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सहारनपुर SSP द्वारा आयोजित हुई जनसुनवाई, समस्याओं का हुआ निस्तारण

सहारनपुर। पुलिस कार्यालय में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, सहारनपुर द्वारा जनसुनवाई आयोजित की गई। जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से आए नागरिकों ने अपनी समस्याएँ, शिकायतें व आवेदन प्रस्तुत किए, जिन्हें अधिकारियों द्वारा पूरी गंभीरता एवं संवेदनशीलता के साथ सुना गया सभी प्रकरणों में समयबद्ध, पारदर्शी एवं निष्पक्ष कार्यवाही सुनिश्चित करने के स्पष्ट निर्देश दिए जनसुनवाई में प्राप्त शिकायतों का त्वरित निस्तारण किया जाए। प्रत्येक शिकायतकर्ता को निस्तारण की समुचित सूचना उपलब्ध कराई जाए, जिससे जनता का भरोसा और मजबूत हो। जनसुनवाई का मुख्य उद्देश्य पुलिस-जनता के बीच संवाद को सुदृढ़ करना और जनपद में सुशासन एवं बेहतर कानून व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

घूसखोर पंडत:: विवादों से प्रचार पातीं फिल्में: अरविंद जयतिलक

अरविंद जयतिलक

(वरिष्ठ स्तंभकार)

