क्या गरीब की जिंदगी अधिक सुरक्षित होगी?
क्या शिक्षा और स्वास्थ्य बेहतर होंगे?
क्या सामाजिक विश्वास मजबूत होगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी मजबूत रहेंगी कि किसी भी व्यक्ति से ऊपर संविधान और नागरिक का अधिकार कायम रहे?
इतिहास अंततः नारों, तस्वीरों और जयकारों से फैसला नहीं करता। वह परिणाम देखता है।
वडनगर से दिल्ली और दिल्ली से विश्व मंच तक पहुंची नरेंद्र मोदी की यात्रा अब भारतीय राजनीति के इतिहास का हिस्सा है। इस यात्रा की अंतिम व्याख्या आने वाला समय करेगा। जन्मदिन पर सबसे सार्थक शुभकामना यही होगी कि उपलब्धियों का ईमानदारी से सम्मान हो, कमियों पर निर्भीकता से सवाल उठें और भारत की संस्थाएं हर राजनीतिक व्यक्तित्व से अधिक मजबूत बनें।
क्योंकि किसी नेता की सबसे बड़ी विरासत उसका अपना कद नहीं, बल्कि उसके बाद भी मजबूत खड़ा रहने वाला देश होता है।
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सत्यपाल सिंह कौशिक को कंटेंट लेखन, स्क्रिप्ट लेखन का लंबा अनुभव है। वर्तमान में कौशिक जी FT NEWS DIGITAL में डिजिटल मीडिया सह- संपादक के पद पर कार्यरत हैं।
