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संकल्प से सिद्धि तक नरेंद्र मोदी की यात्रा

सत्यपाल सिंह कौशिक

(वरिष्ठ स्तंभकार)

गुजरात के वडनगर की गलियों से शुरू हुई एक यात्रा आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच चुकी है। 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी का सार्वजनिक जीवन संघर्ष, संगठन, सत्ता और बड़े लक्ष्यों की लंबी यात्रा रहा है। 2014 में देश की बागडोर संभालने के बाद वे 2019 में दोबारा प्रधानमंत्री बने और 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

लेकिन नरेंद्र मोदी की कहानी को केवल चुनावी जीत और सत्ता के आंकड़ों में समेटना इस यात्रा को छोटा कर देना होगा। असल कहानी उस राजनीतिक शैली की है, जिसने पिछले एक दशक से अधिक समय में भारतीय राजनीति की भाषा, प्राथमिकताओं और चुनावी विमर्श को काफी हद तक प्रभावित किया।

मोदी के राजनीतिक सफर में संकल्प शब्द बार-बार सामने आता है। गरीब कल्याण से लेकर डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत तक। सरकार ने बड़े लक्ष्य सामने रखे और उन्हें जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया। जनधन, आधार और मोबाइल जैसी व्यवस्थाओं के जरिए सरकारी लाभ को सीधे लोगों तक पहुंचाने की कोशिश हुई। डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने भी भारत की आर्थिक गतिविधियों में नई संभावनाएं पैदा की हैं।

लेकिन किसी भी सरकार के लिए घोषणाएं अंतिम उपलब्धि नहीं होतीं। असली सवाल जमीन पर परिणाम का होता है। क्या गरीब की जिंदगी बदली? क्या किसान की आय और सुरक्षा मजबूत हुई? क्या युवा को पर्याप्त रोजगार मिला? क्या छोटे कारोबारी के लिए कारोबार करना आसान हुआ? क्या गांव की सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर हुई? यही वे सवाल हैं, जिनके जवाब आने वाले वर्षों में मोदी सरकार के कामकाज का वास्तविक मूल्यांकन तय करेंगे।

मोदी सरकार ने ‘विकसित भारत 2047’ को दीर्घकालिक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में सामने रखा है। इसका अर्थ केवल बड़ी अर्थव्यवस्था बनना नहीं है। विकसित भारत की असली तस्वीर तब बनेगी, जब गांव और शहर के बीच अवसरों की दूरी घटेगी, युवाओं को गुणवत्तापूर्ण रोजगार मिलेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं मजबूत होंगी और भारत तकनीक तथा विनिर्माण के क्षेत्र में वैश्विक क्षमता हासिल करेगा।

यही कारण है कि मोदी के तीसरे कार्यकाल में आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, एमएसएमई, तकनीक और आत्मनिर्भरता पर जोर लगातार दिखाई देता है। 2026 के बजट को लेकर प्रधानमंत्री ने भी विकसित भारत के लक्ष्य से जुड़े सुधारों और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है।

विदेश नीति भी मोदी युग की महत्वपूर्ण पहचान बनी है। भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी भूमिका को सक्रिय किया है। जी-20 की अध्यक्षता से लेकर अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और योग दिवस जैसे प्रयासों तक, भारत की वैश्विक उपस्थिति को व्यापक बनाने की कोशिश हुई। आज भारत से दुनिया की अपेक्षाएं भी पहले की तुलना में अधिक हैं। इस बढ़ती भूमिका के साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ी हैं।

फिर भी लोकतंत्र में किसी नेता का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों की सूची से नहीं होता। सवाल पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। नीतियों के लाभ के साथ उनकी कमियों पर चर्चा भी जरूरी है। रोजगार, महंगाई, कृषि, सामाजिक असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्थाओं की भूमिका और नागरिक स्वतंत्रताओं जैसे विषयों पर देश में लगातार बहस होती रही है। समर्थकों के पास उपलब्धियों के तर्क हैं तो आलोचकों के पास नीतियों और उनके प्रभाव को लेकर सवाल। लोकतंत्र में दोनों पक्षों को सुनना जरूरी है।

नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा का एक और पहलू महत्वपूर्ण है, व्यक्ति से आगे संगठन और संगठन से आगे लक्ष्य को स्थापित करने की उनकी शैली। उनके समर्थक इसे निर्णायक नेतृत्व के रूप में देखते हैं। आलोचक इसे सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण से जोड़कर प्रश्न उठाते हैं। दोनों दृष्टिकोण भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं और इनका मूल्यांकन तथ्यों तथा परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

आज जन्मदिवस पर प्रधानमंत्री के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अब तक तय किए गए बड़े लक्ष्यों को अगले चरण में ठोस परिणामों में बदला जाए। 2047 का भारत केवल नारों से नहीं बनेगा। उसके लिए करोड़ों युवाओं की ऊर्जा, किसानों की समृद्धि, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, मजबूत शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रतिस्पर्धी उद्योग और सक्षम प्रशासन चाहिए।

वडनगर से दिल्ली तक की यह यात्रा बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में साधारण पृष्ठभूमि से आया व्यक्ति भी देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंच सकता है। यही लोकतंत्र की ताकत है। और तभी भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है।

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