फिल्मों का एक सुनियोजित रणनीति के तहत विवादों में परोसना और फिर उस पर वितंडा खड़ा करके प्रचार पाना अब कोई नयी बात नहीं रह गई है। दरअसल फिल्मकारों ने आस्था, भावना और मूल्यों के खिलाफ फिल्में बनाकर बेशुमार धन इकठ्ठा करने का एक चलन बना लिया है। भले ही इससे किसी जाति, धर्म आस्था और भावना को चोट क्यों न पहुंचती हो। ऐसी ही एक फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ भी रुपहले पर्दे पर चढ़ने को तैयार है जिसके टाईटल को लेकर वितंडा उठ खड़ा हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस फिल्म के टाईटल को लेकर विरोध-प्रदर्शन जारी है। खुद फिल्म निर्माता संघ (एफएमसी) ने इस फिल्म को लेकर निर्माता नीरज पांडेय को नोटिस जारी किया है और कहा है कि फिल्म निर्माता ने नियमों के अनुसार शीर्षक के लिए अनिवार्य अनुमति प्राप्त नहीं की है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि फिल्म निर्माता ने जानबुझकर फिल्म को विवादों की परिधि में लाकर प्रचार पाने के लिए यह सारा उपक्रम किया था। अब जब विवाद चरम पर पहुंच गया है और फिल्म भी खूब प्रचार पा ली है तो फिल्म निर्माता नीरज पांडेय और अभिनेता मनोज वाजपेई द्वारा सफाई दी जा रही है कि उनका मकसद किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था। वे अब विवादित प्रचार सामग्री को हटाने की भी दुहाई दे रहे हैं। लेकिन सच तो यह है कि फिल्म निर्माता ने अपनी फिल्म को विवादों के जरिए जितना प्रचार पाना चाहा था उतना पा लिया। उसका मकसद पूरा हुआ। अब सवाल यह है कि क्या ऐसे फिल्म निर्माताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी जो धन कमाने के निमित्त इस किस्म का घिनौने हथकंडा अपनाते हैं। कहना मुश्किल है। इसलिए कि इस तरह के हथकंडे बार-बार अपनाए जा रहे हैं। याद होगा गत वर्ष पहले ओम राउत निर्देशित फिल्म आदिपुरुष भी आई थी जिसमें अमर्यादित और फूहड़ संवादों और बेतुकी कल्पनाओं के जरिए भगवान श्रीराम और उनके भक्त हनुमान के अपमान के साथ-साथ महाकाव्य रामायण की प्रमाणिकता, ऐतिहासिकता, संदर्भ, गरिमा और आस्था से जमकर खिलवाड़ किया गया था। इसी तरह तमिल फिल्म निर्माता लीना मणिमेकलाई ने अपनी फिल्म काली के पोस्टर में हिंदू देवी का रुप धरे महिला किरदार को सिगरेट पीते दिखाया था। इस किरदार के एक हाथ में एलजीबीटीक्यू समुदाय के 6 रंगे झंडे को भी दिखाया गया था। तब भी विरोध हुआ था लेकिन लीना मणिमेकलाई हिंदू संवेदनाओं को समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं दिखी। तब उन्होंने कहा था कि वह जीवित रहने तक निडर होकर अपनी आवाज का इस्तेमाल करती रहेंगी। विडंबना यह है कि तब भी कुछ सेलिब्रेटी राजनीतिक हस्तियां लीना मणिमेकलाई के समर्थन में आवाज बुलंद करती दिखी थी जैसा कि आज ‘घुसखोर पंडित’ टाईटल के समर्थन में खड़े दिख रहे हैं। मौंजू सवाल यह कि क्या नीरज पांडेय, ओम राउत और लीना मणिमेकलाई सरीखे फिल्म मेकर्स हिंदू जातियों, हिंदू धर्म, हिंदू आस्था की तरह अन्य धर्मों की जातियों, उनके आराध्यों और उन्हें असहज करने वाली भावनाओं को अपनी फिल्मों में अमर्यादित तरीके से दिखाने का साहस कर सकते हैं? शायद नहीं। तब फतवा जारी हो जाएगा और उन्हें जान बचाने के लाले पड़ जाएंगे। याद होगा गत वर्ष पहले देश के जाने-माने फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने फिल्म ‘पद्मावती’ के जरिए रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच प्रेम संबंधों का निरुपण कर वितंडा खड़ा किया था। इसे लेकर देश में भारी बवाल हुआ था। मार्च 2015 में फिल्म ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ भी विवादों से घिरी जब फिल्म का फर्स्टलुक जारी हुआ। इस पोस्टर में अभिनेत्री मल्लिका तीन रंगों वाले राष्ट्रीय ध्वजों में लिपटी नजर आयी। हैदराबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर मल्लिका और सरकार को नोटिस भी जारी किया। जनवरी 2016 में हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’ में समलैंगिक शब्द के इस्तेमाल पर सेंसर बोर्ड ने ऐतराज जताया। उल्लेखनीय है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरस के जीवन से जुड़ी सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म में मनोज वाजपेयी और राजकुमार राव ने प्रमुख भूमिका निभायी थी। अभी गत वर्ष पहले अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ विवादों के केंद्र में रहा। इस फिल्म का कथानक पंजाब में नशाखोरी के इर्द-गिर्द गढ़ा-बुना गया था। इसके कुछ दृश्यों और डॉयलाग को लेकर बवाल मचा। बेशक एक फिल्मकार को अधिकार है कि वह फिल्मों का निर्माण करे। लेकिन उसका उत्तरदायित्व भी है कि वह धर्म, संस्कृति और इतिहास को पढ़े-समझे और उसकी वास्तविकताओं एवं भावनाओं का ख्याल रखकर फिल्मों का निर्माण करे। उसे ध्यान रखना चाहिए कि फिल्मों के जरिए समाज के नैसर्गिक स्वभाव और आस्था पर बुरा असर न पड़े। यह उचित नहीं कि चंद पैसों के लालच में या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर हिंदू धर्म, संस्कृति और इतिहास पर हमला किया जाए। देखा जा रहा है कि विगत कई दशकों से भारत में हिंदू देवी-देवताओं और सनातन संस्कृति को टारगेट कर फिल्में बनायी जा रही हैं। यह सोच न सिर्फ विघटनकारी और नफरतपूर्ण है बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता, धर्म, संस्कृति और इतिहास पर प्रहार भी है। दरअसल इसके दो मकसद हैं। एक, हिंदू धर्म को बदनाम करना और दूसरा विवादों के जरिए अकूत संपदा इकठ्ठा करना। विश्वरुपम, हैदर, एमएसजी, पीके, मद्रास कैफे, सिंघम, आरक्षण, माई नेम इज खान, जोधा-अकबर, वाटर, जो बोले सो निहाल और फायर इत्यादि फिल्में इसी तरह का उदाहरण हैं। फिल्मकारों ने यह धारणा पाल रखी है कि फिल्मों पर जितना अधिक बवाल होगा उनकी कमाई में उतना ही इजाफा होगा। बेशक एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज में कहने-सुनने, लिखने-पढ़ने और दिखने-दिखाने की आजादी होनी चाहिए। विशेष रुप से कला के क्षेत्र में तो और भी अधिक। क्योंकि समाज में जो कुछ भी घटित होता है, उसे कला के जरिए पर्दे पर उकेरा जाता है। लेकिन कला और अभिव्यक्ति की आड़ लेकर अरबों कमाने की लालच में किसी धर्म और आस्था पर प्रहार कहां तक उचित है? एक वक्त था जब फिल्मों का कथानक समाज और राष्ट्र के जीवन में चेतना का संचार करता था। युवाओं को प्रेरणा देता था। आजादी की लड़ाई को धार देने से लेकर समाज के गुणसूत्र को बदलने-रचने में फिल्मों की अहम भूमिका रही है। आज भी कुछ फिल्में सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों को उकेरती दिख जाती हैं। लेकिन अधिकांश फिल्में वास्तविकताओं से दूर अतिरंजित और फूहड़पन से लैस होती हैं। नतीजा उन्हें विवादों का विषय बनते देर नहीं लगती। इसमें किसी को आपत्ति नहीं कि फिल्मों का शीर्षक क्या हो अथवा उसका कथानक कैसा हो यह तय करने का अधिकार फिल्म के प्रोड्यूसर और निर्देशक का है। एक फिल्मकार को अधिकार और आजादी है कि वह ऐतिहासिक और धार्मिक कथानकों को फिल्मों के जरिए दुनिया के सामने लाए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह धार्मिकता, ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता के साथ छेड़छाड़ कर आस्था लहूलुहान करे। अगर किसी फिल्म के शीर्षक, कथानक या डॉयलाग से समाज का कोई वर्ग आहत होता है तो इसकी जिम्मेदारी सेंसर बोर्ड की है कि वह इसे पास न करे। याद होगा दिसंबर 2015 में ‘क्या कूल हैं हम’ और ‘मस्तीजादे’ पर सेंसर बोर्ड ने कैंची चलायी थी। ‘क्या कूल हैं हम’ में 107 सीन प्रोड्यूसर ने, जबकि 32 सीन सेंसर बोर्ड ने काटे थे। इसी तरह ‘मस्तीजादे’ में 349 सीन प्रोड्यूसर ने जबकि 32 सीन सेंसर बोर्ड ने काटे थे। इसके बाद भी इन फिल्मों को ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ रिलीज की अनुमति दी गयी। नवंबर 2015 में जेम्स बांड की सीरिज की 24 वीं फिल्म ‘स्पेक्टर’ के एक दृश्य पर भी सेंसर बोर्ड ने कैंची चलायी गयी थी। सवाल लाजिमी है कि फिर किसी फिल्म का नाम ‘घुसखोर पंडित’ कैसे रख दिया गया। इस अनुचित और अविवेकपूर्ण टाईटल पर कैंची क्यों नहीं चलायी गई? उचित होगा कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड अथवा भारतीय सेंसर बोर्ड फिल्मों के अनुचित टाईटल, दृश्यों और अनर्गल संवादों पर तत्काल कैंची चलाए ताकि देश-समाज का माहौल विषाक्त न बने और न ही किसी की भावना को ठेस पहुंचे।

