लोकसभा में गूंजी भोजपुरी, राजस्थानी और भोटी की आवाज, सांसद जगदंबिका पाल ने आठवीं अनुसूची में शामिल करने की उठाई मांग
लोकसभा में विशेष उल्लेख (नियम-377) के तहत डुमरियागंज के सांसद जगदंबिका पाल ने भोजपुरी, राजस्थानी और भोटी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाई। उन्होंने इसे भाषाई विरासत और करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय बताया।
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में डुमरियागंज के सांसद जगदंबिका पाल ने विशेष उल्लेख (नियम-377) के माध्यम से भोजपुरी, राजस्थानी एवं भोटी भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से इन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता देने की दिशा में आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया।
सारांश (Summary)
स्थान: लोकसभा, नई दिल्ली
सांसद जगदंबिका पाल ने लोकसभा में भाषाई पहचान का मुद्दा उठाया।
भोजपुरी, राजस्थानी और भोटी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग।
कहा- करोड़ों लोगों की भाषा और सांस्कृतिक विरासत को मिले संवैधानिक सम्मान।
भाषाओं के संरक्षण, अध्ययन और प्रचार-प्रसार को मिलेगा नया आधार।
केंद्र सरकार से शीघ्र निर्णय लेने का आग्रह।
पूरी खबर
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में डुमरियागंज के सांसद जगदंबिका पाल ने विशेष उल्लेख (नियम-377) के तहत भोजपुरी, राजस्थानी और भोटी भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि ये भाषाएं भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और भाषाई विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तथा इन्हें संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार सांसद ने सदन में कहा कि इन भाषाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान प्राप्त है। उन्होंने उल्लेख किया कि भोजपुरी भाषा का उपयोग कई देशों में व्यापक रूप से होता है, जबकि राजस्थानी और भोटी भाषाओं को भी पड़ोसी देशों में मान्यता प्राप्त है।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 1969 से अब तक इस विषय पर संसद में कई गैर-सरकारी विधेयक प्रस्तुत किए जा चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका है। सांसद के अनुसार भोजपुरी भाषा पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार और उत्तरी झारखंड सहित अनेक क्षेत्रों में व्यापक रूप से बोली जाती है तथा दुनिया के कई देशों में भी इसका प्रयोग होता है।
सांसद जगदंबिका पाल ने कहा कि इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने से करोड़ों लोगों की भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान मिलेगा। साथ ही इनके संरक्षण, संवर्धन, शोध, शिक्षा और प्रचार-प्रसार को भी नई गति मिलेगी।
उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि जनभावनाओं तथा इन भाषाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और अंतरराष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रखते हुए आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक ताकत मानी जाती है। समय-समय पर विभिन्न भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग उठती रही है। किसी भी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का निर्णय संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार एवं संसद के स्तर पर लिया जाता है।
यह समाचार सांसद जगदंबिका पाल के कार्यालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त तथ्य, आंकड़े और मांगें प्रेस विज्ञप्ति में उपलब्ध जानकारी पर आधारित हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में किसी भाषा को शामिल करने का अंतिम निर्णय भारत सरकार और संसद की विधायी प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाएगा।
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