स्कूल असेंबली में गूंज रहीं देश-दुनिया की खबरें, छात्रों की बढ़ रही जागरूकता

देशभर के स्कूलों में अब सुबह की प्रार्थना सभा केवल प्रार्थना और अनुशासन तक सीमित नहीं रह गई है। यहां रोज़ाना देश और दुनिया की ताज़ा खबरें सुनाई जा रही हैं, जिससे विद्यार्थियों की सामान्य ज्ञान क्षमता मजबूत हो रही है और वे वर्तमान घटनाक्रम से अपडेट रह रहे हैं।
शिक्षाविदों का मानना है कि स्कूल असेंबली में समाचार वाचन की परंपरा बच्चों को जागरूक नागरिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। राष्ट्रीय घटनाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों तक की जानकारी छात्रों को दी जा रही है, ताकि वे व्यापक दृष्टिकोण विकसित कर सकें।
हाल के दिनों में शिक्षा, विज्ञान, खेल, पर्यावरण और तकनीक से जुड़ी खबरें असेंबली का हिस्सा बनी हैं। डिजिटल शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर सरकार के बढ़ते फोकस की जानकारी भी विद्यार्थियों को दी जा रही है। साथ ही, खेल जगत में भारतीय खिलाड़ियों की उपलब्धियां बच्चों में प्रेरणा का संचार कर रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही आर्थिक बैठकों, पर्यावरण संरक्षण की पहल और अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़ी खबरों को भी सरल भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है, ताकि छात्र वैश्विक घटनाओं को समझ सकें।
विशेषज्ञों के अनुसार, नियमित समाचार वाचन से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ता है, भाषा कौशल बेहतर होता है और सार्वजनिक मंच पर बोलने की क्षमता विकसित होती है। यही कारण है कि कई विद्यालयों में अब समाचार पढ़ने की जिम्मेदारी छात्रों को ही सौंपी जा रही है।
विद्यालय प्रशासन का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य बच्चों को सिर्फ पाठ्यपुस्तक तक सीमित न रखकर उन्हें समाज और राष्ट्र की गतिविधियों से जोड़ना है।
स्पष्ट है कि स्कूल असेंबली में समाचार वाचन की यह परंपरा विद्यार्थियों को जिम्मेदार, सजग और जागरूक नागरिक बनाने की दिशा में प्रभावी साबित हो रही है।

तिरुपति लड्डू घी प्रकरण: CBI की चार्जशीट से उठा आस्था और व्यवस्था पर बड़ा सवाल

नई दिल्ली / तिरुपति।
देश के सबसे प्रतिष्ठित और आस्था से जुड़े धार्मिक स्थलों में शामिल तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) से जुड़ा एक गंभीर मामला अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच गया है। लड्डू प्रसाद निर्माण में उपयोग किए गए घी की आपूर्ति को लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने विस्तृत जांच के बाद अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी है।
यह मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि तिरुपति मंदिर में वितरित होने वाला लड्डू प्रसाद न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का प्रतीक भी माना जाता है।
जांच में क्या सामने आया
CBI-SIT की जांच के अनुसार, प्रसाद निर्माण के लिए वर्षों तक जिस घी की आपूर्ति की गई, उसकी गुणवत्ता, स्रोत और आपूर्ति प्रक्रिया को लेकर कई स्तरों पर अनियमितताएं पाई गईं।
जांच एजेंसी का कहना है कि घी की सप्लाई तय मानकों और प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं थी।
बताया गया है कि यह आपूर्ति लंबे समय तक और बड़ी मात्रा में की गई, जिसकी कुल मात्रा लाखों किलोग्राम तक बताई जा रही है। इसी आपूर्ति श्रृंखला में गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद मामला CBI तक पहुंचा।
चार्जशीट और आगे की प्रक्रिया
CBI ने अपनी जांच पूरी कर संबंधित अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है।
चार्जशीट में आपूर्तिकर्ताओं, संबंधित व्यक्तियों और व्यवस्था से जुड़े कुछ जिम्मेदार पक्षों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। हालांकि, जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय अदालत द्वारा ही किया जाएगा।
CBI सूत्रों के अनुसार, मामले में दस्तावेज़ी साक्ष्य, आपूर्ति रिकॉर्ड और गुणवत्ता जांच रिपोर्ट को आधार बनाया गया है।
आस्था से जुड़ा मामला, इसलिए संवेदनशीलता अधिक
तिरुपति मंदिर में लड्डू प्रसाद की एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है। ऐसे में इस मामले ने आस्था, पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास जैसे मुद्दों को भी केंद्र में ला दिया है।
हालांकि, मंदिर प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में प्रसाद निर्माण और वितरण व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रित और सुरक्षित है, तथा भविष्य में ऐसी किसी भी संभावना को रोकने के लिए सप्लाई सिस्टम को और सख्त किया गया है।
आधिकारिक पक्ष
CBI और प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि
चार्जशीट दाखिल होने के बाद अब मामला अदालत के विचाराधीन है और आगे की कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होगी।
फिलहाल किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।नि

ष्कर्ष

तिरुपति लड्डू घी से जुड़ा यह प्रकरण केवल एक आपूर्ति विवाद नहीं, बल्कि आस्था से जुड़े सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही का मामला बन गया है।
CBI की चार्जशीट के बाद अब सभी की निगाहें अदालत की कार्यवाही और आगे सामने आने वाले तथ्यों पर टिकी हैं।

राजधानी दिल्ली से लापता लोगों के चौंकाने वाले आंकड़े, बच्चों की संख्या ने बढ़ाई चिंता

देश की राजधानी दिल्ली में साल 2026 की शुरुआत ने सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 के पहले 27 दिनों में 807 लोगों के लापता होने के मामले दर्ज किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं?

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक—

कुल लापता मामले: 807

अब तक ट्रेस किए गए लोग: 235

अब भी लापता: 538

लापता बच्चों की संख्या: 137

इन आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो यह सामने आता है कि राजधानी में हर दिन औसतन 27 लोग लापता हुए, जबकि करीब 9 लोगों को प्रतिदिन ट्रेस किया गया।

बच्चों की बढ़ती संख्या बनी सबसे बड़ी चिंता

लापता मामलों में बच्चों की संख्या को लेकर विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है। बाल अधिकारों से जुड़े जानकारों का कहना है कि नाबालिगों के मामलों में शुरुआती 24 से 48 घंटे बेहद अहम होते हैं, ऐसे में समय पर सूचना और सतर्कता की भूमिका और भी बढ़ जाती है।

पुलिस की कार्रवाई और प्रयास

दिल्ली पुलिस द्वारा लापता व्यक्तियों की तलाश के लिए तकनीकी संसाधनों, डेटाबेस और फील्ड लेवल सर्च ऑपरेशन का सहारा लिया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि कई मामलों में लोग स्वेच्छा से घर छोड़ने, मानसिक तनाव, या रोजगार संबंधी कारणों से भी लापता पाए जाते हैं और उन्हें सुरक्षित वापस परिजनों से मिलाया जा रहा है।

यह आंकड़े दर्ज मामलों पर आधारित हैं, जिनमें जांच और तलाश की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है।

विशेषज्ञों की राय

सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि महानगरों में—

जनसंख्या घनत्व

आर्थिक दबाव

पारिवारिक तनाव

डिजिटल और सामाजिक बदलाव

जैसे कारण भी लापता मामलों की संख्या को प्रभावित करते हैं। ऐसे में जनजागरूकता, समय पर शिकायत और सामुदायिक सहयोग बेहद जरूरी है।

प्रशासन और समाज की साझा जिम्मेदारी

यह मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, परिवार और प्रशासन — तीनों की साझा जिम्मेदारी को दर्शाता है। बच्चों और कमजोर वर्ग की सुरक्षा को लेकर सतर्कता और संवाद की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

 

वर्दी हुई शर्मसार..4 लाख रिश्वत लेते इंस्पेक्टर हुआ गिरफ्तार

बेंगलुरू: बीते 31 जनवरी को बेंगलुरु में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत एंटी करप्शन ब्यूरो / लोकायुक्त पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एक पुलिस इंस्पेक्टर को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।

जानकारी के मुताबिक, के.पी. अग्रहार पुलिस स्टेशन में तैनात इंस्पेक्टर गोविंदराजू पर आरोप है कि उन्होंने एक व्यक्ति को धोखाधड़ी के मामले में फंसाने की चेतावनी देते हुए उससे चार लाख रुपये की अवैध मांग की थी। पीड़ित द्वारा शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद सतर्कता एजेंसी ने पूरे मामले की गोपनीय जांच की और फिर जाल बिछाया।

जैसे ही तय योजना के तहत रिश्वत की रकम दी गई, एसीबी की टीम ने मौके पर पहुंचकर इंस्पेक्टर को रंगे हाथों दबोच लिया। कार्रवाई के दौरान इंस्पेक्टर द्वारा कथित तौर पर हंगामा करने और लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश भी सामने आई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

हालांकि, जांच एजेंसी ने तकनीकी और भौतिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तारी की पुष्टि की है। फिलहाल आरोपी से पूछताछ जारी है और यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस तरह की गतिविधियों में अन्य लोग भी शामिल थे।

इस घटना के बाद पुलिस विभाग में खलबली मच गई है, वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर आम लोगों में चर्चा तेज हो गई है।

 

 

 

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